सर्दी में खुले में बसेरा, नहीं दिखी अलाव की व्यवस्था

By Prabhat Khabar Digital Desk
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कथाकार प्रेमचंद की ‘पूस की रात’ कहानी यदि आप पढ़े होंगे तो ठंड में हल्कू और उसके साथी जबरा की पीड़ा एवं सबकुछ खत्म होने के बाद भी ठंड से राहत की खुशी भी जानते होंगे. जिले में वहीं पूस की रात है, ठंड है और आपको शहर के हर मोड़ पर खुले आसमान के नीचे हल्कू और जबरा की तरह देह सिकुड़ाये लोग मिल जायेंगे, जिन्हें देख आप उनकी रात की पीड़ा समझ सकते हैं. वहीं इस दौरान प्रशासन की ओर से अलाव की व्यवस्था न के बराबर देखने को मिली. प्रभात खबर अखबार ने पूस की रात की ठंड और इसमें प्रशासनिक राहत दिये जाने की पड़ताल की.

साहब! खुले आसमान में भला नींद कैसे आयेगी, अब आग ही सहारा है
नाथ बाबा मंदिर के पास खुले आसमान के नीचे 15 से 18 लोग सोये हुए थे. किसी ने पूरे शरीर को प्लास्टिक से ढंका है तो कोई कंबलों से. गाजीपुर के तारकेश्वर को नींद नहीं आ रही है. वे लकड़ी सुलगाकर आग ताप रहे थे.
एक साल पहले पेड़ से गिरने के कारण पैर टूट गया था. इलाज ठीक से नहीं हुआ और आज भी काफी दर्द करता है. उनसे पूछने पर कि नींद क्यों नहीं आ रही है तो जवाब दिये, साहब! इस खुले आसमान के नीचे कंबलों से ठंड कहां जा रही है. कंबल तो शीत में भींग जा रहे हैं.
अब तो यह आग ही सहारा है. यहां नगर परिषद से कई बार अलाव मिला लेकिन, पर्याप्त नहीं रहा. पास में वृद्ध गुलाब मैल-कुचैल कपड़ों में बाल से लेकर दाढ़ी तक सफेद. अपनी पत्नी के साथ बैठे हैं. वह भी आग से ठंड दूर कर रहे है. थोड़ी चहलकदमी और बातचीत होने की आवाज सुनकर पास में ही सो रहा रजनीस, दिनेश और मनती जग जाते हैं.
तीनों हम उम्र हैं. करीब दस-ग्याहर वर्ष के बच्चे. बच्ची मनती अनाथ है. अपने दादा राम जी राम के साथ रहती है. पांच वर्ष पूर्व किसी बीमारी में उसके मां-बाप चल बसे. तब से अब तक दादा और अन्य लोगों के साथ ही रहकर भीख मांगती है.
समय-रात के साढ़े 10 से 12 बजे तापमान- 11 डिग्री सेल्सियस
नगर पर्षद को शहर के चौक-चौराहों पर अलाव जलाने की जिम्मेदारी दी गयी है. यदि कहीं नहीं जल रहा है तो इसकी जानकारी ली जायेगी. नप के पदाधिकारी से बात की जायेगी. वैसे हर चौक-चौराहों पर अलाव जलाया गया था.
केके उपाध्याय, सदर एसडीओ, बक्सर
स्टेशन के बाहर शेड के नीचे सोये हुए मिले वृद्ध, अलाव की व्यवस्था नहीं
स्टेशन पर बाहर खुले में सोये हुए लोग मिले. स्टेशन रोड में बिजली की जहां-तहां चकाचौंध रोशनी से सड़क पर उजाला पसरा था. वहीं विजया बैंक के चबूतरे पर करीब 85 वर्षीया वृद्ध महिला दिखीं. अपने आप को कंबलों और कई गर्म कपड़ों से लपेटे ताकि अंदर शरीर तक पछुआ हवा न छेद सके.
