जलसंकट से निबटने के लिए आहर व पइन को करना होगा पुनर्जीवित
Updated at : 26 Jul 2019 4:17 AM (IST)
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जहानाबाद : पिछले कई सालों से लगातार जिले में जल संकट गहरा रहा है और किसानों को सूखे की मार झेलनी पड़ रही है. सिंचाई और पेयजल के लिए पानी की किल्लत से गांव और शहर जूझ रहे हैं. धान की फसल रोपने के बाद किसानों की निगाहें आसमान की ओर टकटकी लगाये हुए है. […]
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जहानाबाद : पिछले कई सालों से लगातार जिले में जल संकट गहरा रहा है और किसानों को सूखे की मार झेलनी पड़ रही है. सिंचाई और पेयजल के लिए पानी की किल्लत से गांव और शहर जूझ रहे हैं. धान की फसल रोपने के बाद किसानों की निगाहें आसमान की ओर टकटकी लगाये हुए है. बारिश न होने पर फसल तो हाथ से जायेगी ही, पूंजी भी डूबने का खतरा मंडरा रहा है.
सरकार सिंचाई के लिए जल उपलब्ध कराने के हर संभव उपाय पर काम कर रही है. ट्यूबवेलों से खेतों की सिंचाई हो रही है. वहीं नहरों का जाल बिछाने और उसके पक्कीकरण के काम भी जिले में जारी है, लेकिन इन सभी उपाय तभी कारगर होंगे जब या तो नहरों में पानी आयेगा या फिर खूब बारिश से भूमिगत जल का स्तर बना रहेगा, लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है.
सरकार और किसानों द्वारा सिंचाई की परंपरागत प्रणालियों की लगातार अनदेखी के कारण आज सूखाड़ की स्थिति बनी है. जिले से गुजरने वाली सभी नदियां बरसाती है, जिनमें बरसात के बाद कुछ ही समय के लिए पानी रहता है. बाकी समय ये सूखी रहती हैं.
ऐसे में जब तक इस पानी को सहेजने के उपाय नहीं किये जायेंगे तब तक जल संकट से निबटना मुश्किल है. भारत में विभिन्न प्रदेशों में कई तरह की परंपरागत सिंचाई प्रणाली प्रचलन में है. दक्षिण बिहार के इलाके में आहर और पइन प्रणाली के माध्यम से सिंचाई सदियों से की जा रही है.
सदियों पुरानी व्यवस्था जलसंचय के लिए सबसे असरदार
पानी भरने के लिए ढलान के तीन ओर बनायी गयी संरचना को आहर कहते हैं. आहर और पइन का सम्मिलित रूप से उपयोग लगभग हर तीन या चार गांव के बीच में किया जाता है. नहरों से पइन के माध्यम से पानी आहर में इकट्ठा करने की व्यवस्था रहती है.
कई जगह आहर से भी छोटी-छोटी पइन निकलती है, जो कई सौ हेक्टेयर में सिंचाई के लिए पर्याप्त होती है. आहर और पइन का उपयोग गांव वाले सामूहिक रूप से करते हैं. बरसात की शुरुआत में जब नहर या पइन के माध्यम से नदियों या वर्षा का पानी आता है तब आहर को पूरी तरह जल से भर लिया जाता है.
पहले के समय में पानी आने पर आहर भरने के लिए गांव में मुनादि करवायी जाती थी. सभी किसान मिलकर आहर से निकलने वाले रास्तों को बंद कर पानी को इकट्टा करते थे. इस पानी का उपयोग बारिश के न होने पर धान की फसल की सिंचाई के लिए सामूहिक रूप से किया जाता था. कई बार तो धान के बाद गेहूं समेत रबी फसलों के सिंचाई में ही किया जाता था.
वर्तमान में सरकार ने नहरों पर ज्यादा जोर देने से और गांवों में सामूहिकता की भावना खत्म होने से आहर-पइन प्रणाली को अनदेखा किया जा रहा है और इसका समुचित लाभ नहीं मिल रहा है. बिहार सरकार के कृषि रोड मैप में आहर-पइन प्रणाली के पुनरूद्धार की बात कही गयी है, लेकिन सरकार का ज्यादा जोर नदियों को जोड़ने और नहरों के पक्कीकरण पर है.
ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने पूर्वजों द्वारा सदियों से उपयोग किये जा रहे जल संचय की परंपरागत पद्धति आहर-पइन को फिर से पुनर्जीवित करें. जहानाबाद जिले समेत आसपास के जिलों की भौगोलिक संरचना के अनुसार आहर-पइन व्यवस्था पानी के सर्वोतम उपयोग की अद्भुत देशी प्रणाली है. जब तक आहर-पइन प्रणाली मजबूत रही तब तक जिले में अकाल और सूखे का ज्यादा असर नहीं पड़ा.
क्या कहते हैं पदाधिकारी
जिले में आहरों की संख्या 261 हैं. मनरेगा के माध्यम से कुछ आहरों और पइन की उड़ाही करवायी गयी है. बरसात में आहर जल संचय की उत्तम व्यवस्था है, जिससे दो-तीन महीनों तक सिंचाई और भूमिगत जल रिचार्ज होते रहता है.
शंभु कुमार, जिला मत्स्य पदाधिकारी, जहानाबाद
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