मीडिया का मायालोक!

Updated at : 30 Mar 2017 5:35 AM (IST)
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मीडिया का मायालोक!

डॉ अनुज लुगुन सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया हर वर्ष 25 मार्च को गणेश शंकर विद्यार्थी की पुण्यतिथि मनायी जाती है. आज भी पत्रकारिता की दुनिया में उनकी जैसी निष्ठा और प्रतिबद्धता की मांग लगातार बनी हुई है. कुछ दिन पहले राज्यसभा में परिचर्चा के दौरान जदयू के सांसद शरद यादव ने चिंता […]

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डॉ अनुज लुगुन

सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया

हर वर्ष 25 मार्च को गणेश शंकर विद्यार्थी की पुण्यतिथि मनायी जाती है. आज भी पत्रकारिता की दुनिया में उनकी जैसी निष्ठा और प्रतिबद्धता की मांग लगातार बनी हुई है. कुछ दिन पहले राज्यसभा में परिचर्चा के दौरान जदयू के सांसद शरद यादव ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि ‘इस चौथे खंबे (मीडिया) पर आपातकाल लग गया है, हिंदुस्तान में अघोषित आपातकाल लगा हुआ है.’ यह ‘अघोषित आपातकाल’ क्या है? कांग्रेस के समय में जब आपातकाल लगा था, तब सीधे मीडिया पर सेंसर था. अब दूसरे तरीके से मीडिया पर सेंसर लगा है. आज मीडिया के बोलने पर नियंत्रण नहीं है, बल्कि उसके बोलने का नियोजन हुआ है. क्या बोलना है, क्या छापना-दिखाना है, किसकी छवि बनानी है, किसकी बिगाड़नी है, यह पहले से तय है.

तमिलनाडु के किसान कई दिनों से अपने मृत किसान साथियों के नरमुंडों के साथ दिल्ली के जंतर-मंतर में प्रदर्शन कर रहे हैं. पिछले चार महीनों में तमिलनाडु में करीब चार सौ किसानों ने आत्महत्या की है. डेढ़ सौ सालों में पहली बार तमिलनाडु में भयानक सूखा पड़ा है.

ये किसान सरकार से कर्ज माफी और सूखा राहत पैकेज के लिए धरना दे रहे हैं. दिल्ली में हो रहे प्रदर्शन के बावजूद मुख्यधारा के मीडिया ने इस खबर को मृतप्राय बनाने की पूरी कोशिश की. लेकिन, वैकल्पिक मीडिया और सोशल मीडिया के दबाव में उस खबर का क्षणिक प्रकाशन हुआ. वहीं नवरात्र शुरू होते ही सभी बड़े मीडिया समूहों ने प्रधानमंत्री मोदी और योगी आदित्यनाथ के व्रत को ‘मोदी और योगी की शक्ति साधना’ के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया. यह विडंबना है कि किसान अपने मृतकों के नरमुंडों के साथ भूखे-नंगे प्रदर्शन कर रहे हैं, उनकी कहीं कोई सुध नहीं है, और दूसरी ओर मीडिया ‘भूख उत्सव’ का प्रदर्शन कर रहा है!

आम जनता आखिरकार मीडिया के चरित्र को किस रूप में समझेगी? आज मीडिया का खास धार्मिक पक्ष भी है. कई बार वह अन्य धार्मिक समुदायों की प्रतिक्रिया के रूप में उसके आयोजनों को छापता-दिखाता है. दरअसल, उसका यह विचार आम जन की भावनाओं को अभिव्यक्त करना नहीं होता, बल्कि वह सत्ता के विचारों को ही अभिव्यक्त करता है. आज सरकार की नीतियों-विचारों से असहमत बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और प्रोफेसरों को देश के लिए खतरा घोषित कर उन्हें राष्ट्रद्रोही कहा जा रहा है, किसके इशारे पर है? सरकार के आलोचकों, लेखकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को डराने-धमकानेवाले निर्भीक क्यों हैं?

यदि किसी खास विचारधारा द्वारा प्रचारित राष्ट्रवाद के लिए मीडिया ने सरकार का पक्ष तय कर लिया है, तो यह भयावह है. पत्रकारिता के पितामह गणेश शंकर विद्यार्थी ने इनसे अलग राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद को समझाया था- ‘देश में कहीं-कहीं राष्ट्रीयता के भाव को समझने में भद्दी भूल की जा रही है. यदि इसके अर्थ भली-भांति समझ लिये गये होते, तो इस विषय में बहुत-सी अनर्गल बातें सुनने में नहीं आतीं. राष्ट्रीयता जातीयता नहीं है, राष्ट्रीयता धार्मिक सिद्धांतों का दायरा नहीं है, राष्ट्रीयता सामाजिक बंधनों का घेरा नहीं है. राष्ट्रीयता का जन्म देश के स्वरूप से होता है. उसकी सीमाएं देश की सीमाएं हैं.’

दरअसल, आज जिस तेजी के साथ हर क्षेत्र में पूंजी का संकेंद्रण हो रहा है, उससे मीडिया अछूता नहीं है. आज कुछ ही लोगों के नियंत्रण में मीडिया एजेंसियां हैं. उनके खबरों की रुचि का संबंध सत्ता और सरकारों से जुड़ा हुआ है. उन्हीं के निर्देशन में आज का मीडिया तीन स्तरों पर काम कर रहा है- प्रोपेगंडा, इमेज मेकिंग और इमोशंस लांचिंग. आज मीडिया प्रोपेगंडा और इमेज मेकिंग में ही व्यस्त है. इसी वजह से हमारे समय की कड़वी सच्चाई परिदृश्य से बाहर है. आज जनसुनवाई में होनेवाला फर्जीवाड़ा, जनांदोलनों पर होनेवाले गोलीकांड, मानवाधिकार के लिए लड़नेवाले कार्यकर्ताओं के सवाल, जंगलों और दलितों-अल्पसंख्यकों की वास्तविकता आदि मुद्दे मुख्य मीडिया से बाहर हैं. मीडिया इन क्षेत्रों से आनेवाले उन्हीं खबरों को जगह देता है, जिसमें ‘इमोशंस लांचिंग’ की संभावना हो. मसलन, वह दाना मांझी के प्रकरण को पूरे ग्लैमर के साथ प्रस्तुत कर कोरी सहानुभूति प्रकट करता है, लेकिन उसी दाना मांझी के कालाहांडी और कोरापुट में होनेवाली जमीन लूट और फर्जी मुठभेड़ पर चुप रहता है.

मीडिया ने बहुत चालाकी से अपना नया चरित्र गढ़ा है, जिसमें एक ओर वह खुद को संवेदनाओं के वाहक के रूप में प्रस्तुत करता है, वहीं दूसरी ओर वह सूक्ष्म तरीके से जन-मुद्दों को परिदृश्य से हटा कर सत्ता के प्रति वफादारी भी निभाता है. मीडिया के इसी चरित्र को नॉम चोम्स्की ने बृहद रूप में ‘जनमाध्यमों का मायालोक’ कहा है. यह सब आज पूंजी के दबाव का परिणाम है. भारत जैसे वर्ग और वर्ण विभाजित देश में यह जातीय आग्रहों का भी परिणाम है. आज मीडिया जब धर्म, पूंजी और सरकारों से नाभिनालबद्ध है, तो क्या ऐसे में हमें लोकतंत्र के इस कथित चौथे स्तंभ के चरित्र पर विचार नहीं करना चाहिए?

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