नये महाजन, पुरानी रवायतें

Updated at : 23 Jun 2016 6:18 AM (IST)
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नये महाजन, पुरानी रवायतें

प्रदीप भार्गव निदेशक, जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद देश के किसान नयी महाजनी सभ्यता के मकड़जाल में ऐसे बुरे फंसे हैं कि बाहर निकलने का रास्ता नजर नहीं आता. चुपचाप सहते हैं, भले ही एक टन प्याज उगाने पर उन्हें एक रुपया ही मुनाफा मिले. मुंशी प्रेमचंद ने लिखा था कि आज दुनिया में […]

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प्रदीप भार्गव
निदेशक, जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद
देश के किसान नयी महाजनी सभ्यता के मकड़जाल में ऐसे बुरे फंसे हैं कि बाहर निकलने का रास्ता नजर नहीं आता. चुपचाप सहते हैं, भले ही एक टन प्याज उगाने पर उन्हें एक रुपया ही मुनाफा मिले. मुंशी प्रेमचंद ने लिखा था कि आज दुनिया में महाजनों का ही राज है. मनुष्य समाज दो भागों मं बंट गया है. बड़ा हिस्सा मरने-खपनेवालों का है और बहुत ही छोटा हिस्सा उनका है, जो अपनी ताकत से बड़े समुदाय को बस में किये हुए हैं.
नयी महाजनी सभ्यता अपनी पुरानी रवायतें आज भी रखे हुए है. महाजनों-पूंजीपतियों का और विस्तार हुआ है. उनके तरीके बदले हैं, वे और मारक मगर शालीन हो गये हैं. इनमें हमदर्दी कम, उसका दिखावा ज्यादा है. जहां कर्ज में डूबे किसान अपनी मेहनत का आधा-अधूरा पाते हैं, आत्महत्या करने को मजबूर हैं, वहीं महाजन विकास पर्व मनाते हैं- जीडीपी की नयी ऊंचाइयों का उत्सव. किसानी से कमजोर कोई व्यवसाय नहीं. इसकी ही नींव पर महाजनी सभ्यता पूंजी का ढेर लगाती है.
नयी महाजनी अनाज की कीमतों को कम-से-कमतर रखने का जतन करती है. कहने को तो मुक्त बाजार है. सरकार किसानों के हित में एक न्यूनतम कीमत निर्धारित करती है और इस कीमत पर किसान से अनाज खरीद भी लेती है. व्यापारी इसी कीमत या इससे ज्यादा पर सौदा करता है.
महाजनी सभ्यता का यही खेल है. किसान के पसीने के लगाये गये सरकारी दाम से लोकतंत्र शर्मसार है. पिछले साल गेहूं पर कृषि लागत और मूल्य आयोग ने किसान को 37 हजार रुपया प्रति हेक्टेयर की बचत बतायी थी, जिसमें उनकी मजदूरी शामिल नहीं थी. (धान पर यह बचत और भी कम 24 हजार रुपया प्रति हेक्टेयर) यानी हर बीघा पर 10 हजार रुपया. दो बीघा पर दो किसानों ने तीन महीने काम किया, तो मिला क्या- दो हजार रुपये महीने से भी कम. ऐसे बीघा-दो बीघा वाले करोड़ों किसान हैं. जिस हिसाब से गैर कृषि उत्पादों की कीमतें बढ़ी हैं और सरकारी वेतन में भारी वृद्धि हुई है, उसहिसाब से तर्क दिया जाता है कि गेहूं की कीमत सात हजार रुपया प्रति क्विंटल होनी चाहिए और चावल की उससे भी ज्यादा.
हर साल न्यूनतम कीमत में प्रति क्विंटल दो-चार सौ रुपये बढ़ा कर महाजनी सभ्यता अपनी हमदर्दी का ढिंढोरा पीटती है. असल में कीमतें न बढ़ने देने से दो फायदे हैं. पहला, अनाज, दूध, सब्जियां कम दाम की हों, तो मजदूर सस्ता मिलें. दूसरा, कम आय के चलते किसान किसानी छोड़ शहर में सस्ते में मजदूरी करें, जिससे महाजनों के उद्योग और सेवा क्षेत्र के धंधे पनप सकें. इसमें महाजनी सफल हो गयी है. किसान किसानी छोड़ना चाह रहे हैं.
उत्तर प्रदेश में जिन किसानों के पास चार हेक्टेयर जमीन है, वे भी गार्ड की दस हजार रुपये महीने की नौकरी करते मिल जायेंगे. एक कहावत है- उत्तम खेती, मध्यम बान, अधम चाकरी, भीख निदान. यह कहावत उलट गयी है. चाकरी उत्तम हो गयी है और खेती अधम. जहां गेहूं-धान रुपया-दो रुपया किलो दिया जा रहा है, वह भीख निदान समान है. सरकार ऐसा करे, पर किसान को भी सत्तर रुपया किलो उसकी मेहनत का दे. प्रधानमंत्री ने अनेक बार घोषणा की है कि वे किसानों की आय दोगुनी करेंगे. यह अच्छी सोच है, पर दोगुनी नहीं चारगुनी होनी चाहिए.
मेहनत का देना तो दूर, जो मिल रहा है उसमें से भी नयी महाजनी सभ्यता लूट-खसोट बड़ी हमदर्दी से करती है. बीमा योजनाएं एक मिसाल हैं. सूदखोर तो सूद लेता है, बीमा तो मूल ही हजम कर लेता है. जैसे करोड़ों किसानों से कुछ पैसा लिया और कुछ हजार किसानों को क्षति होने पर भरपाई कर दी. प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना में ऐसा ही होना है.
किसान को अपनी गाढ़ी कमाई को इस सट्टे में लगाना है. फसल नष्ट हो जाये, तो कुछ किसानों को मुआवजा मिलेगा, बाकी का मूलधन कंपनी का मुनाफा. अपने साथी किसानों के फायदे के लिए साल-दर-साल करोड़ों रुपया कंपनियों की झोली में डालेंगे. सरकारी बीमा योजना हमदर्दी का ढिंढोरा पीट, किसानों से लेकर महाजनों को देती है और विकास पर्व मनाती है.
इससे भी महाजनी सभ्यता का दिल नहीं भरता. उसे तो किसान की ‘दो बीघा जमीन’ का भी कब्जा चाहिए. किसान का यह अंतिम बलिदान होगा, इसके बाद राजा हरिश्चंद्र की तरह उसके पास अपने शरीर के अलावा कुछ न बचेगा.
महाजन मातृभूमि का ढोल भी बजाते हैं. गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में कहा था कि किसान के लिए धरती उसकी मां है. नयी महाजनी ने मातृभूमि को भी कानून की बेड़ियों में कसा है. भूमि अधिग्रहण कानून किसानों से बलिदान मांगता है. कानून किसानों की मां का भी सौदा करता है.
प्रधानमंत्री जी ने मन की बात में कहा- कानून मानना हर नागरिक की जिम्मेवारी है, किसान की भी. विकास होना है, तो उद्योगों के लिए जमीन चाहिए. जमीन किसानों की ली जायेगी. डैम बनेगा तो गांव-जंगल डूबेंगे, तभी किसानों को पानी मिलेगा. विकास की यह नयी महाजनी परंपरा है.
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