पंचायतों द्वारा भारत-निर्माण

Updated at : 16 Jun 2016 6:14 AM (IST)
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पंचायतों द्वारा भारत-निर्माण

संदीप मानुधने विचारक, उद्यमी एवं शिक्षाविद् आपने सुना होगा कि ‘भारत गांवों में बसता है’, अथवा ‘यदि भारत से ग्राम समाप्त हो गये, तो भारत समाप्त हो जायेगा’. ये विचार मूलतः गांधीजी के थे, जिन्होंने भारत के अध्ययन एवं अनगिनत यात्राओं से यह समझ लिया था कि तरक्की का मशीनी एवं पश्चिमी मॉडल भारत पर […]

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संदीप मानुधने
विचारक, उद्यमी एवं शिक्षाविद्
आपने सुना होगा कि ‘भारत गांवों में बसता है’, अथवा ‘यदि भारत से ग्राम समाप्त हो गये, तो भारत समाप्त हो जायेगा’. ये विचार मूलतः गांधीजी के थे, जिन्होंने भारत के अध्ययन एवं अनगिनत यात्राओं से यह समझ लिया था कि तरक्की का मशीनी एवं पश्चिमी मॉडल भारत पर थोपने से अनेक दुष्परिणाम होंगे. इसीलिए उन्होंने ऐसी शासन व्यवस्था की बात की थी, जो व्यक्ति पर केंद्रित हो, सिस्टम पर नहीं. ‘हर ग्राम एक आत्मनिर्भर सूक्ष्म गणराज्य होगा एवं बड़े निकायों से वह गैर-अनुक्रमिक तरीके से जुड़ा होगा’, यही उनका ग्राम-स्वराज मॉडल था.
गांधीजी ने सोचा था कि यदि वास्तव में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अहिंसा को मूर्त रूप देना है और राजनीतिक सत्ता का पूर्ण रूप से लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण करना है, तो एक सच्चा पंचायती राज ही एकमात्र रास्ता है.
इससे न तो पूंजीवाद जैसा निजी व्यक्तियों के हाथों में दौलत का संकेंद्रण होगा और न ही समाजवाद (और साम्यवाद) जैसा सत्ता का राजा के हाथों में संकेंद्रण होगा. ईशोपनिषद से लिए इस विचार में ‘थ्योरी ऑफ ट्रस्टीशिप’ (न्यासवाद सिद्धांत) निहित था. 1700 ईसा पूर्व से ऋग्वेदिक युग में ग्राम सभाओं के संकेत इतिहासकारों को मिले हैं! ये लगातार भारत की आत्मा का हिस्सा रही हैं.
किंतु आजादी मिलते ही दो विपरीत विचारधाराएं आपस में टकरायीं. हमारी संविधान सभा ने संविधान बनाते वक्त गांधीजी के आदर्शों को एक ही खंड (खंड 4) में सीमित कर दिया जो था- ‘राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत’. इसके अनुच्छेद 40 में राज्य द्वारा ग्राम पंचायतों को बनाने की बात कही गयी. किंतु यह सिर्फ कागज पर रह गया, चूंकि खंड 4 विधि द्वारा प्रवर्तनीय (या न्याय्य) नहीं था. दरअसल, डॉ आंबेडकर को यह चिंता थी कि यदि गांवों को सत्ता का केंद्र बना दिया गया, तो छुआछूत की घृणित प्रथा के चलते पिछड़े वर्गों का उत्थान असंभव हो जायेगा (यह गलत चिंता नहीं थी). इसीलिए शहरों को सत्ता के केंद्र में रखा गया, जहां इस बीमारी का स्वरूप कम डरावना था.
किंतु भारत जैसे विशाल देश में, यह समझने में सत्ताधीशों को चालीस साल लग गये कि जमीन से जुड़ी समस्याएं जमीनी स्तर के प्रतिनिधि ही ठीक से सुलझा सकते हैं. अनेक समितियां बनीं, पर ज्यादा कुछ हुआ नहीं. 1990 आते-आते यह साफ हो गया कि शहर-केंद्रित सत्ता के दो-स्तरीय ढांचे (केंद्र व राज्य सरकारें) से हम लाखों गांवों के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं.
न तो उतनी प्रशासनिक दक्षता बन पायी और न ही तब इतनी तकनीकें थीं. समस्याओं का अंबार लगता गया, जिससे जनाक्रोश बढ़ता गया. अंततः, पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने 1992 में संविधान में दो क्रांतिकारी संशोधन लाये- 73वां एवं 74वां, जिनसे स्थानीय प्रशासन का तीसरा स्तर बना एवं ग्राम पंचायतों और शहरी निकायों को संवैधानिक मान्यता मिल गयी.
