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लोकलुभावन वादों का जटिल मामला

Updated at : 01 Aug 2022 7:40 AM (IST)
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लोकलुभावन वादों का जटिल मामला

हमें कल्याण योजनाओं को न दोष देकर खस्ताहाल राज्यों की आर्थिक नीति एवं स्थिति की समीक्षा करनी चाहिए तथा उसे सुधारना चाहिए.

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राजनीतिक दलों द्वारा लोकलुभावन वादे (फ्रीबीज) करने पर चर्चा लंबे समय से चली आ रही है. हाल में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी के साथ इस पर नये सिरे से बहस हो रही है. इस मसले को समझने के लिए हमें कुछ बिंदुओं का संज्ञान लेना चाहिए- लोकतांत्रिक व्यवस्था में वादे करने और उन वादों पर जनता के फैसले की अहमियत, राज्यों पर ऐसी योजनाओं के खर्च के बोझ का हिसाब तथा इन मामलों में अदालत का दखल.

लोकतंत्र में यह अधिकार सभी दलों को है कि वे लोकहित में जो अच्छा समझें, उसे जनता के सामने रखें. पहला सवाल तो यह उठता है कि लोकलुभावन का मतलब क्या है? इसकी कोई सर्वमान्य या स्थापित परिभाषा नहीं है. जनता के एक वर्ग के लिए सस्ते में कोई साधन मुहैया कराया जा रहा है या आय बढ़ाने के लिए कोई सहयोग दिया जा रहा है, इसे फ्रीबीज कहना ठीक नहीं है.

दुनियाभर की कल्याणकारी व्यवस्थाओं में ऐसी मदद दी जाती है. यह उन देशों में भी किया जाता है, जो आर्थिक रूप से बहुत अधिक संपन्न व समृद्ध हैं. अनेक देशों में स्वास्थ्य व शिक्षा निशुल्क है. ऐसी सुविधाएं हर नागरिक के लिए हैं, चाहें उनकी आर्थिक स्थिति जो हो. हमारे देश में ऐसी योजनाएं आम तौर पर गरीबी रेखा से नीचे और बेहद कम आय के लोगों के लिए है. ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जो देश राजनीतिक एवं आर्थिक रूप से हमसे आगे माने जाते हैं, क्या वे और उनकी पार्टियां लोगों को लुभाने में लगी हुई हैं.

क्या ऐसी योजनाओं और वादों का गलत राजनीतिक इस्तेमाल किया जा रहा है, यानी जैसा अदालत ने कहा है, क्या यह सब वोट ‘खरीदने’ की कवायद है? लोकतंत्र में पार्टियां लोगों के सामने अपनी नीतियों को रखती हैं. इस पर फैसला जनता को करना होता है. अगर वह उन वादों पर मुहर लगाती है, तो इसका मतलब है कि वह चाहती है कि वे चीजें उसे मिलें. अदालतें भी संविधान के तहत ही आती हैं.

हम जानते हैं कि गणतंत्र में वही होगा, जो लोग चाहेंगे. मान लें कि किसी पार्टी ने ऐसे वादे किये, पर जनता ने उसे नहीं चुना, तो उसका मतलब यह हुआ कि वे कथित फ्रीबीज लागू नहीं होंगे. इस प्रक्रिया पर कोई रोक तभी लग सकती है, जब वादे संविधान के मूलभूत सिद्धांतों एवं प्रावधानों के विपरीत हों. यह तो राजनीतिक दलों को ही तय करना होगा कि वह जनता से क्या वादा करे और क्या नहीं. जिसे फ्रीबीज कहा जा रहा है, संविधान में कहीं उस पर कोई रोक तो नहीं है. ऐसे में सबसे पहले इस पर चर्चा होनी चाहिए कि ऐसे मामलों में अदालतों का अधिकार क्षेत्र क्या होगा.

यह एक सही चिंता है कि कई राज्यों की वित्तीय स्थिति खराब है और वे कर्ज में डूबे हुए हैं. उनके संबंध में सबसे पहले यह समझा जाना चाहिए कि कितना वित्तीय दबाव कल्याणकारी योजनाओं से आता है और कितना अन्य तरह के खर्च से. कई तरह के अनुदान दिये जाते हैं. ऐसी योजनाओं को इसलिए बंद नहीं किया जा सकता कि राज्य सरकार कर्ज में है. प्राथमिक शिक्षा पर भी बहुत खर्च होता है. न्यायपालिका पर भी राज्यों का खर्च है.

