पटना: सत्ताधारी दल जदयू की सहयोगी पार्टी राजद के वरिष्ठ नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने चार बागी विधायकों की विधानसभा की सदस्यता रद्द करने के निर्णय को असंवैधानिक करार दिया है.
उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष के इस फैसले को दोहरा मापदंडवाला बताया है. उन्होंने कहा कि राज्यसभा उपचुनाव में जदयू के बागी विधायकों ने राजनीतिक रूप से भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवारों का समर्थन किया था, जिसे हम सही नहीं मानते हैं.
लेकिन, इस मामले में पहले उन्हें पार्टी से निष्कासित करना चाहिए. सदस्यता रद्द करना किसी भी तरह से संवैधानिक नहीं है. श्री सिंह ने मंगलवार को प्रभात खबर से बातचीत में बताया कि किसी भी विधायक की सदस्यता रद्द होने के दो आधार हैं. पहला, वह पार्टी से स्वयं त्यागपत्र दे दे और दूसरा, विधानसभा के अंदर वोटिंग के समय पार्टी ह्विप का उल्लंघन करे. ऐसी स्थिति में विधायकों की सदस्यता रद्द हो सकती है. लेकिन, जिन विधायकों की सदस्यता रद्द की गयी है, उन्होंने न तो पार्टी छोड़ी है और नहीं विधानसभा में ह्विप के खिलाफ क्रॉस वोटिंग की है. राज्यसभा उपचुनाव में जदयू विधायकों द्वारा भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार का समर्थन करना एंटी पार्टी गतिविधि है. इसके पहले दो जदयू विधायकों ने स्पीकर को लिखित त्यागपत्र सौंप दिया था. उनके खिलाफ संसदीय कार्य मंत्री श्रवण कुमार ने लिखित आवेदन भी स्पीकर के यहां दिया था.
दोनों ने पार्टी से त्यागपत्र देकर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लोकसभा चुनाव भी लड़ा था. लेकिन, उनके खिलाफ स्पीकर ने कोई कार्रवाई नहीं की. यह तो सदस्यता रद्द करने के मामले में स्पीकर का दोहरा मापदंड है. एक तरफ विधायकों ने पार्टी नहीं छोड़ी और दूसरी तरफ पार्टी छोड़ कर चुनाव लड़नेवालों पर कोई कार्रवाई नहीं करना क्या है? इसके अलावा सदस्यता रद्द करने के लिए भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रस्तावक बनने का आधार बनाया गया है. पर, प्रस्तावकों में तो 12-14 विधायक शामिल थे. उनकी सदस्यता क्यों नहीं रद्द की गयी? उन्होंने स्पष्ट किया कि मेरा बयान महागंठबंधन के खिलाफ नहीं, बल्कि असंवैधानिक निर्णय के खिलाफ है. सभा में न्याय की बात करनेवाला नहीं होगा, तो वह समाज नहीं बचेगा. पार्टी क ह रही है कि विधानसभा की सदस्यता रद्द करने के बाद उन्हें पार्टी से निष्कासित किया जा रहा है. सच तो यह है कि पहले उनको पार्टी से निष्कासित किया जाता, उसके बाद कोई निर्णय होता. ऐसा न करके सही कदम नहीं उठाया गया है.