हम बूढ़े हो जाते हैं, रिश्ते नहीं बुढ़ाते

Published at :01 Feb 2014 4:24 AM (IST)
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हम बूढ़े हो जाते  हैं, रिश्ते नहीं बुढ़ाते

।। अखिलेश्वर पांडेय।। (प्रभात खबर, जमशेदपुर) शादी-विवाह के मौसम, यानी लगन के दिनों में दूल्हा या दुल्हन शादी का कंगन छुड़ाने की प्रक्रि या में गांव के देवस्थानों पर घूम-घूम कर माथा नवाते हैं. हमारे गांव में कई जातियों के लोग रहते हैं. बचपन में जब भी मांगलिक गीतों की आवाज आनी शुरू होती, हम […]

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।। अखिलेश्वर पांडेय।।

(प्रभात खबर, जमशेदपुर)

शादी-विवाह के मौसम, यानी लगन के दिनों में दूल्हा या दुल्हन शादी का कंगन छुड़ाने की प्रक्रि या में गांव के देवस्थानों पर घूम-घूम कर माथा नवाते हैं. हमारे गांव में कई जातियों के लोग रहते हैं. बचपन में जब भी मांगलिक गीतों की आवाज आनी शुरू होती, हम समझ जाते कि कोई दूल्हा या दुल्हन अपने लाव-लश्कर के साथ ‘चउथारी’ कर रहा है. घरों के बरामदे-खिड़कियों से मां-चाची और दादी उस दूल्हे या दुल्हन को प्रेमिल और उत्साहित नजरों से देखतीं.

इस लाव-लश्कर में सिर्फसजी-धजी महिलाएं होती थीं. उनके मुंह से लगातार गीतों के बोल झरते रहते. अमूमन हर बिरादरी के अपने गीत होते थे. मधुर हास-परिहास के बीच देवताओं से सुखी वैवाहिक जिंदगी की कामना के साथ आशीर्वाद और उनका आभार प्रगट करने का यह कार्यक्र म चलता रहता था. तब हमारी जिंदगी में टेलीविजन की घुसपैठ नहीं हुई थी. कई तरह की सहूलियतों की कमी भी थी, लेकिन अवसाद नहीं था. हास-परिहास के इन रिश्तों के सहारे ही लोगों की जिंदगी की गाड़ी आगे चलती रहती थी.

आज माना जाता है कि जिसके पास सूचनाएं हैं, संचार क्रांति के साधन हैं, वे ताकतवर हैं. कहते हैं कि टेलीविजन और इंटरनेट ने पूरी दुनिया से हमें जोड़ दिया है. लेकिन क्या सचमुच हम दुनिया से जुड़ पाये हैं. हकीकत यह है कि टेलीविजन की घुसपैठ और इंटरनेट की पहुंच के बावजूद इनसान और ज्यादा अकेला हुआ है. अगर उसकी पहुंच बनी भी है तो वह आभासी है. आभासी दुनिया के रिश्ते भी आभासी ही हैं. जबकि दुख-दर्द आभासी नहीं होते. प्रतिष्ठित साहित्यकार स्वर्गीय विद्यानिवास मिश्र कहते थे कि घर सिर्फ सिर पर छत नहीं होता, बल्कि घर वह होता है, जहां कोई इंतजार करता है, जहां रिश्तों को नया आयाम मिलता है.. जहां सुख बांटे जाते हैं और दर्द सहलाये जाते हैं. इंटरनेटी विश्व में क्या हम दावा कर सकते हैं कि दर्द सहलाने की वैसी ही प्रक्रि या बनी-बची है!

करीब डेढ दशक हो गये गांव छोड़े. भोपाल से शुरू हुआ सफर रांची, मेरठ, कानपुर होते हुए जमशेदपुर आ पहुंचा है. आज भी जब मैं गांव जाता हूं तो गांव की गलियों के चक्कर जरूर लगाता हूं. इस दौरान रास्ते में अधेड़ हो चली रिश्ते की कई भाभियां मिल जाती हैं. उनसे वैसे ही हंसी-मजाक होता है, जैसा पुराने दिनों में होता था. सच, इनसान बूढ़ा हो जाता है, रिश्ते नहीं बुढ़ाते. गांवों में अभाव जरूर है, शहरों जैसी चमक-दमक भी नहीं है, लेकिन अकेलापन नहीं है. हालांकि यह बात कहने में मुङो कोई गुरेज नहीं कि अब गांव में भी रिश्तों के बीच वैसी ललक नहीं बची. क्योंकि ग्राम्य जिंदगी से हास-परिहास का लोप होता जा रहा है. टीवी, सिनेमा, सीडी संस्कृति हावी हो रही है. कामना है कि हास-परिहास और मधुर रिश्तों की संस्कृति खत्म न हो.

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