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लोकतंत्र के योद्धा कवि ‘धूमिल’

By कृष्ण प्रताप सिंह
Updated Date

कृष्ण प्रताप सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

kp_faizabad@yahoo.com

क्या आजादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है, जिन्हें एक पहिया ढोता है या इसका कोई मतलब होता है? जनता के प्रायः सारे जरूरी सवालों पर मौन साधे रहने वाली संसद पर अपनी खास तरह के तंजों के लिए मशहूर हिंदी कविता के एंग्री यंगमैन सुदामा पांडेय ‘धूमिल’ ने दशकों पहले यह सवाल पूछा, तो यकीनन उनके दिलो-दिमाग में नये-पुराने सामंतों, थैलीशाहों और धर्मांधों द्वारा प्रायोजित नाना प्रकार की कारस्तानियों के अंदेशे ही थे, जो देश के लोकतंत्र को सांसत में डाले हुए थीं और जिनके आज हम भी भुक्तभोगी हैं.

धूमिल का जन्म 9 नवंबर, 1936 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के खेवली गांव में हुआ था. अभी वे ठीक से होश भी नहीं संभाल पाये थे कि उनके सिर से पिता का साया उठ गया और उनकी पढ़ाई छूट गयी. मात्र 13 वर्ष की उम्र में उनकी शादी कर दी गयी और जिम्मेदारियां निभाने के लिए उन्हें एक लकड़ी व्यापारी के यहां नौकरी करनी पड़ी. बाद में उन्होंने एक औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्र से बिजली संबंधी कार्यों में डिप्लोमा किया और उसी में अनुदेशक नियुक्त हो गये.

नौकरी मिली तो उन्हें कई जगह हिजरत भी करनी पड़ी. लेकिन, उनका मन बनारस में रमता था या फिर खेवली में, जिससे अपना जुड़ाव उन्होंने खत्म नहीं होने दिया था. कहते हैं कि उनका रहन-सहन इतना साधारण था कि ब्रेन ट्यूमर का शिकार होकर 10 फरवरी, 1975 को जब वे अचानक मौत से हारे, तो उनके परिजनों तक ने रेडियो पर उनके निधन की खबर सुनने के बाद ही जाना कि वे कितने बड़े कवि थे. बनारस में उनकी अंत्येष्टि के समय वरिष्ठ साहित्यकारों में सिर्फ कुंवरनारायण और श्रीलाल शुक्ल ही पहुंचे थे.

वरिष्ठ कथाकार काशीनाथ सिंह की मानें, तो औपचारिक उच्च शिक्षा से महरूम धूमिल बाद में कविता सीखने व समझने की बेचैनी से ऐसे पीड़ित हुए कि जीवनभर विद्यार्थी बने रहे. उन्होंने अपने पड़ोसी नागानंद और कई शब्दकोशों की मदद से अंग्रेजी भी सीखी, ताकि अंग्रेजी की कविताएं भी पढ़ व समझ सकें.

अलबत्ता, विधिवत अध्ययन की कमी को उन्होंने इस रूप में जीवन भर झेला कि वामपंथी होने के बावजूद न स्त्रियों को लेकर मर्दवादी सोच से मुक्त हो पाये और न गांवों व शहरों के बीच पक्षधरता के चुनाव में सम्यक वर्गीय दृष्टि अपना पाये. लेकिन उन्हें इसका एक लाभ भी हुआ. ‘अनौपचारिक जानकारियों’ ने बनी-बनायी वाम धारणाओं की कैद से उनका निकलना आसान किये रखा और वे सच्चे अर्थों में किसान जीवन के दुखों व संघर्षों के प्रवक्ता और सामंती संस्कारों से लड़ने वाले लोकतंत्र के योद्धा कवि बनकर निखर सके.

वे हमेशा पूछते रहे कि ‘मुश्किलों व संघर्षों से असंग’ लोग क्रांतिकारी कैसे हो सकते हैं? उनका विश्वास था कि ‘चंद टुच्ची सुविधाओं के लालची अपराधियों के संयुक्त परिवार’ के लोग एक दिन खत्म हो जायेंगे. कविताओं में वर्जित प्रदेशों की खोज करने और छलिया व्यवस्था द्वारा पोषित हर परंपरा, सभ्यता आदि की ऐसी-तैसी करने को आक्रामक धूमिल ने अपना छायावादी अर्थध्वनि वाला उपनाम क्यों रखा, इसकी भी एक दिलचस्प अंतर्कथा है.

बनारस में उनके समकालीन एक और कवि थे- सुदामा तिवारी. वे अभी भी हैं और ‘सांड बनारसी’ उपनाम से हास्य कविताएं लिखते हैं. धूमिल नहीं चाहते थे कि नाम की समानता के कारण दोनों की पहचान में कंफ्यूजन हो. इसलिए उन्होंने अपने लिए उपनाम की तलाश शुरू की. चूंकि कविता के संस्कार उन्हें जयशंकर ‘प्रसाद’ के घराने से मिले थे, अतएव तलाश ‘धूमिल’ पर ही खत्म हुई. उन्होंने छोटी-सी उम्र में ही कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं.

हालांकि उनकी पहली प्रकाशित रचना एक कहानी थी, जो ‘कल्पना’ में छपी थी. वे स्वाभिमान के प्रतीक माने जाते थे और जिसमें भी ओछापन देखते, उसके खिलाफ हो जाते. वे नामवर सिंह के खिलाफ कुछ भी सुनना पसंद नहीं करते थे, पर जिस भी पल उन्हें लगता कि नामवर उन्हें इस्तेमाल कर रहे हैं, वे उन्हें छोड़ देते. धूमिल के जीवित रहते, 1972 में उनका सिर्फ एक ही कविता संग्रह प्रकाशित हुआ- ‘संसद से सड़क तक.’ ‘कल सुनना मुझे’, उनके निधन के कई बरस बाद छपा और उन्हें मरणोपरांत 1979 का साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया.

बाद में उनके बेटे रत्नशंकर की कोशिशों से उनका एक और संग्रह छपा- ‘सुदामा पांडे का प्रजातंत्र.’ उनकी इस लोकप्रिय कविता को याद करें, ‘एक आदमी रोटी बेलता है/एक आदमी रोटी खाता है/एक तीसरा आदमी भी है/जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है/वह सिर्फ रोटी से खेलता है/मैं पूछता हूं/यह तीसरा आदमी कौन है/और मेरे देश की संसद मौन है.’ तो अब, जब संसद का मौन कई और दशक लंबा हो गया है, यह तथ्य और साफ हो गया है कि भारत का विकल्प और विपक्ष दोनों से विरहित जनविरोधी राजनीति का असली प्रतिपक्ष धूमिल की कविताओं में ही बसता है.

आलोचक प्रियदर्शन कहते हैं कि मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय के बाद धूमिल हमारे जटिल समय के ताले खोलने वाली तीसरी बड़ी आवाज हैं. ‘जो बम मुक्तिबोध के भीतर कहीं दबा पड़ा और रघुवीर सहाय के यहां टिकटिक करता नजर आता है, धूमिल की कविता तक आते-आते जैसे फट पड़ता है. कुछ इस तरह कि उसकी किरचें हमारी आत्माओं तक पर पड़ती हैं. उन्हें नये सिरे से समझे जाने की जरूरत है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

Posted by: Pritish Sahay

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