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प्रकृति को लेकर चिंतन का समय

सच कहा जाए, तो अभी संभलने का समय है, साथ ही सामूहिकता का भी सवाल है. हम सरकार और समाज के साथ मिल कर यह चिंतन करें कि प्रकृति के प्रति हमारा व्यवहार किस तरह का होना चाहिए.

By अनिल प्रकाश जोशी
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प्रकृति को लेकर चिंतन का समय
प्रकृति को लेकर चिंतन का समय
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मौसम के चरम के कारण आनेवाली आपदाओं के बारे में जलवायु विशेषज्ञ पहले ही चेता चुके हैं. समय-समय पर वैश्विक और स्थानीय स्तर पर ऐसी घटनाएं देखने को भी मिल रही हैं. उत्तराखंड और केरल में आयी आपदाएं इसी श्रेणी की हैं. उत्तराखंड में केदारनाथ की त्रासदी के बाद हुई इस तरह की यह दूसरी बड़ी घटना है, जो साफ इशारा करती है कि सब कुछ ठीक नहीं है. आइपीसीसी की एक रिपार्ट में स्पष्ट कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन अपनी एक बड़ी जगह बना रहा है. आनेवाले समय में यह और भी घातक होगा, विशेष रूप से अगले बीस वर्षों में.

इस परिवर्तन को हिमालय और उत्तराखंड पिछले लगभग एक दशक से झेल रहे हैं. पिछले एक दशक में ही केदारनाथ की त्रासदी हुई थी और उसके बाद लगातार टुकड़ों-टुकड़ों में अचानक आयी बाढ़ ने पूरे हिमालय के साथ उत्तराखंड को बार-बार बड़ा नुकसान पहुंचाया है. केदारनाथ की त्रासदी के समय 600 मिलीमीटर बारिश हुई थी और वर्तमान में दो ही दिन में 400 से 450 मिलीमीटर बारिश ने बड़ी तबाही को जन्म दिया है. अब तक की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 50 लोगों की जान गयी है. बाढ़ के बाद कुमाऊं को जोड़नेवाले राजमार्गों को बंद कर दिया गया है, क्योंकि इस आपदा से सबसे ज्यादा प्रभावित कुमाऊं ही हुआ है. मौसम विभाग के अनुसार, इस क्षेत्र में 107 वर्षों के बाद इतनी ज्यादा बारिश हुई है.

यहां प्रश्न है कि केदारनाथ की घटना और इसके बाद जो भी घटनाएं हुईं, उससे हमने कितना सबक लिया, कितना सीखा, क्या समझा? क्या हमने अपनी नीतियां इस तरह की बनाने की कोशिश की कि ऐसी आपदा, जिस पर भले ही हमारा कोई नियंत्रण नहीं हो सकता, लेकिन उससे होने वाले नुकसान को हम कम कर पाते. ऐसा कुछ नहीं हुआ है, क्योंकि राज्य के आपदा प्रबंधन विभाग को इतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता.

उसकी अपनी हालत बड़ी कमजोर और शिथिल है. इस तरह की आपदाओं के आने के बाद भी न तो प्रबंधन को चुस्त-दुरुस्त किया गया, न ही कम से कम वह हिस्सा जो हमारे नियंत्रण में है, जिसे हम स्थानीय तौर पर मजबूत कर सकते हैं, उसे लेकर कोई प्रभावी काम ही हुआ. इस तरह की आपदाओं का विश्लेषण करने पर साफ-साफ यह दिखायी देता है कि ये आपदाएं करीब एक-डेढ़ दशक से लगातार आ रही हैं. उत्तराखंड राज्य बनने के बाद इस तरह के संकट और बढ़े हैं.

जहां एक तरफ संकट बड़ा गंभीर था, वहीं इसे लेकर सरकारों, खास कर केंद्र की नीतियों में कोई सुधार नहीं हुआ. बांधों के बनने की गति में कोई कमी नहीं आयी. ढांचागत विकास को बड़े रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश की गयी. लेकिन यहां की पारिस्थितिकी को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया. राज्य की पारिस्थितिकी, जो यहां की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी, जैसे इसके जंगल, इसकी नदियां, मिट्टी उन पर ध्यान नहीं दिया गया. देशभर में जो हरित क्रांति, पीत क्रांति आदि लादी गयीं, उसी को हम आर्थिक सुधार मानते रहे. उसी के अनुरूप अपने राज्य के लिए हमने नीतियां बनायीं, उसी के दुष्परिणाम आज टुकड़ों-टुकड़ों में हमारे सामने हैं.

सवाल है कि हमारे पास क्या बचा है. इसे दो हिस्सों में देखते हैं- ग्लोबल और लोकल. वैश्विक स्तर की बात करें तो लगभग हर देश में इस तरह की घटनाएं देखने में आ रही हैं. वहां भी अचानक आयी बाढ़ के कारण तबाही मच रही है. ऐसा होने के बड़े कारणों में से एक है वैश्विक तापन. तापन के कारण दो बड़ी घटनाएं होती हैं- गर्मियों में तापमान बढ़ता है और बादल फटने की घटनाएं भी बढ़ जाती हैं.

जिस तरह दुनियाभर में तापक्रम बढ़ा है उससे अंटार्कटिका हो या आर्कटिक, वहां भी तेजी से बर्फ पिघलने लगी है, जिस कारण समुद्र का तट ऊपर आ रहा है, जो दूसरे बड़े खतरों को जन्म दे रहा है. पूरी दुनिया में हिमालय, हिमखंड और दोनों छोर सबसे महत्वपूर्ण हैं और जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापन का सबसे प्रतिकूल असर सबसे पहले अगर कहीं पड़ेगा, तो यहीं पड़ेगा.

आइपीसीसी ने भी माना है कि सबसे ज्यादा प्रतिकूल असर पहाड़ों और हिमखंडों पर ही पड़ेगा. बहुत सी रिपोर्ट बता रही हैं कि हिमखंड बहुत तेजी से पिघलते जा रहे हैं. पहाड़ों में झील बननी शुरू हो चुकी है. अगर ऐसे ही हालात रहे, तो आनेवाले समय में हम शायद अपने आपको बचा नहीं पायेंगे.

स्थानीय स्तर की बात करें, तो हिमालय की परिस्थितियों को समझते हुए हमें गंभीरता से इस ओर कदम उठाने की जरूरत है. इसी तरह की कोशिश अगर हमारे ढांचागत विकास के अंतर्गत आ जाती है और हमारी समझ बन जाती है, तो भले ही हम आपदाओं को आने से न रोक पायें, लेकिन अपने आपको तो बचा ही पायेेंगे. कम से कम इस तरह की अप्रत्याशित आपदाओं से, जहां बारिश का समय नहीं था, मॉनसून विदा हो गया था.

इस तरह का पैटर्न बड़ा भयानक है और देश के किसी भी कोने में ऐसा हो सकता है. अभी उत्तराखंड के साथ केरल में भी अचानक बाढ़ आने से जन-जीवन अस्त-व्यस्त हाे गया है और कई लोगों की जान जा चुकी है. सच कहा जाए, तो अभी संभलने का समय है और सामूहिकता का भी सवाल है. हम सरकार और समाज के साथ मिल कर यह चिंतन करें कि प्रकृति के प्रति हमारा व्यवहार किस तरह का होना चाहिए.

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