Kargil Vijay Diwas 2023: बिहार के जांबाजों ने जब दुश्मनों के छुड़ाए थे छक्के, पढ़िए 'ऑपरेशन विजय' की कहानी

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 26 Jul 2023 9:03 AM

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कारगिल युद्ध करीब 83 दिन चला था. 03 मई को युद्ध शुरू हुआ था और 26 जुलाई 1999 को भारत को कारगिल युद्ध में विजय मिला था. इसमें 530 जवान-अफसर युद्ध में शहीद हुए थे. 1363 जवान व अफसर सीने पर दुश्मनों के गोली खाकर जख्मी हुए थे.

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कारगिल युद्ध को 24 साल बीत गए. जब युद्ध छिड़ा तब सैकड़ों वीर जवानों ने देश की सीमा की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे. बिहार के वीर सपूतों ने भी जान की बाजी लगा कर दुश्मनों को मार गिराया. कारगिल युद्ध करीब 83 दिन चला था. 03 मई को युद्ध शुरू हुआ था और 26 जुलाई 1999 को भारत को कारगिल युद्ध में विजय मिला था. इसमें 530 जवान-अफसर युद्ध में शहीद हुए थे. 1363 जवान व अफसर सीने पर दुश्मनों के गोली खाकर जख्मी हुए थे. इसमें बिहार के मुजफ्फरपुर के सिपाही प्रमोद कुमार और नायक सुनील कुमार सिंह सहित 16 जवान और अफसर शहीद हुए थे. इन वीर जवानों की स्मृति में 26 जुलाई को विजय दिवस मनाया जाता है. इस अवसर पर प्रभात खबर की ओर से शहीदों को श्रद्धांजलि और सोमनाथ सत्योम की विशेष रिपोर्ट

उत्तर बिहार की माटी को वीरों की शहादत पर है गर्व

द्रास सेक्टर में दुश्मनों के गोलियों से वीरगति को प्राप्त होने वाले बिहार रेजीमेंट के बहादुर जवान सह कुढ़नी के माधोपुर सुस्ता निवासी शहीद प्रमोद की मां दौलती देवी की आंखें आज भी नम है. चेहरे पर उदासी है. आवाज भी लड़खड़ा रही है. लेकिन, हिम्मत, धैर्य, दिलासा के साथ बताती है कि बेटा खोने का टीस आज भी उनके सीने में मारता है. पर खुशी इस बात की है कि उन्होंने अपना बेटा देश के लिए खोया है. वह देश के लिए शहीद हुआ है. बताती है कि उसके बड़े भाई को 30 मई 1999 को ही इसका आभास हो गया था कि उनका भाई लड़ते-लड़ते शहीद हो गया है. उस वक्त वह नौ बिहार रेजिमेंट में थे. युद्ध में जाने से पहले प्रमोद ने उन्हें बताया था कि वह मेजर सदानंद के साथ वह द्रास सेक्टर में जा रहा है. सूचना आयी थी कि मेजर सदानंद सहित पांच द्रास में शहीद हो गये है. बताया कि 30 मई 1999 को द्रास सेक्टर में साथियों खोजने गये जवान प्रमोद का पार्थिव शरीर पूरे 38 दिनों के बाद मिला बर्फ में ढका मिला था. वहीं 48 दिन बाद पार्थिव शरीर गांव माधोपुर सुस्ता आया था. भाई श्यामनंदन यादव ने कहा कि उत्तर बिहार के वीरों पर उन्हें गर्व है. एक शहीद का भाई कहलाना भी फर्क महसूस करता है.

दुश्मनों से पंगा लेते पहाड़ से गिरकर वीरगति को प्राप्त हुए थे नायक सुनील

करजा थाना फंदा निवासी नायक सुनील कुमार सिंह सियाचिन में दुश्मनों से पंगा लेते शहीद हो गये थे. 23 जुलाई को नायक सुनील कुमार सिंह दुश्मनों से सियाचिन की ग्लेशियर पर दुश्मनों की ईंट से ईंट बजा रहें थे. इसबीच एक दुश्मन से पंगा लेने के दौरान पहाड़ के नीचे गिर गये और वीरगति को प्राप्त हुए. तीन दिन बाद उनका पार्थिव शरीर करजा के फंदा गांव पहुंचा था. जहां सैनिकों की सलामी के बीच उन्हें नम आंखों से अंतिम विदाई दी गयी थी. इसके बाद नायक सुनील की पत्नी की राह आसान नहीं था. उसके अपने परिजनों ने ही उसे सताना शुरू कर दिया. ससुराल पक्ष ने उसे उस वक्त वहां से निकाल दिया. मायके पक्ष यानी पिता ने एक बार फिर साथ दिया. साथ ही जिला सैनिक कल्याण बोर्ड ने भी मीना को मदद की. उसके हक के लिए मुजफ्फरपुर से लेकर दिल्ली तक की जंग लड़ी और मीना को जीत दिलायी. फिलहाल मीना वर्तमान में बिहार सरकार में सेवा दे रही है. बच्चे को भी काबिल बना चुकी है.

