छोटे उद्योगों पर प्रहार

Updated at : 20 Dec 2016 6:03 AM (IST)
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छोटे उद्योगों पर प्रहार

डॉ भरत झुनझुनवाला अर्थशास्त्री सरकार ने नोटबंदी को कालेधन के सफाये के अस्त्र के रूप में पेश किया है, परंतु लगभग पूरा कालाधन बैंकों में जमा होकर ‘सफेद’ हो गया है. न सिर्फ कालेधन को नष्ट करने का उद्देश्य पूरी तरह असफल रहा है, बल्कि कालाधन पुनः नये नोटों में पैदा हो चुका है. करोड़ों […]

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डॉ भरत झुनझुनवाला

अर्थशास्त्री

सरकार ने नोटबंदी को कालेधन के सफाये के अस्त्र के रूप में पेश किया है, परंतु लगभग पूरा कालाधन बैंकों में जमा होकर ‘सफेद’ हो गया है. न सिर्फ कालेधन को नष्ट करने का उद्देश्य पूरी तरह असफल रहा है, बल्कि कालाधन पुनः नये नोटों में पैदा हो चुका है. करोड़ों रुपये के नये नोट जब्त हो रहे हैं. नोटबंदी का असल प्रहार छोटे उद्योगों पर हुआ है. तमाम उद्योग बंद हो रहे हैं. ऐसा लगता है कि नोटबंदी को लेकर सरकार का मूल उद्देश्य छोटे उद्योगों का सफाया करके बड़े उद्योगों को खुला मैदान उपलब्ध कराना है.

छोटे उद्योगों की तुलना में बड़े उद्योग ज्यादा कुशल होते हैं. इनके द्वारा बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है.

जैसे गुड़ बनाने के उद्योग में प्रतिदिन 10 बोरी गुड़ बनता है, तो चीनी मिल में 5000 बोरी. गुड़ के उद्योग में ईंधन की खपत ज्यादा होती है, जबकि चीनी मिल में ईंधन कम लगता है. बड़ी मिलों द्वारा कुशल कारीगरों को ऊंचे वेतनमानों पर तैनात किया जाता है. मिलों के द्वारा उत्पादित चीनी की क्वाॅलिटी बेहतरीन और दाम कम होते हैं. तुलना में गुड़ में मिठास कम और दाम ज्यादा होता है. इसी प्रकार कपड़ा, कागज, रोलिंग मिल इत्यादि में बड़े उद्यमों में लागत कम आती है.

बड़ी कंपनियों की इस कुशलता के बावजूद अब तक की हमारी सरकार छोटे उद्योगों को समर्थन देती रही है, चूंकि छोटे उद्योगों द्वारा रोजगार ज्यादा बनाये जाते हैं. जैसे 5,000 बोरे प्रतिदिन बनानेवाली चीनी मिल में 1000 श्रमिक लगते हैं. इतने ही बोरे गुड़ बनाने में करीब 20,000 श्रमिक लगेंगे, क्योंकि गुड़ बनाने में सभी काम श्रमिकों द्वारा किये जाते हैं. छोटे उद्योग उद्यमिता विकास के भी केंद्र होते हैं. जैसे धीरूभाई अंबानी कभी छोटे उद्यमी थे.

वे छोटे उद्यमी बन सके, चूंकि सरकार ने छोटे उद्योगों को संरक्षण दे रखा था. यदि इन्हें संरक्षण नहीं दिया गया होता, तो धीरूभाई न तो छोटे उद्यमी बन पाते और न ही बाद में बड़े उद्यमी बन पाते. छोटे उद्योगों को सरकार इसलिए संरक्षण देती है कि वे बड़े उद्योगों के सामने खड़े हो सकें. सारांश यह कि छोटे उद्योगों की उत्पादन लागत ज्यादा आती है, परंतु समाज इस भार को वहन करता है, चूंकि इनके द्वारा रोजगार उत्पन्न किये जाते हैं. साथ ही ये उद्यमिता विकास की पाठशालाएं भी हैं.

