लोकतंत्र पर उठते सवाल

Updated at : 15 Feb 2017 11:07 PM (IST)
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लोकतंत्र पर उठते सवाल

अनुपम त्रिवेदी राजनीतिक-आर्थिक विश्लेषक देश में चुनावी माहौल है. कुछ प्रदेशों में चुनाव हो रहे हैं और कुछ में शीघ्र होनेवाले हैं. लगभग हर छह माह में कहीं न कहीं चुनाव होते हैं और इन्हें लोकतंत्र के पर्व की संज्ञा दी जाती है. भारत के सांस्कृतिक और धार्मिक कैलेंडर में यूं ही रोज कोई न […]

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अनुपम त्रिवेदी
राजनीतिक-आर्थिक विश्लेषक
देश में चुनावी माहौल है. कुछ प्रदेशों में चुनाव हो रहे हैं और कुछ में शीघ्र होनेवाले हैं. लगभग हर छह माह में कहीं न कहीं चुनाव होते हैं और इन्हें लोकतंत्र के पर्व की संज्ञा दी जाती है. भारत के सांस्कृतिक और धार्मिक कैलेंडर में यूं ही रोज कोई न कोई त्योहार होता है. उन त्योहारों में चुनाव रूपी यह सरकारी त्योहार भी जुड़ गये हैं. सभी यह त्योहार मनाने में व्यस्त हैं. मंत्री अपना संवैधानिक कार्य छोड़ कर प्रचार-प्रसार में लगे हैं.
अफसर आचार-संहिता की आड़ में जिम्मेवारियों से पल्ला झाड़ रहे हैं. कई राजनीतिक पार्टियां और राजनेता आचार-संहिता लागू होने के बाद से ही राजनीतिक अनाचार में जुटे हुए हैं. अपराधी, भ्रष्टाचारी, गुंडे लोकतंत्र की गंगा में अपने पाप धो रहे हैं. सर्वोच्च न्यायालय की रोक के बावजूद खुलेआम जातिवाद और धर्म की राजनीति हो रही है. टीवी स्टूडियो में बैठे विशेषज्ञ बड़ी गंभीरता से जातिगत और सांप्रदायिक आधार पर विश्लेषण करने में लगे हुए हैं. वहीं चुनाव-दर-चुनाव अपने आपको सबसे समझदार और जागरूक समझनेवाला हिंदुस्तान का मतदाता अपनी समझदारी को ताक पर रख फिर से ठगे जाने को तैयार है. पिछले 67 साल से यह क्रम निर्बाध चल रहा है.
देश की आजादी के बाद हमारे संविधान ने लोकतांत्रिक, धर्म-निरपेक्ष, बहुलतावादी आदर्शों और मूल्यों के साथ संघीय गणराज्य की नींव डाली थी. धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्रीय भेदभाव को परे रख सिर्फ वयस्क मताधिकार के आधार पर लोकतांत्रिक चुनाव पद्धति की स्थापना की थी. जनसंख्या के लिहाज से दुनिया के सबसे बड़े हमारे लोकतंत्र में हमने यह परंपरा कायम रखी है. एक-आध अपवाद को छोड़ कर हमेशा ही समय पर चुनाव होते रहे हैं.
जाहिर तौर पर हमें इस पर गर्व है और होना भी चाहिए. पर, क्या हमने लोकतांत्रिक मूल्यों और आदर्शों का भी निर्वहन किया है? क्या सिर्फ चुनावी औपचारिकता निभाने मात्र से लोकतंत्र मजबूत हो जाता है? क्या बड़ी संख्या में हमारे राजनीतिक दल और नेता ‘लोकतंत्र’ के नाम पर लोकतांत्रिक मूल्यों की धज्जियां नहीं उड़ा रहे हैं? क्यों हर तरह से असफल और नाकाबिल लोग हमारे शासक बनते जा रहे हैं? क्यों हम चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते हैं?
आज लोकतंत्र पर दुनिया भर में सवाल उठ रहे हैं. पश्चिम में ‘ब्रेक्जिट’ यानी ब्रिटेन के यूरोपियन यूनियन से अलग होने से लेकर अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने तक को अनुचित माननेवाले, लोकतंत्र को इसका दोषी ठहरा रहे हैं. भारत में भी आप को असंख्य लोग मिल जायेंगे, जो दबी जुबान से ही सही, पर देश की सारी समस्याओं के लिए लोकतंत्र और वोट की राजनीति को दोषी ठहराते हैं.