सिंधु नदी के किनारे हो रही सेलिंग के बीच पहुंचे थे अपने पोस्ट

मनियारी माधोपुर के बहादुर रामबाबू सिंह कारगिल युद्ध में शामिल थे. इंजीनियरिंग कोर के जवान थे. युद्ध के बीच सूचना पहुंचाने की जिम्मेदारी थी. अपने पोस्ट से सिंद्धु नदी किनारे और पहाड़ से होकर कारगिल के डाह बटालिक पहुंचे थे. जहां पाकिस्तान लगातार सेलिंग कर रहा था. यह पहुंचने पर रेडियो फ्रिक्यूेंसी के माध्यम से सूचना पहुंचाने का काम किया था. रामबाबू सिंह बताते है उस वक्त जुनून सवार था. घर परिवार भी याद नहीं रहता था. पांच मई को ही उनलोगों को युद्ध की सूचना मिल चुकी था. इसके तुरंत बाद फरमान भी आ गया और वे लोग युद्ध में बढ़ चढ़कर हिस्सा भी लिये.

राम में रस्सी के सहारे पहाड़ पर चढ़ साथियों को पहुंचाया था हथियार

शहर के पड़ाव पोखर निवासी देव आनंद ठाकुर भी कारगिल युद्ध के चश्मदीदों में से एक है. उस वक्त वह अल्मोड़ा में तैनात थे. लेकिन, युद्ध के बीच उनकी गोरखा बटालियन की पोस्टिंग कारगिल में हो गयी. टाइगर हिल्स और थर्ड ग्लेशियर पर तैनात कर दिये गये. वे लोग नीचे थे और दुश्मन हजारों मीटर उपर था. कई यूनिट उपर युद्ध कर रहें थे. देव आनंद ठाकुर ने बताया कि वे लोग रात की अंधेरे में रस्सी के सहारे पहाड़ पर चढते थे. हथियार, खाना, दवा और गोपनीय सूचनाएं लेकर जाते थे. कई बार तो रस्सी टूटी गिरे, फिर भी वही काम करते थे. इसे लेकर देवा आनंद को ओपी कारगिल मेडल से सम्मानित भी किया गया है. साथ ही दर्जनभर से अधिक मेडल से अपने सेवा काल में नवाजे गये है.

परिस्थिति चाहे कैसी भी हो, हमें कारगिल फतह करना था

वायु सैनिक प्रवीण रंजन ने बताया कि कारगिल युद्ध के समय अंबाला में एक रडार इकाई में तैनात थे. लड़ाई शुरू होने पर उच्चाधिकारियों ने उन्हें श्रीनगर वायुसेना स्टेशन भेज दिया . जहां रडार नियंत्रण कक्ष में फाइटर प्लेन को नियंत्रित करने में जुट गये. बताया की उस वक्त परिस्थिति ऐसी थी कि पूरी रात-दिन श्रीनगर से फाइटर प्लेन से दुश्मन हमला करने जाते-आते रहते थे. आमने-सामने की लड़ाई लड़ रहे थे. सैनिकों को रसद-पानी भी श्रीनगर से ही आता था. फिर वहां से उन्हें भेजा जाता था. बताया कि उस वक्त एक ही बात दिमाग में था कि परिस्थिति चाहे कैसी भी हो, हमें कारगिल फतह करना है.

बिहार के वीर सपूत

– मेजर चंद्र भूषण द्विवेदी – शिवहर

– नायक गणेश प्रसाद यादव – पटना

– नायक विशुनी राय- सारण

– नायक नीरज कुमार – लखीसराय

– नायक सुनील कुमार सिंह – मुजफ्फरपुर

– लांस नायक विद्यानंद सिंह – आरा

– लांस नायक राम वचन राय- वैशाली

– हवलदार रतन कुमार सिंह – भागलपुर

– अरविंद कुमार पांडेय – पूर्वी चंपारण

– प्रमोद कुमार – मुजफ्फरपुर

– शिव शंकर गुप्ता – औरंगाबाद

– हरदेव प्रसाद सिंह – नालंदा

– एम्बू सिंह- सीवान

– रमन कुमार झा – सहरसा

– हरि कृष्ण राम – सीवान

– प्रभाकर कुमार सिंह – भागलपुर

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