आदिकवि वाल्मीकि की तपोभूमि पर

Published at :22 Feb 2014 3:33 AM (IST)
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आदिकवि वाल्मीकि की तपोभूमि पर

डॉ बुद्धिनाथ मिश्र ,वरिष्ठ साहित्यकारbuddhinathji@gmail.com बगहा पहली बार नहीं जा रहा था मैं. कई बार कविता पढ़ते समय महर्षि वाल्मीकि के साथ गोपाल सिंह नेपाली को अपने पीछे खड़ा अनुभव किया था. मगर वे बातें 1977 से पहले की हैं. लगभग चार दशक के बाद मैं बगहा जा रहा था, वह भी गोरखपुर की ओर […]

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डॉ बुद्धिनाथ मिश्र ,वरिष्ठ साहित्यकार
buddhinathji@gmail.com

बगहा पहली बार नहीं जा रहा था मैं. कई बार कविता पढ़ते समय महर्षि वाल्मीकि के साथ गोपाल सिंह नेपाली को अपने पीछे खड़ा अनुभव किया था. मगर वे बातें 1977 से पहले की हैं. लगभग चार दशक के बाद मैं बगहा जा रहा था, वह भी गोरखपुर की ओर से. इससे पहले जितनी बार गया, मुजफ्फरपुर होकर, क्योंकि तब बूढ़ी गंडक पर पुल नहीं था. वह भूकंप में टूट गया था. सो, बगहा से गोरखपुर जाने के लिए हमें गंडक का चौड़ा पाट पैदल पार करना पड़ता था. इसी क्षेत्र के नेता केदार पांडेय के रेल मंत्री बनने के बाद इस उपेक्षित रेलमार्ग को फिर से चालू करने की योजना बनी और यह क्षेत्र देश की राजधानी दिल्ली से जुड़ गया. दिल्ली से मैं सप्तक्रांति से जब चला तो मेरी बगल के बर्थ पर दो युवक आठ बड़े-बड़े बंडलों के साथ आ गये थे. वे सऊदी अरब से अपने परिवार के सभी लोगों के लिए कुछ न कुछ उपहार ला रहे थे. दोनों की खांटी भोजपुरी सुन कर मेरा गुस्सा शांत हो गया. जो लोग मुसलिम आबादी को उर्दूभाषी मानते हैं, वे सिर्फ भ्रम फैलाते हैं! वे युवक अरब देशों में बांग्लादेशी, नेपाली और पाकिस्तानी मजदूरों के साथ रहते हैं, मगर अपने बीच भोजपुरी ही बोलते हैं. यही मातृभाषा की शक्ति उन्हें अपने गांव-घर से जोड़े रखती है. बगहा में सबेरे जल्दी तैयार हो गया, क्योंकि वाल्मीकि नगर और वाल्मीकि आश्रम (जो नेपाल की सीमा में पड़ता है) जाने का लोभ था. 1983 में जब श्रद्धेय वात्स्यायन ‘अज्ञेयजी’ के नेतृत्व में बहुचर्चित ‘जानकीजीवन यात्र’ में यह स्थान भी शामिल था, तब यह भैंसालोटन नाम से ज्यादा चर्चित था और डकैतों-तस्करों का दुर्गम अभयारण्य माना जाता था. आज वाल्मीकि नगर के घने वन को बिहार सरकार ने बाघों का अभयारण्य बना दिया है.

ठहरने का इंतजाम भाई शकील मोईन ने अपने घर पर रखा था, हालांकि आयोजन वहां के अत्यंत लोकप्रिय युवा समाजसेवी स्वर्गीय अखिलेश्वर मिश्र के जन्मदिन पर हो रहा था. इस अवसर पर हर साल पांच निर्धन प्रतिभाशाली बच्चों को पढ़ाने के लिए यह परिवार अंगीकार करता है और दर्जनों बच्चों को पुस्तकें-लेखन सामग्री वितरित की जाती है. कवि सम्मेलन उसी जयंती का सारस्वत अंग था, जिसे सुनने के लिए आसपास के गांवों के लोग भी कड़ाके की ठंढ की परवाह किये बिना जुटते हैं. इस परिवार का एक महत्व यह है कि हिंदी के महान साहित्यकार, अग्रज पं विद्यानिवास मिश्र का विवाह इसी परिवार में हुआ था. शकील बगहा के जनप्रिय शायर और न्यायिक कर्मचारी महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. इसलिए जब वे वाल्मीकि नगर मुङो घुमाने ले चले, तो सामान्य लोगों के लिए बंद रहनेवाले द्वार खुलते गये और बहुत कम समय में मैंने भारत-नेपाल की सीमा के दुर्गम स्थल देख लिये.वाल्मीकि नगर बगहा से मात्र 35 किमी दूर है. दर्शनीय स्थल होने और नेपाल जाने का मार्ग होने के कारण पटना से यहां सीधी बस आती है, जो लगभग छह घंटे में यहां पहुंचा देती है. बगहा से कुछ दूर चलने के बाद जंगल शुरू हो गया. बेंत की घनी झाड़ियां; सागवान-साखू और शाल के वयस्क वृक्ष. अभयारण्य के बाघ इन्हीं बेंतों की घनी झाड़ियों में दिन में आराम करते हैं. प्यास लगने पर आसपास की नदियों या छोटे-छोटे जलाशयों में जाकर पानी पी आते हैं. डर हुआ कि कहीं अगर उन्हें भूख लग गयी तो एक झपट्टे में हमारी बोलेरो का शीशा तोड़ देंगे! वैसे, यह पूरा वन-प्रांतर आदिकवि महर्षि वाल्मीकि के तप से ऊर्जस्वित है, जहां आकर किसी भी प्राणी के मन में (मनुष्य को छोड़ कर) सात्विक भाव अवश्य जगेंगे. वसंत पंचमी के बाद भी जंगली हवा ने शीतलहरी का अहसास करा दिया. खेतों में जरूर सरसों के पीले-पीले फूलों का समुद्र लहरा रहा था.

