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मिथिला, गोदना पेंटिंग कलाकारों को नहीं मिल पा रही उनके हक की कमाई

Updated at : 28 Apr 2019 3:14 PM (IST)
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मिथिला, गोदना पेंटिंग कलाकारों को नहीं मिल पा रही उनके हक की कमाई

जितवारपुर : चटकीले रंगों, जीवंत चित्रों एवं बारीकियों की वजह से खास पहचान रखने वाली ‘मिथिला पेंटिंग’ और उसके साथ कदमताल करती ‘गोदना पेंटिंग’ जातियों में बंटे समाज में समरसता लाने में अहम भूमिका निभा रही हैं, लेकिन इनके कलाकार अपनी मेहनत का उचित दाम ना मिलने और बिचौलियों द्वारा अपना हक मारे जाने से […]

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जितवारपुर : चटकीले रंगों, जीवंत चित्रों एवं बारीकियों की वजह से खास पहचान रखने वाली ‘मिथिला पेंटिंग’ और उसके साथ कदमताल करती ‘गोदना पेंटिंग’ जातियों में बंटे समाज में समरसता लाने में अहम भूमिका निभा रही हैं, लेकिन इनके कलाकार अपनी मेहनत का उचित दाम ना मिलने और बिचौलियों द्वारा अपना हक मारे जाने से व्यथित हैं.

बिहार का जितवारपुर गांव ‘मिथिला पेंटिंग’ के लिये विश्वभर में मशहूर है, जहां का लगभग हर परिवार इस कला में निपुण है. इस गांव को हाल ही में ‘क्राफ्ट विलेज’ का दर्जा दिया गया है. ‘मिथिला पेंटिंग’ को पहचान दिलाने में अग्रणी भूमिका निभाने वाली, पद्मश्री से सम्मानित सीता देवी के पड़पोते की बहू आशा देवी इस विरासत को आगे बढ़ा रही हैं. उनका कहना है कि पहले फ्रांस, जर्मनी, जापान से लोग आते थे और कलाकारों को अच्छी कीमत मिलती थी.

आशा देवी ने ‘भाषा’ से कहा, ‘‘ ‘मिथिला पेंटिंग’ को प्रसिद्धी मिलने के बाद बिचौलिये ज्यादा सक्रिय हो गये हैं. वे इसे कम पैसों में यहां से खरीद कर मुंबई, दिल्ली एवं अन्य जगहों पर ले जाते हैं, जिससे कलाकारों को इसका उचित मूल्य नहीं मिल पाता.’ उन्होंने कहा, ‘‘हमारा सरकार से आग्रह है कि वह राष्ट्रीय स्तर का एक क्रय-विक्रय कार्यालय यहां खोले ताकि कलाकार अपनी कलाकृतियों को खुद बेच सकें.’

मिथिला एवं गोदना पेंटिंग से एक नया आयाम भी जुड़ गया है. अब कपड़ों पर भी पेंटिंग का चलन बढ़ रहा है और अनेक जाने-माने डिजाइनर इस क्षेत्र का रुख कर रहे हैं. ‘मिथिला पेंटिंग’ को विश्व मंच तक पहुंचाने और उसे पहचान दिलाने के लिए जितवारपुर गांव की दिवंगत जगदम्बा देवी और दिवंगत सीता देवी के अलावा बउआ देवी को भी पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.

‘मिथिला पेंटिंग’ के साथ ही इस गांव में ‘गोदना पेंटिंग’ :टैटू: की विधा भी रही है. दिवंगत रौदी पासवान ने ‘मिथिला पेंटिंग’ के साथ-साथ इस विधा को भी आगे बढ़ाया. उन्होंने अपनी पत्नी चानो देवी के साथ मिलकर गोदना शैली को स्थापित किया, उसे विस्तार दिया तथा एक नया रूप प्रदान किया था. जितवारपुर एवं उसके आसपास के क्षेत्र में इस पेंटिंग की विरासत पीढ़ी दर पीढ़ी स्त्रियों के हाथों में रही है. मिथिला के सामंती समाज में इसने स्त्रियों की स्वतंत्रता एवं उनके सामाजिक न्याय के नये मार्ग खोले. साथ ही इस कला से जातियों में बंटे समाज में समरसता भी आयी.

राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित दिवंगत चानो देवी की बहू महनमा देवी आज ‘गोदना पेंटिंग’ की अपनी बरसों पुरानी विरासत को आगे बढ़ा रही हैं और उन्हें भी इसकी बिक्री की उचित व्यवस्था ना होने की शिकायत है. इन पेंटिंग में जीव-जंतुओं, पेड़-पौधे, आस-पड़ोस के जीवन से जुड़े घटनाक्रम को दर्शाया जाता है. चित्रों में रंग भरने के लिए ज्यादातर पत्तियों, फूलों और फलों से बने प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल होता है. लगभग 800 परिवारों वाला ये गांव अभी सिर्फ ‘मिथिला पेंटिंग’ के लिए ही जाना जाता है. लेकिन, यहां पर ‘गोदना पेंटिंग’ शैली तेजी से जड़ें जमा रही है. गांव के हर घर में यह कला रचती-बसती है.

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