कटाव के भय से झोंपड़ी हटाने लगे कुंजहारावासी

Updated at : 08 Aug 2017 5:56 AM (IST)
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कटाव के भय से झोंपड़ी हटाने लगे कुंजहारावासी

परेशानी. गांव के समीप बीते एक माह से चल रहा है कोसी का कटाव, रतजगा कर रहे लोग कुंजहारा गांव में कोसी का कटाव थमने का नाम नहीं ले रहा है. नदी के आक्रामक कटाव का रूख देखकर प्रभावित होने वाली आबादी अपना घर द्वार हटाकर सुरक्षित स्थल की ओर पलायन करने लगे हैं. बेलदौर […]

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परेशानी. गांव के समीप बीते एक माह से चल रहा है कोसी का कटाव, रतजगा कर रहे लोग

कुंजहारा गांव में कोसी का कटाव थमने का नाम नहीं ले रहा है. नदी के आक्रामक कटाव का रूख देखकर प्रभावित होने वाली आबादी अपना घर द्वार हटाकर सुरक्षित स्थल की ओर पलायन करने लगे हैं.
बेलदौर : कोशी त्रासदी का लगातार दंश झेल रहा इतमादी पंचायत अब अपना एक दूसरा गांव कोशी की भेंट चढ़ने के कगार पर है. कुंजहारा गांव में कोसी का कटाव थमने का नाम नहीं ले रहा है. नदी के आक्रामक कटाव का रुख को देखकर प्रभावित होने वाली आबादी अपना घर द्वार हटाकर सुरक्षित स्थल की ओर पलायन करने लगे हैं. ग्रामीणों के मुताबिक कटाव से कई बार जनप्रतिनिधि एवं अधिकारियों को अवगत करवाया गया. लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला एवं कटाव देखते ही देखते गांव के समीप पहुंच गई. विगत एक सप्ताह से गांव के लोग घर खाली करना शुरू कर दिया है. जानकारी के मुताबिक अब तक दो दर्जन परिवारों ने अपना घर खाली कर दिया है. विस्थापित परिवार समान सहित बांध पर एवं स्कूल में जाकर शरण ले रहे है.
कोसी का कटाव गांव से महज बीस से पचीस मीटर के दूरी पर रह गया है. प्रभावित होने वाली आबादी के मुताबिक गांव का भौगौलिक इतिहास कोसी के गर्भ में समा जाएगी. अगर ऐसा नहीं हुआ तो कोसी मईया की कृपा मानी जाएगी. लगभग एक हजार आबादी वाले इस गांव को बचा पाना प्रशासन एवं सरकार के लिए चुनौती बनी हुई है. विस्थापित परिवार अपने बल बूते पर शरणार्थी बन अभावों के जिंदगी जीने को मजबूर है. इनके जख्मों पर कोई मरहम पट्टी करने वाला नहीं रह गया है. विस्थापितों को अभी तक चिन्हित करने की कार्रवाई भी शुरु नहीं किए जाने की खबर है. विस्थापित परिवारों के मुताबिक राजस्व कर्मचारी एवं मुखिया खाली हाथ आते है एवं देखकर चले जाते है.नाराज परिवार बताते हैं कि एक सप्ताह पहले बीडीओ सीओ एवं बाढ़ प्रमण्डल के एसडीआे आकर कटाव का निरीक्षण किया. इसके बावजूद भी अब तक न तो विस्थापितों को आपदा के तहत लाभ दिया गया है, और नहीं कटाव निरोधी कार्य शुरु किया गया.
कहर बरपाती कोशी के कारण कुंजहारा गांव के लोग दोहरे विस्थापन का दंश झेल रहे हैं. इसके पूर्व 1991 में इतमादी गांव कटाव का शिकार हो कोसी नदी में विलीन हो गई थी. विस्थापित परिवार विस्थापन के बाद तीन अलग अलग टोले में विभक्त हो यत्र तत्र बस गए. जिसमें कुंजहारा, चमरारही एवं पुरानीडीह इतमादी शामिल है. चमरारही एवं पुरानी डीह इतमादी इसके पूर्व के वर्षों में कोसी नदी में दूसरी बार कटाव का शिकार हो कोसी में विलीन हो गई. कुंजहारा के ग्रामीणों को उम्मीद थी कि दोनों गांव के विलीन होने के बाद कटाव का रुख मुड़ जाएगा, लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाया. सरकार भी गांव को कटाव से बचाने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई. जिस वजह से ग्रामीणों को दूसरी बार उजड़ कर बसने को मजबूर होना पड़ रहा है. ग्रामीणों के मुताबिक परिहारी गांव के निकट जिस तरह ठोकर का निर्माण कर कटाव को मोड़ दिया गया. वैसा इस गांव के निकट नहीं किया. उसका विपरीत प्रभाव इस गांव पर पड़ने लगा. कटाव के आशंका से प्रभावित परिवार विगत तीन वर्षों से इस ओर प्रशासन एवं प्रतिनिधियों का ध्यान आकृष्ट करवाया. लेकिन कटाव निरोधी कार्य इन वर्षों में नहीं किया जाने के कारण कुंजहारा के लोगों को भी दूसरी बार विस्थापित होने को मजबूर होना पड़ रहा है.
परबत्ता. प्रखंड के दियारा इलाके में बाढ़ हो या सावन भादो पशुपालक मवेशी की पूंछ पकड़कर नदी पार करते हैं. जबकि कई बार नदी की तेज धारा में बहकर कई मवेशी एवं पशु पालक अपनी जान गंवा चुके हैं. ताजा घटना गुरूवार की हैं. भरसो दियारा इलाके से तीन लोग पशुपालकों से मवेशी खरीक कर मवेशियों को लेकर गंगा की उपधारा पार कर रहे थे. अचानक मवेशी की पूंछ उन तीनों के हाथों से छूट गया. तीनों गंगा के पानी में बह गये. दो लोग तो अपनी जान बचा लिया लेकिन एक की मौत हो गई. सावन भादों में बाढ़ की पानी से दियारा इलाका डूब जाता है. पशुपालक कुछ दिन गंगा की उपधारा के टिले पर अपना समय व्यतीत करते हैं. पून: ऊंचे स्थान जाने के लिए उनको गंगा की उपधारा पार करना पड़ता है. उस वक्त अपने मवेशी की पूंछ पकड़कर उपधारा को पार करते हैं.
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