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कंद के बजाय अब बीज से उपजेगा आलू, 20-30 प्रतिशत बढ़ेगी पैदावार, उत्पादन लागत रह जायेगी आधी

By Prabhat Khabar Print Desk
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आलू के पेड़
आलू के पेड़
प्रभात खबर

अनुपम कुमार,पटना. कंद के बजाय अब आलू बीज से उपजेगा. केंद्रीय आलू अनुसंधान केंद्र, पटना ने टीपीएस (ट्रू् पोटैटो सीड) नामक इस नयी तकनीक को विकसित किया है. यहां के प्रधान कृषि वैज्ञानिक डॉ शंभु कुमार बीते 15 वर्षों से इस पर लगातार काम कर रहे थे. इसके बीज को प्रयोगात्मक रूप से इस अवधि में कई किसानों को दिया गया.

ट्रायल के दौरान पाया गया कि इससे न केवल उत्पादन लागत घट कर लगभग आधी रह गयी, बल्कि आलू की पैदावार भी 20 से 30 फीसदी तक बढ़ गयी. नयी तकनीक के सफल परिणामों को देखते हुए केंद्रीय आलू संस्थान, शिमला ने भी 92-pt-27 के नाम से इसे मान्यता दे दिया है और अब इस बीज को केंद्रीय आलू अनुसंधान केंद्र, पटना पैसे लेकर भी किसानों को मुहैया करवा रहा है.

आलू का फल टमाटर की तरह दिखता है. इसके परागन से पहले फूल तैयार किया जाता है. उसके बाद फल विकसित होता है, जिसके फटने के बाद बीज निकलता है. बीज को पहले खेत में छींट कर आलू का बिचड़ा तैयार किया जाता है. उसके बाद उसको दूसरे खेत में लगाया जाता है, जहां आलू का पौधा बड़ा होता है.

पहले साल प्रति हेक्टेयर 150 से 175 क्विंटल मंझोले और छोटे आलू तैयार होते हैं. उसके कंद को अगले साल बीज के रूप में इस्तेमाल करने पर उससे 350 से 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर आलू प्राप्त होता है. तीसरे साल भी इसी दर से उत्पादन होता है. जबकि सामान्य रूप से महज 250 से 300 क्विंटल उपज होती है. इस क्रम में आलू के कंद बीज का इस्तेमाल भी घट जाता है और 25-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के बजाय टीपीएस से निकले कंद का 12-15 क्विंटल ही प्रति हेक्टेयर बीज के रूप में इस्तेमाल होता है.

महज 10% रह जाती है बीज की लागत

टीपीएस के इस्तेमाल से आलू की खेती के दौरान लगने वाले बीज की लागत घट कर महज 10 फीसदी रह जाती है. आलू के सामान्य कंद बीज की खपत प्रति ढाई एकड़ में 25-30 क्विंटल है, जिसकी कीमत लगभग 45 हजार रुपये आती है, जबकि टीपीएस की खपत महज 150 ग्राम होती है, जिसकी कीमत 4500 रुपये होती है. मालूम हो कि परंपरागत ढंग से आलू के उत्पादन में लागत का 70 फीसदी खर्च केवल बीज पर होता है. ऐसे में बीज के खर्च में कमी से कुल उत्पादन लागत में बहुत कमी आयेगी.

आलू अनुसंधान केंद्र पटना के प्रधान वैज्ञानिक डॉ शंभु कुमार कहते है कि पिछले कई वर्षों के अनुसंधान और परीक्षण के बाद हमने ट्रू् पोटैटो सीड (टीपीएस) बनाया है, जो पूरी तरह रोगमुक्त है. कंद बीज के बजाय टीपीएस से खेती देश के किसानों के लिए बहुत लाभदायक है. इससे उत्पादन लागत में भारी कमी आयी है और पैदावर भी बढ़ी है. प्रदेश में तीन से सवा तीन लाख हेक्टेयर में आलू की खेती होती है. ऐसे में इस तकनीक के इस्तेमाल से किसानों को करोड़ों रुपये का फायदा होगा.

Posted by Ashish Jha

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