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रेशम के कीड़े की खेती ने बदली रुक्मिणी की जिंदगी, जानें आज कितनी होती है आमदनी

Updated at : 11 Sep 2020 9:59 AM (IST)
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रेशम के कीड़े की खेती ने बदली रुक्मिणी की जिंदगी, जानें आज कितनी होती है आमदनी

पटना : हुनर हम सभी में होता है. बस उसे सही पर निखारने वाला चाहिए. कुछ ऐसा ही पूर्णिया जिले के धमदाहा प्रखंड के चंद्रेही गांव की रुक्मिणी देवी के साथ हुआ है. परिवार को पालने के लिए जमीन के छोटे-से टुकड़े पर किसी तरह से खेती करती थी. लेकिन आज वह रेशम के कीड़े की खेती कर महीने सात-आठ हजार रुपये आराम से कमा रही हैं.

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जूही स्मिता, पटना : हुनर हम सभी में होता है. बस उसे सही पर निखारने वाला चाहिए. कुछ ऐसा ही पूर्णिया जिले के धमदाहा प्रखंड के चंद्रेही गांव की रुक्मिणी देवी के साथ हुआ है. परिवार को पालने के लिए जमीन के छोटे-से टुकड़े पर किसी तरह से खेती करती थी. लेकिन आज वह रेशम के कीड़े की खेती कर महीने सात-आठ हजार रुपये आराम से कमा रही हैं. रेशम के कीड़े की खेती की ट्रेनिंग उन्हें जीविका से मिली. आज इनके परिवार में खुशियां ही खुशियां हैं.

खेती कर किसी तरह होती थी गुजर-बसर

रुक्मिणि देवी बताती हैं कि उनकी शादी नरेश कुमार से 1992 में हुई. उस वक्त उनके पास जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा था. इस पर पति-पत्नी खेती कर जिंदगी बीता रहे थे. तीन बच्चों के होने के बाद खेती से होने वाली आमदनी कम पड़ने लगी. कभी तीन समय का खाना बनता तो कभी एक समय का किसी तरह से खाना बनता. रुक्मिणि की हालात के बारे में कम्यूनिटी मोबिलाइजर(सीएम) रंजना कुमारी को पता चला.

सात दिनों की मिली ट्रेनिंग

मलबरी सलाहकार अशोक कुमार मेहता बताते हैं कि उन्होंने रुक्मिणि को सात दिनों की ट्रेनिंग दी, जिसमें पांच दिन रेसिडेंशियल और दो दिनों की एक्सपोजर ट्रेनिंग थी. इस दौरान किन-किन उपकरणों का इस्तेमाल करना है, कैसे मलबरी की खेती करनी है, किस तरह से रेशम के कीड़े को पालना है, के बारे में बताया. इस परियोजना के अंतर्गत कीटपालन गृह सहायाता राशि के तौर एससी-एसटी कैटेगरी के लोगों को 1.20 लाख रुपये और जेनरल कैटेगरी को 60 हजार रुपये दिये जाते हैं. खेती करने में 20 -25 दिन लग जाते हैं. वहीं, इस साल अब तक उन्होंने 40 किलो कोकुन तैयार किया है. साल में वह 70,000 से 80,000 रुपये कमा लेती हैं. वह आगे बताती हैं कि खेती और कीड़े पालने के बाद जो रेशम निकलता है, उसे परियोजना के अंतर्गत जीविका की दीदियों को मुहैया करवाया जाता है. फिर इसी रेशम के धागे से साड़ी बनाकर गांधी मैदान और ज्ञान भवन में आयोजित होने वाले अलग-अलग मेलों में स्टॉल लगाकर बेचा जाता है.

2010 में जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं

रुक्मिणि बताती हैं कि उनकी हालत देख कर सीएम दीदी ने उन्हें विकास जीविका स्वयं सहायता से जोड़ा और लोन पर कुछ पैसे भी दिये. इससे रुक्मिणी ने कुछ और जमीन लीज पर लेकर खेती शुरू की. कुछ ही महीनों में उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ.

नेचर फ्रेंडली कोकुन राखियां बना कमाये 20 हजार रुपये

रुक्मिणी बताती हैं कि इस बार रक्षा बंधन पर कोकुन से बायोडिग्रेडेबल व नेचर फ्रेंडली राखियां तैयार कीं, जिन्हें लोगों ने काफी सराहा. राखी के दो दिन पहले बनाने की वजह से उन्होंने यहां के होल सेलर और अन्य व्यापरियों को ये राखियां दीं. इससे 17,000 से 20,000 रुपये की कमाई की.

2018 में मलबरी परियोजना का मिला लाभ

रुक्मिणि के पास किसान के सारे लक्षण थे. कब खेत को जोतना है और कब बीजों को बोना है ? इसकी अच्छी जानकारी थी. ऐसे में वहां के कम्यूनिटी मोबिलाइजर नंद किशोर ने उन्हें 2018 में मलबरी परियोजना(एमकेएमसी) के बारे में बताया. इसके अंतर्गत लोगों को किस तरह से रेशम के कीड़े को घर पर पाले, कैसे मलबरी की खेती करें, के बारे में बताया जाता है. साथ ही उससे जुड़े उपकरण भी दिये जाते हैं.

posted by ashish jha

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