गांव इन दिनों

Updated at : 04 Apr 2017 5:46 AM (IST)
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गांव इन दिनों

गिरींद्र नाथ झा किसान एवं ब्लॉगर जब मौसम में बदलाव आता है, तब गांव में भी बड़े स्तर पर बदलाव दिखते हैं. हमारे इधर इमली और चीनी को मिला कर एक अचार बनता है- ‘खट-मिट्ठी’. मुंह में जाते ही एक अजीब अहसास होता है. एक साथ, एक ही झटके में खट्टा भी और दूसरे ही […]

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गिरींद्र नाथ झा
किसान एवं ब्लॉगर
जब मौसम में बदलाव आता है, तब गांव में भी बड़े स्तर पर बदलाव दिखते हैं. हमारे इधर इमली और चीनी को मिला कर एक अचार बनता है- ‘खट-मिट्ठी’. मुंह में जाते ही एक अजीब अहसास होता है. एक साथ, एक ही झटके में खट्टा भी और दूसरे ही पल मीठा भी. जीवन में जब भी उलझनों से घिरता हूं, तब इस अचार के बनने की प्रक्रिया याद कर खुद को समझा लेता हूं.
हाल ही में गाम के दक्षिण टोले में आग लगी थी. आग से बिंदेसर का घर जल गया. मिट्टी का भंडार, जिसे हम यहां ‘कोठी’ कहते हैं, उसमें एक मन चावल था, जल कर राख! सुबह तक बिंदेसर का चेहरा आनेवाली विपत्तियों को सोच कर काला हो चुका था. दोपहर तक टोले के लोगों ने बिंदेसर की परेशानियों को बांट लिया.
किसी ने बांस दिया, तो किसी ने घास, बिंदेसर का घर बनने लगा. आंगन में बिंदेसर का चार साल का पोता दौड़ लगा रहा था, मानो कुछ हुआ ही न हो. शाम में टोले के ‘पीपल थान’ से ढोलक और झाल की आवाज आने लगी थी- ‘आयी गइले चैत के महिनमा हो रामा, पिया नाहीं आयल. आम मंजरी गेल, लगले टिकोलवा, कोइली कुहुक मारे तनमा हो रामा, पिया नाहीं आयल.’ खुद बिंदेसर भी मूलगैन बन कर गाने लगा. गीत की ताकत यही है, समूह गान का जादू यही है. बाबा नागार्जुन की दुखहरण टिकिया की तरह.
इन दिनों जीवन के प्रपंचों के बीच इस तरह की घटनाओं को जब देखता हूं तब विश्वास बढ़ जाता है, समूहिकता पर भरोसा जग जाता है. हर शाम खेतों की ओर टहलते हुए जंगली खरगोशों से मुलाकात होती है. भूरे रंग का खरगोश बांस बाड़ी और मक्का के खेतों से दौड़ कर निकलता है और फिर किसी दूसरे खेत में छुप जाता है. खरगोश की दौड़ देख गाम की पगडंडियां कनाट प्लेस के सर्किल को तोड़ती दिखने लगती है. अनायास ही दिल्ली की सड़कें आंखों के सामने आ जाती हैं.
इन दिनों खुद को टीवी और खबरों के अन्य माध्यमों से दूर रहता हूं. यात्राओं और पुराने लोगों से गुफ्तगू ज्यादा करता हूं, इस आशा के साथ कि उनके अनुभवों से कुछ सीख पाऊं. गाम के बूढ़े लोगों से बात कर अंचल की कथा समझने की कोशिश में जुटा हूं.
गाम के कबीराहा मठ की जमीन पर मक्का लहलहा रहा है, मठ का विस्तार हो रहा है. लेकिन कबीर तो कहते थे- ‘राम हमारा नाम जपे रे, हम पायो विश्राम…’ यहां तो कुछ और ही जपा जा रहा है.
हाल ही में आंधी-बारिश हुई थी. नुकसान हुआ, लेकिन बिंदेसर को देख कर अपना नुकसान तो शून्य लगा. हां, किशोरवय बांस जब इस आंधी में टूट कर बिखर गये, तब जरूर मन टूटा, लेकिन जो अपने हाथ में नहीं है, उस पर क्या रोना!
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