बड़े उद्योगों के सस्ते माल के सामने छोटे उद्योगों के टिक पाने में बड़ी भूमिका नकद कारोबार की है.

जैसे गुड़ के कारखाने द्वारा गन्ना नकद में खरीदा जाता है, श्रमिकों को वेतन नकद में दिया जाता है और गुड़ को नकद में बेचा जाता है. पूरे कारोबार में एक्साइज ड्यूटी, सेल्स टैक्स तथा इनकम टैक्स अदा नहीं किया जाता है. कह सकते हैं कि नकद में यह कारोबार गैरकानूनी है. लेकिन, समाज इसे स्वीकार करता है, चूंकि ऐसे कारोबार रोजगारपरक हैं. साथ ही छोटे उद्यमियों को आगे बढ़ाने में सहायक हैं. कानून का विषय अलग है. संभव है कि समाज सही और कानून गलत हो. बहरहाल, इतना कहा जा सकता है कि नकद में धंधा करने के कारण ही छोटे उद्योग टैक्स देने से बचते हैं और जीवित रहते हैं.

यहीं नोटबंदी का प्रभाव पड़ता है. सरकार चाहती है कि छोटे उद्योगों द्वारा खरीद-बेच बैंक के माध्यम से किया जाये. ऐसा होने से उद्योग टैक्स के दायरे में आ जायेंगे. उदाहरण के लिए वर्तमान में इनके द्वारा श्रमिक को नकद पेमेंट किया जाता है. नोटबंदी के कारण छोटे उद्योगों को टैक्स देना होगा. इनका माल महंगा हो जायेगा. ये बड़े उद्योगों के सामने नहीं टिक सकेंगे. इस तरह से नोटबंदी के चलते छोटे उद्योग बंद होंगे.

छोटे उद्योग पहले ही बड़े उद्योगों के सामने टिक नहीं पा रहे हैं. बैंकों द्वारा छोटे उद्योगों को दिये जानेवाले ऋण में जनवरी 2016 में 2.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी. जून 2016 में इनको दिये जानेवाले ऋण में 3.6 प्रतिशत की गिरावट आयी है. स्पष्ट है कि छोटे उद्योग दबाव में हैं. कारण कि, नयी तकनीकों ने छोटे उद्योगों की रफ्तार में ब्रेक लगा दी है. जैसे पहले आपको एक किलो गोभी चाहिए थी, तो आप स्वयं नुक्कड़ के ठेलेवाले से जाकर खरीद कर लाते थे.

अब आप ग्रॉसरी स्टोर को आॅनलाइन आॅर्डर दे सकते हैं और माल आपके दरवाजे पर पहुंच जायेगा. नुक्कड़ के ठेलेवाले का धंधा चौपट हो रहा है. इसी प्रकार ब्रेड, बिस्कुट, दर्जी, टैक्सी आदि के धंधे बड़े उद्योगों द्वारा छीने जा रहे हैं. तकनीक के इस आतंक के बाद नोटबंदी का प्रभाव छोटे उद्योगों के कफन में कील ठोंकने जैसा होगा.

सरकार की दृष्टि बड़े उद्योगों को बढ़ावा देने की है, जो कि टैक्स अदा करते हैं. छोटे उद्योगों से सरकार को कोई लाभ नहीं है. बड़े उद्योगों के विस्तार के अनेकों लाभ हैं. यथा सरकार को टैक्स ज्यादा मिलेगा, सरकारी कर्मियों के वेतनमान बढ़ेंगे, सरकारी ठेकों की संख्या बढ़ेगी.

अतएव सरकार ने युक्ति निकाली कि नोटबंदी के माध्यम से छोटे उद्योगों को टैक्स अदा करने को मजबूर करो, तो वे बंद हो जायेंगे. बड़े उद्योगों को खुला मैदान उपलब्ध करा कर अधिक टैक्स हासिल करो, ताकि सरकारी कर्मियों के बजट में वृद्धि हो सके. जय हो साफ-सुथरी अर्थव्यवस्था की!

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