उत्तर बिहार की उपेक्षा पर लोगों में है चिंता और रोष

Updated at : 10 Dec 2019 8:55 AM (IST)
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उत्तर बिहार की उपेक्षा पर लोगों में है चिंता और रोष

डॉ शंभु शरण श्रीवास्तव, पूर्व विधान पार्षद एवं संयोजक, बिहार विमर्श उत्तर बिहार की उपेक्षा व पिछड़ेपन पर हुए सम्मेलन में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य आये सामने, बाढ़ से होती है परेशानी यूं तो पूरा बिहार अपनी तंगहाली और पिछड़ेपन के लिए बदनाम रहा है, लेकिन मौजूदा बिहार में भी भीषण क्षेत्रीय असमानता है. उत्तर बिहार […]

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डॉ शंभु शरण

श्रीवास्तव, पूर्व विधान पार्षद

एवं संयोजक, बिहार विमर्श

उत्तर बिहार की उपेक्षा व पिछड़ेपन पर हुए सम्मेलन में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य आये सामने, बाढ़ से होती है परेशानी

यूं तो पूरा बिहार अपनी तंगहाली और पिछड़ेपन के लिए बदनाम रहा है, लेकिन मौजूदा बिहार में भी भीषण क्षेत्रीय असमानता है. उत्तर बिहार में व्याप्त घनघोर गरीबी एवं पिछड़ापन तथा इस इलाके की उपेक्षा अब एक महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में उभरने लगा है. इस इलाके के लोग अपनी दयनीय स्थिति को लेकर न सिर्फ चिंतित हैं, बल्कि अपना रोष अब कई स्तरों पर प्रकट करने लगे हैं. इसी सिलसिले में हाल ही में ‘उत्तर बिहार की उपेक्षा एवं पिछड़ेपन’ पर मुजफ्फरपुर में एक सफल राज्य सम्मेलन गैर दलीय मंच ‘बिहार विमर्श’ के तत्वावधान में हुआ. विमर्श से कुछ महत्वपूर्ण तथ्य उभरे एवं केंद्र तथा राज्य सरकार से कुछ मांगें की गयीं.

यह जानी हुई बात है कि जनता की सहभागिता से कटी हुई एवं सत्ता के केंद्रीकरण पर आधारित विकास की नीतियों ने देश में क्षेत्रीय असमानता को बढ़ावा दिया है. नतीजतन देश में घनघोर गरीबी एवं पिछड़ेपन के कई टापू बन गये हैं. दुर्भाग्य से,उत्तर बिहार क्षेत्रीय असमानता का ऐसा ही एक टापू है. यह अकारण नहीं है कि महात्मा गांधी ने इसी उत्तर बिहार के एक हिस्से चंपारण से अपने ऐतिहासिक किसान आंदोलन की शुरुआत की थी .

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में सम्मेलन ने गहन विचार- विमर्श के उपरांत एक प्रारंभिक मांगपत्र तैयार किया. इस अपेक्षा के साथ कि स्थिति की गंभीरता को देखते हुए केंद्र एवं राज्य की सरकार इन मांगों पर शीघ्र कदम उठायेंगी.

ये हैं मुद्दे

उत्तर बिहार में प्रति वर्ग किमी आबादी का घनत्व देश के किसी भी राज्य या क्षेत्र के मुकाबले सबसे ज्यादा है. यहां के लिए विशेष नीतियों का निर्धारण किया जाना चाहिए था.

उत्तर बिहार के 21 जिलों में 13 जिले हर साल बाढ़ की विनाश लीला से प्रभावित होते हैं. अगर सही नीतियां बना कर उनका त्वरित कार्यान्यवन किया जाता, तो यह जल शक्ति बिहार के लिए वरदान साबित हो सकती थी.

शिवहर, सुपौल और मधेपुरा प्रति व्यक्ति आय के पैमाने पर देश में सबसे पिछड़े जिले हैं. आर्थिक सर्वेक्षण में माना गया है कि दक्षिण के मुकाबले में उत्तर बिहार आर्थिक तौर पर ज्यादा बदहाल है.

दक्षिण बिहार में पटना और गया में दो अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डे हैं. सात करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले उत्तर बिहार में एक भी अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डा आज भी नहीं है.

बिहार में 18 राज्य स्तर के विश्वविद्यालय हैं, जिनमें सिर्फ 6 उत्तर बिहार में हैं और 12 दक्षिण बिहार में. इस 12 में 7 सिर्फ पटना में हैं.

पूरे उत्तर बिहार का स्वास्थ्य तथा शिक्षा का ढांचा अराजकता का शिकार और गुणवत्ताविहीन है.

राज्य के संसाधनों एवं बजट का दो तिहाई हिस्सा उत्तर बिहार के लिए आवंटित हो. इसकी शुरुआत आगामी बजट सत्र सेकी जानी चाहिए.विशेष पैकेज एवं प्रोत्साहन देकर चीनी एवं जुट मिलों को पुनर्जीवित किया जाये तथा नयी मिलें शुरू की जानी चाहिए.

हर एक जिले में एक ‘फूड पार्क’ की स्थापना होनी चाहिए, जहां विशेष प्रोत्साहन देकर खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को स्थापित किया जाये.

उत्तर बिहार में 6 नये विश्वविद्यालय जिनमें एक नेशनल लॉ यूनिर्वसिटी हो साथ ही एक आइआइएम, एक नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन डिजाइन (निफ्ट) भी खोला जाना चाहिए.

मत्स्यपालन एवं पॉल्ट्री के विकास के लिए विशेष प्रोत्साहन एवं प्रशिक्षण देने की व्यवस्था की जानी चाहिए. राष्ट्रीय स्तर का फीसरीज डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट उत्तर बिहार में स्थापित किया जाना चाहिए.

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