जलीय उत्पादों के कारण मिथिला की विशेष पहचान
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :31 May 2017 9:01 AM (IST)
विज्ञापन

दरभंगा : डॉ प्रभात दास फाउंडेशन व ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में ”मिथिला के जलीय उत्पादन एवं विपणन” विषय पर कार्यशाला का आयोजन केंद्रीय पुस्तकालय में किया गया. मुख्य अतिथि सह सीबीआई के पूर्व डीआईजी चन्द्रशेखर दास ने कार्यशाला में कहा कि मिथिला ही पहचान आध्यात्मिक दर्शन से है, पर यह क्षेत्र […]
विज्ञापन
दरभंगा : डॉ प्रभात दास फाउंडेशन व ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में ”मिथिला के जलीय उत्पादन एवं विपणन” विषय पर कार्यशाला का आयोजन केंद्रीय पुस्तकालय में किया गया. मुख्य अतिथि सह सीबीआई के पूर्व डीआईजी चन्द्रशेखर दास ने कार्यशाला में कहा कि मिथिला ही पहचान आध्यात्मिक दर्शन से है, पर यह क्षेत्र अपने जलीय उत्पादों (मखाना, मछली, सिंघाड़ा, पुरायतन पात आदि) के कारण भी जाना जाता है.
जलीय उत्पादों की बदौलत ही मिथिला समृद्धशाली है. वैसे धीरे-धीरे यहां के लोगों का इन उत्पादों से मोहभंग होने लगा है. जिस मिथिला से देश-विदेश में मछलियों का निर्यात होता था, वहां अब आंध्रा की मछली बिक रही है. मिथिला की पहचान में शुमार पान, मखाना और मछली तीनों का उत्पादन प्रभावित हो चुका है. राजनीतिक कूचक्र के कारण मिथिलांचल में विपन्नता पांव पसार रही है. श्री दास ने बताया कि जहां उद्योग नहीं होता है वहां विकास नहीं हो पाता है. मिथिलांचल का मुख्य उद्योग यहां के जलीय उत्पाद हैं. इनके उत्पादन में कमी का मुख्य कारण मार्केटिंग में आनेवाली बाधाएं हैं. अगर यहां के मखाना-मछली, सिंघारा आदि की बेहतर ढ़ंग से मार्केटिंग की जाए तो मिथिला भी आंध्र प्रदेश की तरह सिर्फ देसी मछलियों की बदौलत समृद्धशाली बन सकती है.
समाप्त हो रहा तालाबों का वजूद
मुख्य वक्ता प्रो़ नरेन्द्र नारायण सिंह ‘निराला’ ने कहा कि कला व साहित्य जनजीवन का आईना होता है. मिथिला पेंटिंग और दरभंगा राज में मछली को प्रमुखता दी गई है, तो इसका एकमात्र कारण मिथिला की संपन्नता का आधार मछली (जलीय उत्पाद) था. मिथिला के सभी जिलों में तालाब-पोखरों का निर्माण इसलिए करवाया गया था, कि बाढ़ के पानी का प्रबंधन हो.
साथ ही जलीय उत्पादों से आर्थिक लाभ भी मिले. आधुनिक युग में तालाब-पोखरों का वजूद ही समाप्त होने लगा है. इसके चलते जलीय उत्पाद का उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है. उन्होंने सुझाव देते हुए बताया कि सरकार को इस ओर पहल करनी होगी. मृतप्राय हो चुके पोखर-तालाब को पुनर्जीवित करना होगा. मिथिला के जलीय उत्पादों का प्रचार-प्रसार करना होगा.
युवाओं को स्वरोजगार के लिए आना होगा आगे
अध्यक्षता करते हुए लनामिवि के पूर्व वीसी प्रो़ राजकिशोर झा ने कहा कि मिथिला के जलीय उत्पादों को अनुसंधान कर और बेहतर बनाया जाए. स्वरोजगार के इच्छुक युवाओं को इस क्षेत्र से जोड़ा जाए. इससे जलीय उत्पादों की बदौलत यह क्षेत्र आर्थिक रूप से समृद्ध बनेगा.
मिथिला की मछली की चर्चा करते हुए डॉ झा ने कहा कि यहां की देसी मछली, मांगुर, गैंची, कवई, रेहु, कतली, नैनी आदि की मांग हर क्षेत्र में है. कार्यशाला में सुमन सिंह, जामुन सहनी, उदय जायसवाल, हीरा सहनी ने संबोधित किया. कार्यक्रम का संचालन अर्थशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ राम भरत ठाकुर तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रो़ हिमांशु शेखर ने किया. प्रो़ विजय कुमार यादव, प्रो़ हरेराम मंडल, प्रो़ हरिंद्र कुमार मिश्रा, प्रो़ एमएम चक्रवर्ती, अल्पना श्री, ज्योति कुमारी, चंदन कुमार, विवेकानंद, शंभू दास, रंजीत कुमार महतो, मिथिलेश पासवान, गोपाल कृष्ण झा, विकास कुमार श्रीवास्तव उपस्थित थे.
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
विज्ञापन
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए
विज्ञापन