कहीं-न-कहीं ये खर्च एक कल्याणकारी राज्य होने की अवधारणा के तहत जरूरी है. हमारे देश में खर्च की कई श्रेणियां हैं. ऐसे में, जाहिर है कि गरीब और कम आय वर्ग को कुछ राहत देने वाली योजनाओं पर ही सवाल नहीं उठाया जा सकता है. आज हमारे देश में उद्योग जगत को अनेक अनुदान और छूट देने की व्यवस्था है. भारत में स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक में बहुत कम शुल्क लिया जाता है.

इस शिक्षा का वास्तविक खर्च 30 से 40 गुना अधिक है. इसमें कोई भेदभाव भी नहीं है, यह सुविधा हर उस छात्र को मिलती है, जिसका नामांकन होता है. शिक्षा के प्रति सरकार के संवैधानिक उत्तरदायित्व की दृष्टि से यह जरूरी है. यहां इस आधार पर भेदभाव भी नहीं किया जा सकता कि उन छात्रों को निशुल्क या मामूली शुल्क की सुविधा नहीं दी जाए, जिनके अभिभावक अधिक शुल्क देने की क्षमता रखते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब घरेलू रसोई गैस की सब्सिडी को लेकर अभियान चलाया था, तो उन्होंने एक रणनीति बनायी. उन्होंने सार्वजनिक रूप से देशवासियों से अनुरोध किया था कि जो लोग अनुदान छोड़ सकते हैं, वे छोड़ दें और उस बचत से हम गरीबों को रसोई गैस की सुविधा देंगे. ऐसे अनुदानों को लाभ मध्य वर्ग लंबे समय से उठा रहा था और आज भी एक वर्ग इसका लाभ उठा रहा है, पर बड़ी संख्या में सक्षम लोगों ने प्रधानमंत्री की अपील पर इस अनुदान का लाभ नहीं लेने की घोषणा की.

कुल मिला कर, यह पूरा मसला जटिल है. यह ठीक है कि कुछ राज्यों ने बिना अधिक सोचे-विचारे महत्वाकांक्षी सामाजिक योजनाएं, जैसे एक-दो रुपये में अनाज देना आदि, चलायीं, पर राज्यों की अर्थव्यवस्था की बदहाली के लिए दूसरे कारण अधिक जिम्मेदार हैं. उदाहरण के लिए दो राज्यों- केरल और पश्चिम बंगाल को देखें, जो सबसे अधिक दबाव वाले राज्यों में शामिल हैं.

राज्य में आप आमदनी होने पर ही खर्च कर सकेंगे. इन राज्यों में औद्योगिकीकरण खस्ताहाल है. ऐसे में गरीबी बहुत अधिक है, तो आपको सुविधाएं देनी पड़ेंगी. साथ ही, आपके पास राजस्व नहीं आयेगा. पश्चिम बंगाल देश में सबसे अधिक कामगार मुहैया करा रहा है. चाहे वहां के शिक्षित और अति कुशल लोग, जैसे- डॉक्टर, इंजीनियर आदि हों या फिर अकुशल व अशिक्षित लोग हैं, अन्य राज्यों में कार्यरत हैं.

कोरोना महामारी के दौर में केरल में जो दूसरे देशों से आमदनी आती थी, वह बहुत हद तक कम हो गयी. इससे उपभोक्ता अर्थव्यवस्था चरमरा गयी और कराधान भी घट गया. ऐसी स्थिति के लिए कल्याण योजनाओं को न दोष देकर हमें ऐसे राज्यों की आर्थिक नीति एवं स्थिति की समीक्षा करनी चाहिए तथा उसमें सुधार के प्रयास करने चाहिए.

गरीबों को तो मदद देनी ही पड़ेगी और इस मसले पर राजनीतिक स्तर पर बहस भी हो सकती है कि कौन-सी फ्रीबीज या इंसेंटिव सही है और कौन-सी योजना गलत है. इस बहस का अंतिम फैसला लोग चुनाव के माध्यम से करेंगे. सभी राजनीतिक दल आपसी सहमति बना कर चुनाव आयोग की आदर्श आचार संहिता में संशोधन कर सकते हैं कि ऐसे वादे न किये जाएं, जिसे लागू करने से आर्थिक स्थिति और बिगड़ जायेगी. अदालत को इस मुद्दे से अलग रहना चाहिए.

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प्रीतम बनर्जी

लेखक के बारे में

By प्रीतम बनर्जी

प्रीतम बनर्जी is a contributor at Prabhat Khabar.

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