बहुत से प्रश्न हैं, जो आज हमें झकझोर रहे हैं- क्या हमारे यहां सचमुच में लोकतंत्र है? या यह सिर्फ एक भीड़तंत्र है, जिसे एक छोटा सा अपितु प्रभावी वर्ग अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए इस्तेमाल कर रहा है? क्या लोकतांत्रिक मूल्य केवल जुबानी जमा-खर्च के लिए हैं? क्या उनका कोई व्यावहारिक मूल्य नहीं है? क्या जात-पात, धर्म-संप्रदाय के संकीर्ण दायरे में सिमटे मतदाताओं और उनके द्वारा चुने जन-प्रतिनिधियों पर देश का भविष्य छोड़ा जा सकता है? क्या आजादी के सत्तर साल बाद भी लोकतंत्र के नाम पर बढ़ती असमानता, भुखमरी, गरीबी आदि पर आंखे मूंदी जा सकती हैं? और सबसे बड़ी बात, क्या लोकतंत्र के नाम पर नेताओं को लूट-खसोट की अनुमति दी जा सकती है?
आज वोट की राजनीति के चलते संस्कार, मूल्य, आदर्श सभी नेपथ्य में चले गये हैं. साम-दाम, दंड-भेद और येन-केन प्रकारेण का मंत्र आज राजनीति का मूल-मंत्र बन गया है. विडंबना यह है कि नेता हो या आम आदमी, सभी लोकतंत्र के कसीदे पढ़ रहे हैं. पर, क्या सब मर्जों की दवा समझा जानेवाला हमारा लोकतंत्र स्वयं में ही एक मर्ज नहीं बन गया है?
लोकतंत्र की तारीफ करते हुए इंगलैंड के नामी प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने कहा था कि लोकतंत्र की महानता के आधार में मतदान-केंद्र की ओर जाता वह छोटा आदमी (आम मतदाता) है, जो वहां जाकर भयरहित होकर अपने मतदान के अधिकार का उपयोग कर रहा है.
पर, चर्चिल ने ऐसा कहते हुए शायद बड़ी आदर्श स्थितियों की कल्पना की होगी. क्योंकि, आज उनका कहा बेमानी साबित हो रहा है. लोकतंत्र से ज्यादा आज यह भोला मतदाता ही सवालों के घेरे में है. क्योंकि, लोकतंत्र की मूल इकाई, यह मतदाता, जात-पात, धर्म और संप्रदाय से ऊपर उठ कर देखने को तैयार ही नहीं है. आज हमारा यह मतदाता ऐसे निर्णय लेने में समर्थ नहीं लगता, जो इतिहास की दिशा बदल सकें.
जिस तरह से एक व्यक्ति का कृत्य उसके जीवन की दिशा निर्धारित करता है, उसी तरह से एक देश की दिशा उस देश के नागरिकों के संयुक्त प्रयासों और बुद्धिमत्ता से तय होती है.
देश का भविष्य हर उस एक व्यक्ति के हाथ में है, जो इस देश की एक इकाई है और जो अपने निर्णय से देश की दिशा को बदलने की इच्छा रखता है. वहीं देश की यह इकाई जागरूक न होने पर देश को आगे ले जाने के बजाय पीछे धकेलने का काम करती है. उनकी नासमझी का परिणाम यह होता है कि नाकाबिल और नाकारा लोग शासक बन जाते हैं और शिक्षा, योग्यता, चरित्र आदि सभी गौण हो जाते हैं. सजायाफ्ता अपराधी लोग नेता बन माननीय हो जाते हैं, वहीं काबिल (अगर हिम्मत कर भी पाये तो) निर्दलीय लड़ कर, अपनी जमानत भी जब्त करा आते हैं.
इसके लिए किसे दोष देंगे आप? लोकतंत्र को? पर, लोकतंत्र तो सिंगापुर में भी है, अमेरिका में भी है और इंगलैंड में भी है. इन देशों में तो ऐसी आराजकता और विसंगति नहीं है? तो क्या हम लोकतंत्र के लायक नहीं है?
दरअसल, दोष लोकतंत्र में नहीं, हमारे अंदर है. लोकतंत्र हमारे लिए उपयोगी बने, उसके लिए हमें लोकतंत्र के लायक बनना पड़ेगा. दासता और भीड़ की मानसिकता से परे उठ कर हमें सोचना पड़ेगा कि हमारा वोट न केवल हमारे परिवार और बच्चों का भविष्य तय करेगा, बल्कि हमारे देश की दिशा और उसके इतिहास को बदलने का भी कार्य करेगा.और यदि समय रहते हम नहीं चेते, तो एक दिन हमारा यह लोकतंत्र ही इतिहास बन जायेगा.
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