शरीर को कपड़ो से अभेद बनायी महिला से जब पूछा गया कि वह कहां से आयी है, तो उसने बताया कि उसे घर के लोगों ने भगा दिया है. स्वयं को यूपी के कासगंज की बताती है.
अखबार के प्रतिनिधि ने थोड़ी संवेदना दिखाते हुए वृद्ध महिला को खाने के लिए बिस्कुट के पैकेट भी दिये. लेकिन, सवाल यह है कि आखिर प्रशासन की नजर इस महिला पर क्यों नहीं गयी. जबकि स्टेशन रोड में पुलिस और अन्य प्रशासनिक पदाधिकारियों की गश्ती हमेशा होती है.
चबूतरे पर सोये मिले मजदूर
सर्वशिक्षा अभियान कार्यालय के परिसर स्थित शेडनुमा चबूतरे पर दो मजदूर थे. एक कंबल ओढ़कर सोया हुआ था, जबकि दूसरा बैठा हुआ दोनों हाथों को मलता. हाथ मलकर शरीर को गर्मी देने की कोशिश थी. पास में पत्तों को इकट्ठा कर जलाया गया था. लेकिन, पत्तों की आग कब तक ठहर सकती थी.
कुछ देर बाद पत्ते राख में तब्दील हो गयी. ऐसे में हाथ रगड़कर ही गरमी लेना विवशता थी. आरा शहर के रहने वाले रिंकू राम कई सालों से यहां रिक्शा चलाते हैं. गहमर के पप्पू खरवार भी मजदूरी करते हैं.
पास में कुत्ते भी बैठे थे, जो राख की गर्मी से राहत महसूस कर रहे हैं. इन्हें शहर के रैन बसेरा का पता भी नहीं है. दोनों लोगों को रैन बसेरा का पता भी बताया गया ताकि वे अपनी अगली ठंड की रातों को खुले में नहीं बिताये.
बिना आग तापे नहीं जाती ठंड
बस स्टैंड में पसरा अंधेरा
बाइपास रोड में स्थित जय प्रकाश बस पड़ाव पर पूरी तरह अंधेरा पसरा रहा. यहां लगे हाइमास्ट लाइट खराब है. कई जगहों के लिए खुलने वाली बसों में कुछ यात्री बैठे हुए हैं. लेकिन, अंधेरा होने के कारण लोगों को काफी परेशानी हो रही थी.
अलाव की व्यवस्था तक नहीं थी. एक चाय की दुकान खुली थी, जिसकी लाइट से बस स्टैंड का कुछ भाग रौशन था. यदि यह दुकान नहीं रहे तो बस स्टैंड का पूरा इलाका अंधेरे में डूबा रहेगा. अंधेरे के कारण लोगों को असामाजिक तत्वों का भी डर रहता है.
रामलीला मंच के नीचे सोये मिले लोग
रामलीला मंच के नीचे सोये लोग यूपी गाजीपुर और लालगंज के रहने वाले अनुसूचित जनजाति के हैं. ये नगर पर्षद में सफाई कार्य करते हैं. लेकिन, रहने की व्यवस्था नहीं है. ठंड इतनी है कि इन्हें भी नींद नहीं आ रही है. शंभू डोम तगाड़ी में लकड़ी सुलागकर आग ताप रहे हैं. एक बच्चा भी आग की गरमी से शरीर को राहत देने में लगा हुआ है. महिला और बच्चियां भी हैं.
शंभू बताते हैं कि नगर परिषद की ओर से इन्हें अलाव मिला था. गनीमत यह है कि ये शेड के नीचे हैं. फिर भी शंभू कहते हैं कि बिना आग तापे यह ठंड नहीं जा रही है. रैन बसेरा बिल्कुल पास में ही है. पर छोटी जाति होने के कारण ये रैन बसेरा में आश्रय लेना ठीक नहीं समझते हैं.
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