किंतु अगले दस सालों में स्पष्ट हो गया कि हाथी के दांत खाने व दिखाने के अलग थे. दरअसल, पंचायती राज चलाने की जिम्मेवारी राज्यों को दी गयी थी. पांच कार्य अति-महत्त्वपूर्ण थे- स्वतंत्र एवं नियमित पंचायती चुनाव करवाना (अनुच्छेद 243-क), इस हेतु निष्पक्ष राज्य चुनाव आयोग गठित करना, राज्य योजना आयोग बनाना, राज्य का वित्त आयोग हर पांच वर्षों में बनाना (अनुच्छेद 243-झ), और जिला स्तरीय योजना समिति बनाना, जो हर ग्राम और शहरी निकाय की योजनाओं को समेकित कर एक जिला-योजना बना सके. अलग-अलग राज्यों ने आधे-अधूरे ढंग से इन कार्यों को किया. पंचायती व्यवस्था सुदृढ़ वित्त के बिना लंगड़ाते हुए चलती रहीं.
इस व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन आया 2014 दिसंबर में प्रस्तुत चौदहवें वित्त आयोग की रिपोर्ट से. इसमें अनुशंसा की गयी कि 2015-2020 तक ग्राम पंचायतों को कुल रुपये 2,00,292 करोड़ आवंटित हो और शहरी निकायों को रुपये 87,143 करोड़. मोदी सरकार ने इसे मान लिया! यानी अब 6.40 लाख ग्रामों का प्रतिनिधित्व कर रहीं 2.39 लाख ग्राम पंचायतें हर वर्ष बीस लाख रुपये पाती रहेंगी. इस राशि से यदि क्षमता-निर्माण के कार्य सही ढंग से हुए, तो उम्मीद है कि 2020 तक गांधीजी का सपना आकार लेता दिख सकता है.
भारत में 6.40 लाख ग्राम हैं, जिनमें 84 करोड़ से ज्यादा जनसंख्या बसती है, जिनके लिए 2.39 लाख ग्राम पंचायतें हैं, जिनमें 28 लाख प्रतिनिधि हैं (40 प्रतिशत महिलाएं), 6500 ब्लॉक पंचायतें हैं, जिनमें 1.68 लाख प्रतिनिधि हैं और 589 जिला पंचायतें हैं, जिनमें 16,000 प्रतिनिधि हैं. इतना विशाल है यह सिस्टम. भारत में कुल 11,825 शहर और 688 जिले हैं.
मेरा मानना है की निम्न सुझावों को यदि अमल में लाया जाये, तो इस विशाल व्यवस्था से हम राष्ट्र-निर्माण की अवधारणा को एक अलग ही स्तर पर ले जा सकते हैं.
सुझाव 1- गांवों से शहरों की ओर पलायन रोकने हेतु ग्राम स्तर पर पंचायतों द्वारा अनेक योजनाएं लागू करना.सुझाव 2- सूचना तकनीक के प्रयोग से सभी खातों और योजनाओं-संबंधित आंकड़ों को पारदर्शी बनाना (इस हेतु पंचायती राज मंत्रालय का पंचायत एंटरप्राइज सुइट (पीइएस) सॉफ्टवेयर है, किंतु प्रयोग हेतु पूर्ण क्षमता निर्माण अभी बाकी है.
सुझाव 3- भारत चुनाव आयोग की ही तरह स्वतंत्र राज्य चुनाव आयोग हर राज्य में बने और नियमित चुनाव हों- दूरस्थ ग्रामों का हर व्यक्ति खुद को लोकतंत्र से जुड़ा महसूस करेगा (कई राज्य यह कार्य बढ़िया कर रहे हैं).
सुझाव 4- योजना बनाने की प्रक्रिया को और तेज कर क्रियान्वयन पर ध्यान ज्यादा दिया जाये.सुझाव 5- दो करोड़ से अधिक लंबित मामलों की वजह से विफल दिख रही न्याय व्यवस्था को पुनर्जीवित करने हेतु न्याय पंचायतों को मूर्त रूप देना चाहिए. ग्राम स्तर के झगड़ाें को शहर की अदालतों में क्यों ले जाया जाये?
तरक्की केवल बड़े मेट्रो शहरों की चमकती इमारतों में नहीं मापी जा सकती. जब भी हम 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायत दिवस मनायें, तो ध्यान रखें कि 150 करोड़ की आबादी की तरफ बढ़ते इस देश को केवल पंचायती राज व्यवस्था ही टूटने से बचायेगी और सही मायने में समृद्ध बनायेगी.
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