बंगाली पद्धति से होती पूजा

Updated at : 07 Oct 2016 7:29 AM (IST)
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बंगाली पद्धति से होती पूजा

प्रथम देवी प्रतिमा का प्राप्त है गौरव रेलखंड के कर्मचारियों को बांटने के लिए बनाया जा रहा तीन क्विंटल लड्डू नवादा कार्यालय : दुर्गापूजा की ऐतिहासिकता बंगाल से जुडी है. चार सौ साल पहले शक्ति पूजा के नाम से प्रारंभ हुई देवी दुर्गा की पूजा पूरे देश में सर्वाधिक लोकप्रिय उत्सव बन गया. बंगाल के […]

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प्रथम देवी प्रतिमा का प्राप्त है गौरव
रेलखंड के कर्मचारियों को बांटने के लिए बनाया जा रहा तीन क्विंटल लड्डू
नवादा कार्यालय : दुर्गापूजा की ऐतिहासिकता बंगाल से जुडी है. चार सौ साल पहले शक्ति पूजा के नाम से प्रारंभ हुई देवी दुर्गा की पूजा पूरे देश में सर्वाधिक लोकप्रिय उत्सव बन गया. बंगाल के निवासी देश में जहां-जहां गये, अपनी परंपरा व संस्कृति को उन प्रदेशों में भी प्रचार-प्रसार किया.
नवादा जिले में भी दुर्गापूजा की शुरुआत बंगाली अफसरों की देन रही हैं.सन 1950 में रेलवे के एक अधिकारी ने शक्ति की अधिष्ठात्री देवी दुर्गा की प्रतिमा की पूजा रेलवे कॉलोनी में शुरू की. धीरे-धीरे यह परंपरा पूरे जिले में फैलती चली गयी. आज के दुर्गापूजा का स्वरुप आधुनिकता के साथ मनाया जाता है. लेकिन रेलवे कॉलोनी में शारदीय नवरात्र की पूजा अपने पारंपरिक विधि विधान के साथ पूरी शुचिता व विधानों के अनुपालन के साथ होता है. रेलवे कॉलोनी की देवी पूजा पर मनमोहन कृष्ण की एक रिपोर्ट.
षष्ठी तिथि के साथ शक्ति पूजा का आरंभ: आश्विन माह के शुक्ल पक्ष में बढ़ते चांद की षष्ठी कलात्मक मुद्रा वाले दिन माता के कलश की स्थापना की जाती है. मन जाता है कि माता दुर्गा अपने बच्चों सरस्वती, लक्ष्मी, गणेश व कार्तिकेय के साथ मायके आती है. ढाक की थाप पर बेटी का स्वागत होता है. जबकि स्त्रियां उल्लू की ध्वनि निकल कर जयघोष करती हैं. बेटी के आगमन पर सभी परिवारों में खुशियां छा जाती है. इन परंपराओं को लेकर महाषष्ठी पर कोलकाता स्थित बंकुरा के आचार्य प्रशांत चटर्जी व रोवेंद्र चटर्जी घट अर्थात कलश की स्थापना करेंगे. इसके साथ ही पांच दिवसीय शक्ति पूजा की शुरुआत हो जायेगी.
महा सप्तमी के दिन नौ दिव्य वृक्षों की डालो के शक्ति स्वरुप मानकर महास्नान कराके प्रतिष्ठा कराया जाता है. देवी के प्राणदान व चक्षुदान का विधान भी सप्तमी तिथि को संपन्न होगा. महाष्टमी तिथि को राजोच्चार के साथ महापूजा होती है. इसके बाद संधि पूजा का कार्यक्रम होता है. 108 कमल के फूल व 108 दीपकों से माता की आराधना संपन्न होगी. महानवमी को कुमारी पूजा की जाती है. इसमें देवी के कुंवारी रूप में जीवित पूजा आराधना की जाती है. यज्ञ भी किया जाता है. दशमी तिथि को महिलाओं द्वारा सिंदूर खेल जाता हैं. इसके बाद ढाक व नगाड़ों की थाप पर माता के विदाई कर दी जाती है. प्रतिमाओं का विसर्जन निकट के तालाब या नदी में किया जाता हैं.
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