बेटा-बेटी को शिक्षित करने को घूम-घूम सत्तू बेच रहा दिव्यांग, पैसे की कमी से नहीं आ सकी आंखों की रोशनी
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 01 Jun 2018 11:05 AM
मनोज कुमार मिश्र @ डुमरांव डुमरांव : हौसले बुलंद हो, इरादे मजबूत हो और कुछ करने की चाहत दृढ़ हो, तो मुश्किल राह भी आसान हो जाती है. इसका उदाहरण बने हैं डुमरांव प्रखंड की कुशलपुर पंचायत के वार्ड संख्या 15 निवासी स्व सिंहासन प्रजापति के पुत्र अशोक प्रजापति. दोनों नेत्रों से दिव्यांग एक पिता […]
मनोज कुमार मिश्र @ डुमरांव
डुमरांव : हौसले बुलंद हो, इरादे मजबूत हो और कुछ करने की चाहत दृढ़ हो, तो मुश्किल राह भी आसान हो जाती है. इसका उदाहरण बने हैं डुमरांव प्रखंड की कुशलपुर पंचायत के वार्ड संख्या 15 निवासी स्व सिंहासन प्रजापति के पुत्र अशोक प्रजापति. दोनों नेत्रों से दिव्यांग एक पिता अपने आठ वर्षीय पुत्र विकास प्रजापति के साथ रोज सत्तू बेच कर परिवार की जीविका चलाने के साथ अपनी दोनों संतानों को शिक्षित कर रहे हैं. माली हालत खराब होने के कारण उनकी आंखों का इलाज नहीं हो सका. सरकारी उपेक्षा से नाराज अशोक अपनी दोनों संतानों को लायक बनाना चाहते हैं, जो आगे चल कर मजबूर लोगों को सहायता देने के काबिल बन सकें. अशोक को दो बेटे और एक बेटी है. बड़ा लड़का दीपक प्रजापति मैट्रिक की परीक्षा देकर परिणाम का इंतजार कर रहा है. वहीं, बेटी +2 महारानी उषारानी बालिका उच्च विद्यालय में 9वीं की छात्रा है. जबकि, पिता के कारोबार में हाथ बंटा रहा छोटा बेटा विकास प्रजापति मध्य विद्यालय महावीर चबूतरा में छठीं का छात्र है.
अशोक प्रजापति की पत्नी सुनीता देवी ने बताया कि 1999 में दिल्ली स्थित शाहदरा में लेथ मशीन पर कार्य करते थे. वहीं, वर्ष 2008 में हुए एक हादसे में उनकी आंखों की रोशनी चली गयी. चिकित्सकों को दिखाने के बाद आंख की रेटिना में गड़बड़ी की बात कहीं. ऑपरेशन करने की बात कही. माली हालत ठीक नहीं थी. परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी अशोक पर थी. इसलिए किसी तरह पैसे जुटा कर ऑपरेशन कराया गया. लेकिन, होनी को कुछ और मंजूर था. ऑपरेशन सफल नहीं हुआ. चिकित्सक ने दोबारा ऑपरेशन करने की बात कही. माली हालत ठीक नहीं होने के कारण अशोक दोबारा ऑपरेशन नहीं करा सका. परिवार की खुशियों को नजर लग गयी और अशोक दोनों आंखों से दिव्यांग हो गया. परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा.
परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी अशोक पर थी. वह नहीं चाहता था कि उसके मासूम बच्चे पढ़ाई छोड़ कर अभी से परिवार का बोझ उठाएं. उसने नियति को ललकारते हुए कहा कि मैं हारनेवाला नहीं हूं, जब तक जिंदा रहूंगा, परिवार को भूखों नहीं मरने दूंगा. वह परिवार के भरण-पोषण के साथ बच्चों को शिक्षित करने का संकल्प लेते हुए वह उठा और अपने आठ वर्षीय पुत्र को साथ लेकर 2009 से बाजार में दूकानों पर घूम-घूम कर सत्तू की बिक्री करने लगा. गांव से बेटे की साइकिल पर सत्तू लेकर डुमरांव और आसपास के बाजारों में बेचना शुरू कर दिया. उसके हौसले और बुलंद इरादे को देख सभी अशोक की बहादुरी को सलाम करते हैं. सत्तू और बेसन बेच कर अशोक न सिर्फ अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहा है, अपितु बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए प्रयासरत भी है. सरकारी मदद नहीं मिलने के कारण उसके चेहरे पर थोड़ा सिकन जरूर है, लेकिन वह हारा नहीं है.
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