द्वेषभाव से बचना चाहिए

एक भाई ने आचार्य भिक्षु से कहा- ‘स्वामीजी! अमुक व्यक्ति आपके अवगुण निकाल रहा है.’ इस पर प्रसन्नता प्रकट करते हुए वे बोले-‘यह तो अच्छी बात है. अपने जीवन के कुछ अवगुण मैं निकाल रहा हूं, कुछ वे निकाल देंगे, मेरा काम पूरा हो जायेगा.’ शिकायत लेकर आनेवाला अवाक् रह गया. पाली में आचार्य भिक्षु […]
एक भाई ने आचार्य भिक्षु से कहा- ‘स्वामीजी! अमुक व्यक्ति आपके अवगुण निकाल रहा है.’ इस पर प्रसन्नता प्रकट करते हुए वे बोले-‘यह तो अच्छी बात है. अपने जीवन के कुछ अवगुण मैं निकाल रहा हूं, कुछ वे निकाल देंगे, मेरा काम पूरा हो जायेगा.’ शिकायत लेकर आनेवाला अवाक् रह गया.
पाली में आचार्य भिक्षु एक दुकान में ठहरे. किसी विरोधी ने मालिक को बरगला दिया. उसने अपनी दुकान खाली करा ली. आचार्य भिक्षु ने दूसरा स्थान खोज लिया. चतुर्मास में वर्षा अधिक हुई. वे पहले जिस दुकान में ठहरे थे, इसकी पट्टियां वर्षा के कारण टूट कर गिर पड़ीं. आचार्य भिक्षु बोले- ‘दुकान खाली करते समय मेरे मन में द्वेषभाव आ सकता था. पर मैं संतुलित रहा. आज मैं कह सकता हूं कि ऐसा करनेवालों ने बड़ा उपकार किया. इस समय हम वहां होते, तो न जाने कौन सी परिस्थिति होती.’
अप्रतिबद्धता व्यक्तित्व का दूसरा घटक है. इसके लिए आगमिक शब्द है अनिदान. निदान का अर्थ है बंधना. विषयों के साथ, भौतिक सुख के साथ होनेवाली अप्रतिबद्धता आत्म-विकास की बाधा है. अमुक पदार्थ मिलना ही चाहिए, अमुक परिस्थिति में ही काम किया जा सकता है, ऐसी प्रतिबद्धता तो त्याज्य है ही. मोक्ष के प्रति होनेवाली लालसा का भी औचित्य नहीं है. लालसा से मिलता क्या है? आखिर तो लक्ष्य के अनुरूप पुरुषार्थ करना होगा. इसी दृष्टि से कहा गया है- ‘मोक्ष भवे च सर्वत्र निस्पृहो मुनिसत्तम:’- उत्तम मुनि मोक्ष और संसार-दोनों के प्रति निस्पृह रहता है.
आचार्य तुलसी
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