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सेनारी नरसंहार : 10 दोषियों को फांसी व तीन को आजीवन कारावास

Updated at : 15 Nov 2016 10:56 AM (IST)
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सेनारी नरसंहार : 10 दोषियों को फांसी व तीन को आजीवन कारावास

पटना: बिहार के सेनारी नरसंहारमामले में मंगलवारको जहानाबादकीसिविल कोर्ट ने 15 दोषियों को सजा सुनाया है. अदालत ने इस मामले में 10 दोषियों को फांसी, तीन को आजीवन कारावास की सजा केसाथ ही तीन लोगों पर एक-एक लाख रुपये आर्थिक दंड लगाया है. वहीं, दो दोषियों को बाद में सजा सुनायी जायेगी. अदालत के इस […]

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पटना: बिहार के सेनारी नरसंहारमामले में मंगलवारको जहानाबादकीसिविल कोर्ट ने 15 दोषियों को सजा सुनाया है. अदालत ने इस मामले में 10 दोषियों को फांसी, तीन को आजीवन कारावास की सजा केसाथ ही तीन लोगों पर एक-एक लाख रुपये आर्थिक दंड लगाया है. वहीं, दो दोषियों को बाद में सजा सुनायी जायेगी. अदालत के इस फैसले केमद्देनजर सेनारी गांव की सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गयी है.

इससे पहले 27 अक्टूबर को इस मामले की सुनवाई करते हुए अपर न्यायाधीश तृतीय रंजीत कुमार सिंह की अदालत ने 15 आरोपितों को दोषी करार दिया था. वहीं, साक्ष्य के अभाव में 23 लोगों को रिहा किया गया था. अदालतने धारा 146, 302, 149, 307, 149, 3/4 एस एक्ट के तहत अभियुक्तों को दोषी करार दिया था.अदालत ने सजा सुनाने के लिए 15 नवंबर की तिथि मुकर्रर की थी.अदालत के द्वारा सजा सुनाए जाने को लेकर पक्ष और विपक्ष दोनों की नजरअदालत पर टिकी हुई थी.

चिंतामणि देवी ने दर्ज करायी थी एफआइआर

गांव की ही चिंतामणि देवी ने करपी थाने में 15 नामजद समेत चार-पांच सौ अज्ञात हमलावरों के खिलाफ एफआइआर दर्ज करायी थी. चिंता देवी के बयान पर गांव के 14 लोगों सहित कुल 70 नामजद लोगों को अभियुक्त बनाया गया था. चिंता देवी के पति अवध किशोर शर्मा व उनके बेटे मधुकर की भी इस वारदात में मौत के घाट उतार दिया था. चिंता देवी की तकरीबन पांच वर्ष पूर्व मौत हो चुकी है. मामले में कुल 67 लोग गवाह बने थे जिसमें से 32 ने सुनवाई के दौरान गवाही दीथी.

खेल ली गयी थी ‘खून की होली’
बिहार मेंनब्बे के दशक में सवर्णों और पिछड़ों के बीच जमीन पर कब्जा और मालिकाना हक को लेकर चलने वाले हिंसक संघर्ष के परिणास्वरूप इस दौर में कई लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी. ऐसी ही घटनाओं में से एक सेनारी नरसंहार की भी घटना थी. 18 मार्च 1999को प्रतिबंधित नक्सली संगठन एमसीसी ने जहानाबाद जिले के इस सवर्ण बाहुल्य गांव में होली से ठीक पहले खून की होली खेली थी. 500-600 की संख्या में रहे हथियारबंद लोगों ने उस समय सेनारी गांव पर हमला बोल दिया था जब गांव के सारे लोग अभी ठीक से खाना भी नहीं खा पाये थे.

एक के बाद एक 34 जानें चीख में तब्दील होगयी. गांव के लोग एक-एक कर के मौत के घाट उतारदियेगये. उन्हें गांव के उत्तर सामुदायिक भवन के पास ले जाकर गर्दन रेतकर हत्या कर दी गयी थी. गांव स्थित ठाकुरबाड़ी के समीप नक्सलियों ने घटना को अंजाम दिया था. इस घटना में सात लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे. बताया जाता है कि नक्सलियों ने करीब 40 से अधिक लोगों को अपने कब्जे में ले लिया था. महिलाओं को घरों से बाहर निकलने नहीं दिया जा रहा था.उसदौरान बिहार में राजद सत्ता में थी.

केंद्र सरकार में बतौर मंत्री जार्ज फर्नाडींस, नीतीश कुमार और यशवंत सिन्हा ने तब सेनारी का दौरा किया था और नेताओं के आने के बाद हीं शवों को उठाया गया था. घटना के 17 साल बीतने के बाद भी गांव के लोग उस खौफनाक रात के मंजर को याद कर सिहर उठते हैं.

पुलिस ने दाखिल किया था चार आरोप पत्र
सेनारी नरसंहार मामले में पुलिस के द्वारा अलग-अलग तिथियों में चार आरोप पत्र दाखिल किया था. इनमें 88 लोगों को अभियुक्त बनाया गया था. पहला आरोप पत्र 16 जून 1999 को दाखिल किया गया था. इसमें से 37 गिरफ्तार आरोपितों तथा 14 फरार आरोपितों के खिलाफ आरोप पत्र पुलिस के द्वारा दायर किया गया था. दूसरा आरोप पत्र 27 अक्टूबर 1999 को दाखिल किया गया था. तीसरा आरोप पत्र 20 फरवरी 2000 को दाखिल किया गया था. इसमें 17 गिरफ्तार आरोपितों एवं 18 फरार लोगों के खिलाफ आरोप पत्र समर्पित किया गया था.

जिनमें विनय पासवान, अरविंद यादव, मुंगेश्वर यादव, बुटाई यादव, गोपाल साव, गोराई पासवान, ललन पासी, सत्येंद्र दास, करिमन पासवान, उमा पासवान, बचकेश कुंवर सिंह, बुधन यादव, गनौरी मांझी शामिल हैं. दोषी करार में से दो अभियुक्त न्यायालय में उपस्थित नहीं हो पाये हैं.

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