आम के पेड़ बौराने की तैयारी में थे. शहरी विकास की नकल ने गांवों को अब गांव नहीं रहने दिया है. लेकिन इस क्षेत्र के गांव आज भी अपनी पहचान बनाये हुए हैं. फूस के घर, दरवाजे पर गाय-बैल और भैंसें, जाड़े में गर्माहट देने के लिए धान की पुआल की सेज, गोइठा पाथती स्त्रियां, हल जोतते किसान, गेहूं के खेतों में बथुआ की साग उखाड़ती बच्चियां-ये ही दृश्य तो शीत ऋतु में गांव को गांव बनाते हैं. चंपारण जनपद अपनी उर्वरा भूमि के कारण किसानों के आकर्षण का केंद्र रहा है. वाल्मीकि आश्रम नेपाल की सीमा में पड़ता है, जहां जाने के लिए तीन नदियों को (नारायणी, तमसा और सोनहा) पार करना होता है. यहां भी एक त्रिवेणी है, जहां बारहो मास नेपाली और भारतीय भक्त जुटते हैं. वाल्मीकि आश्रम में एक पुजारी रहते हैं. परिसर में कई मंदिर हैं, जिनमें पगोड़ा शैली के दो छोटे-बड़े मंदिर प्रमुख हैं. बड़े मंदिर में वह कुंड है, जहां सीताजी ने भूमि-प्रवेश किया था. कुंड में भक्तों द्वारा गिराये गये भारतीय और नेपाली नोट बिछे हुए थे. प्रांगण में सीताजी द्वारा प्रयुक्त सिल-लोढ़ा, पाक-स्थल, पानी के बर्तन रखने के कारण शिलापट पर पड़े गड्ढे, यज्ञ-स्थल आदि हैं, जो लोक-आस्था से जुड़े हैं. सामान्यत: मंदिरों में भक्तों की भीड़ ज्यादा होती है. मगर यहां केवल हम ही दोनों थे, और कोई नहीं. इसलिए बड़ी देर तक उस परम शांत परिसर में घूम-घूम कर वहां पुजारीजी के साथ बतियाते रहे.

यह क्षेत्र आदिकवि वाल्मीकि के पावन आश्रम के अलावा हिंदी काव्यमंच के प्रथम महानायक गीतकार गोपाल सिंह नेपाली के नाम से भी जाना जाता है, जिनका जन्म बेतिया में हुआ था. गीतधर्मिता इस धरती का स्वाभाविक गुण है. यहां दो और कवि अपने बहुमूल्य गीतों के लिए बहुचर्चित हुए- सरयू सिंह सुंदर और एंटोनी दीपक. सुंदर जी का गीत ‘अंधेरी निशा में नदी के किनारे/धधक कर किसी की चिता जल रही है’ हम बचपन में सुना करते थे. पिछले दिनों अमेरिका से एक कविमित्र ने जब यह पूरा गीत मांगा तो मुङो यहीं के वरिष्ठ गीतकार अखिलेश त्रिपाठी से मदद लेनी पड़ी. इनके अलावा पांडेय आशुतोष और दिनेश भ्रमर भी ख्यातनामा हुए. इन गीतकारों के संग्रह बाजार में न मिलना भी चिंताजनक है.12 फरवरी की शाम के कवि सम्मेलन की मुख्य अतिथि नेपाली मूल की महारानी प्रेमा शाह थीं, जो अपने काव्यप्रेम के कारण अंत तक बैठी रहीं और सभी कवियों का अभिवादन करने के बाद ही गयीं. आजकल श्रोताओं से तालियां मांगनेवाले हास्य कवियों को बगहा के कवि सम्मेलन में बहुत निराशा होगी, क्योंकि यहां के श्रोता गंभीरता से कविता सुनने के लिए दूर-दूर से आते हैं. चलते समय मिश्र परिवार के अग्रणी सदस्य चंद्रमौलि ने जिस सम्मान के साथ जनेऊ-सुपारी देकर विदा किया, वह भी नितांत पारिवारिक लगा.

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