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चुनाव लड़ने की तैयारी में कार्यालयों तक सिमटीं पार्टियां

आप, बसपा, सपा, झामुमो के नेता चुनाव में ही आते हैं नजर, नाम मात्र का ही है बिहार में इनका अस्तित्व पटना : कई ऐसी पार्टियां हैं जिनकी दूसरे प्रदेशों में दमदार उपस्थिति हैं. लेकिन, बिहार में इनका अस्तित्व नाम मात्र का ही है. ऐसी पार्टियां यहां कार्यालयों में ही सिमटी हैं. कुछ वैसी भी […]

आप, बसपा, सपा, झामुमो के नेता चुनाव में ही आते हैं नजर, नाम मात्र का ही है बिहार में इनका अस्तित्व
पटना : कई ऐसी पार्टियां हैं जिनकी दूसरे प्रदेशों में दमदार उपस्थिति हैं. लेकिन, बिहार में इनका अस्तित्व नाम मात्र का ही है. ऐसी पार्टियां यहां कार्यालयों में ही सिमटी हैं. कुछ वैसी भी पार्टियां हैं जिनके कार्यालय की जानकारी भी लोगों को नहीं हैं.
इन दलों के प्रत्याशी लोकसभा चुनाव में ही नजर आते हैं. कुछ के नाम तो सिर्फ मतदाताओं को बैलेट पेपर पर ही देखने को मिलते हैं. ऐसे दलों के प्रत्याशियों को तो किसी-किसी विधानसभा में हजार मत पाना भी मुश्किल होता है. बड़ी क्षेत्रीय व राष्ट्रीय पार्टियों को छोड़ दिया जाये तो ऐसे दलों को बिहार से अब तक कोई प्रतिनिधि भी नहीं मिला. चाहे वह सपा हो, चाहे बसपा, झामुमो या आप जैसे दल हों.पर, अगले लोकसभा चुनाव में ये पार्टियां भी दो-दो हाथ करना चाहती हैं.
कई ऐसी पार्टियां हैं जिनकी दूसरे प्रदेशों में है दमदार उपस्थिति
उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के बाद समाजवादी पार्टी की स्थिति गुटों में बंट गयी है. बिहार में तो इस दल का कार्यालय ऑफिसर्स फ्लैट में है. नये प्रदेश अध्यक्ष देवेंद्र प्रसाद यादव के आने के बाद कुछ कार्यक्रम किसानों को लेकर चले पर उसका असर नहीं दिखा. महागठबंधन में शामिल इस दल को सीट मिलने की उम्मीद है.
बसपा का अपना भव्य कार्यालय पटना में है. पर पार्टी द्वारा बाबा साहेब की जयंती, कांशीराम की जयंती के आगे की गतिविधियों की जानकारी ही किसी को नहीं रहती है. बसपा द्वारा लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी भी उतारे जाते हैं. पर अब तक बिहार में इस दल को किसी भी लोकसभा क्षेत्र से प्रतिनिधित्व करने का अवसर नहीं मिला है.
बिहार के विभाजन के बाद झारखंड की झारखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा भी बिहार में लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी उतारे गये. इस दल की कोई गतिविधि चुनाव के बाद राज्य में नहीं दिखती. 2015 के विधानसभा चुनाव में इसके नेताओं ने बिहार में सक्रियता दिखायी थी. पर पार्टी को इसमें कोई सफलता नहीं मिली. झामुमो का एक विधायक चकाई से विधानसभा चुनाव 2010 में विजयी हुए थे.
अरविंद केजरीवाल की पार्टी आप की सक्रियता हाल के दिनों में बढ़ी है. पर उसका बिहार में किसी मुद्दे पर जोरदार आंदोलन नहीं दिखा. पार्टी के नेता संजय सिंह का बिहार में दौरा जारी है.
राजनीतिक विकृति के कारण शुरू हुआ यह प्रचलन
वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर का मानना है कि इस तरह का प्रचलन राजनीतिक विकृति के कारण है. एक ऐसा दौर था, जब बड़े दलों द्वारा अपने प्रत्याशियों को चुनावी खर्च के लिए लाखों में रकम दिया जाने लगा. इसका असर कार्यकर्ताओं पर पड़ा. उनका भी दबाव होता था कि उन्हें भी टिकट मिले जिससे वह मुनाफा कमा सकें. राजनीति में इसका भी एक अलग वर्ग तैयार हुआ.
कुछ दलों द्वारा पैसा लेकर टिकट दिये जाने लगे. ऐसे में जिनके पास अफरात पैसा था या जिनको राजनीति में पहचान बनानी थी, वैसे लोग इस तरह के दलों का टिकट लेकर मैदान में उतरे. राजनीतिक दल सीटों को बेचने लगे तो पैसा वाले, खरीदने वाले भी राजनीति में प्रवेश करने लगे. राजनीति में एक ऐसा भी वर्ग तैयार हो गया है जिनका अपना जनाधार चाहे वह सामाजिक हो या प्रभाव का हो, वैसे लोग चुनावी मैदान में आने लगे. एक ऐसा भी वर्ग है जो चुनाव में वोटकटवा की राजनीति करता है. उनको बड़े दल के नेता समर्थन देकर रखते हैं. इन्हीं कारणों से बड़ा आधार नहीं होने के बाद भी राजनीतिक दलों द्वारा अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे जाते हैं.
Prabhat Khabar Digital Desk
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