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आदिवासी कला की समकालीनता

Updated at : 12 Nov 2021 8:14 AM (IST)
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आदिवासी कला की समकालीनता

आदिवासी कलाओं की सबसे बड़ी विशेषता है कि ये औपनिवेशिक विचारों और प्रभावों से मुक्त होती हैं. कथित आधुनिकता के नाम पर ये औपनिवेशिकता की अनुचर नहीं हैं बल्कि इनकी मौलिकता ही देशज आधुनिकता की प्रस्तावक हैं.

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सन् अस्सी के आस-पास ‘भारत भवन’ के निर्माण की परिकल्पना चल रही थी. तब यह अनुमान लगा पाना मुश्किल था कि आनेवाले दिनों में आदिवासी चित्रकला समकालीन भारतीय चित्रकला को अपनी आद्य शैली और भाव-भंगिमाओं से समृद्ध करनेवाली है. यद्यपि इससे बहुत पहले महाराष्ट्र के जीव सोमा माशे वारली आदिवासी समुदाय की ‘वारली चित्रकला’ को स्थापित कर चुके थे. भोपाल में निर्मित भारत भवन का उद्घाटन 1982 ई में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था.

उस समय भारत भवन के ‘रूपंकर’ (ललित कला संभाग) के निदेशक थे मशहूर चित्रकार, कवि और कला समीक्षक जगदीश स्वामीनाथन. आदिवासी कला की समकालीनता पर विचार करते वक्त भारत भवन और जगदीश स्वामीनाथन का उल्लेख स्वाभाविक है.

जब भारत भवन का निर्माण कार्य चल रहा था, तो वहां आदिवासी मजदूर भी जाते थे. उन्हीं में से एक थीं भूरी बाई. भारत भवन के निदेशक जगदीश स्वामीनाथन ने भूरी बाई और उनके साथ काम करनेवाली महिलाओं से कहा कि वे जैसे अपने घर की दीवारों पर चित्र बनाती हैं वैसा ही चित्र कागज पर बना कर दिखायें. भूरी बाई को छोड़कर दूसरी महिलाएं तैयार नहीं हुईं. भूरी बाई ने चित्रों को कागज पर उकेरना शुरू कर दिया. यह समकालीन भारतीय चित्रकला की अभूतपूर्व घटना थी.

माना जाता है कि भूरी बाई भील चित्रकला (पिथौरा कला) को कागज और कैनवास पर उकेरने वाली इतिहास की पहली व्यक्ति हैं. उन्होंने आद्य शैली और भंगिमाओं से भारतीय कला का संवर्धन किया. कुछ दिन पहले ही महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया है. यह आदिवासी कला के देय का सम्मान है. जगदीश स्वामीनाथन ने गोंड चित्रकला के सबसे लोकप्रिय कलाकार जनगढ़ सिंह श्याम की भी खोज की. भारत भवन में ‘रूपंकर’ के प्रथम निदेशक रहते हुए उन्होंने समकालीन कला कृतियों के अलावा लोक आदिवासी कलाओं की विशिष्ट प्रदर्शनी को स्थापित किया.

जीव सोमा माशे, भूरी बाई और जनगढ़ सिंह श्याम आदिवासी चित्रकला के ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने आदिवासी कला को समकालीन बनाया. आदिवासी समाज की कला की अभिव्यक्ति को पारंपरिक माध्यमों से बाहर निकाल कर उन्होंने कागज और कैनवास तक पहुंचाया. उन्होंने कथाओं, गीतों, स्मृतियों में मौजूद आदिवासी जीवन को दुनिया के सामने प्रस्तुत किया है. जीव सोमा की वारली पेंटिंग्स में सहज ही आदिवासी जीवन के दर्शन को देखा जा सकता है.

उनके चित्र ही इस सामंती मिथ को तोड़ने के लिए काफी हैं कि आदिवासी समाज की कोई सामाजिक व्यवस्था नहीं होती है, उन्हें कथित सभ्य लोगों के मार्गदर्शन की जरूरत होती है. जनगढ़ सिंह श्याम ने गोंड आदिवासी समाज की गीति परंपरा में मौजूद कथाओं से पात्रों और रंगों को खोज निकाला. इनके चित्रों में आनेवाले पेड़, पहाड़ और जीवचर आदिवासी जीवन के मिथकीय चरित्र हैं. विशाल नाग के फन पर उगा विशाल वृक्ष हो या केकड़े के शरीर पर हाथी का सिर हो या उलटा लटका बाघ हो आदि सभी आदिवासी दुनिया के मिथकों को सामने लाते हैं.

ये पुराने आवरण में नहीं आते बल्कि जिन रंगों में ये प्रस्तुत किये जाते हैं वे नये अर्थों को सृजित करतें हैं. इसी तरह भूरी बाई की कलाओं को भी देखा जा सकता है. भूरी बाई के चित्रों में आने वाले मिथकीय चरित्र या देवता अनादि काल से इस प्रकृति का संरक्षण करते हुए दिखायी देते हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि वे आज भी मनुष्यों से संवाद कर रहे हैं और उनकी हर गतिविधि पर नजर रखे हुए हैं. चित्रों में डॉट या बिंदी का प्रयोग उनके चित्रों की खास शैली है. वे विभिन्न रंगों के डॉट या बिंदी से जो चित्र बनाती हैं वही उनके चित्रों को जीवंत बनाता है. उनके चित्रों में औद्योगिक जीवन और आदिवासी जीवन के संक्रमण का सजीव रेखांकन है.

आदिवासी कलाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि ये औपनिवेशिक विचारों और प्रभावों से मुक्त होती हैं. कथित आधुनिकता के नाम पर ये औपनिवेशिकता की अनुचर नहीं हैं बल्कि इनकी मौलिकता ही देशज आधुनिकता की प्रस्तावक हैं. आदिवासी कलाओं की शैली प्राचीन हैं. ये शैलचित्रों की शैली हैं, जो गुफाओं से या खुदाई में प्राप्त हुई हैं. ये पुरा-पाषाणकालीन हैं. भीमबेटका और सिंधु घाटी में प्राप्त चित्रों की शैली से इनकी समानता है.

वारली चित्रकला हो या गोंड चित्रकला या भीली आदि कलाओं में इस शैली का विस्तार है. झारखंड की जादू-पाटिया और सोहराई कला में भी इस शैली का विस्तार और उसका परिष्कृत रूप देखने को मिलता है. ये मानव सभ्यता की आद्य शैलियां हैं. आदिवासी कलाओं में इन शैलियों का अनुकरण मात्र नहीं है. आदिवासी कलाओं ने इन शैलियों में समकालीन जीवन को चित्रित किया है और यही प्रवृत्ति उनकी कला को समकालीन बनाती है. यद्यपि इस दिशा में अभी और रचनात्मक प्रयोग करना बाकी है.

भारतीय कला की आद्य शैलियां संस्थागत प्रयास और वैचारिक सहयोग की अपेक्षा करती हैं. पहले जीव सोमा राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किये गये और अब भूरी बाई पद्मश्री सम्मान से सम्मानित की गयी हैं. यह गौरव का क्षण है. औपनिवेशिक और अभिजन कला-दृष्टि से संघर्ष भी आदिवासी कलाकार का संघर्ष होता है. इसके लिए एक स्वामीनाथन और एक ‘रूपंकर’ के साथ की जरूरत महसूस होती है.

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डॉ अनुज लुगुन

लेखक के बारे में

By डॉ अनुज लुगुन

डॉ अनुज लुगुन is a contributor at Prabhat Khabar.

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