अब आग की त्रासदी

Updated at : 03 May 2016 6:13 AM (IST)
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अब आग की त्रासदी

उत्तराखंड के जंगलों में जगह-जगह लगी आग से 2,269 हेक्टेयर वन-भूमि तबाह हो चुकी है. आग की चपेट में हिमाचल प्रदेश के कुछ वन क्षेत्र भी आये हैं. हालांकि, ताजा सेटेलाइट चित्रों के आधार पर दावा किया जा रहा है कि 70 प्रतिशत प्रभावित इलाके में आग पर काबू पा लिया गया है, लेकिन तबाही […]

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उत्तराखंड के जंगलों में जगह-जगह लगी आग से 2,269 हेक्टेयर वन-भूमि तबाह हो चुकी है. आग की चपेट में हिमाचल प्रदेश के कुछ वन क्षेत्र भी आये हैं. हालांकि, ताजा सेटेलाइट चित्रों के आधार पर दावा किया जा रहा है कि 70 प्रतिशत प्रभावित इलाके में आग पर काबू पा लिया गया है, लेकिन तबाही के कारणों पर बहस जारी है. विशेषज्ञों के मुताबिक, पहाड़ी राज्यों में जंगल की आग, मानव-जनित या प्राकृतिक, गरमी के महीनों की एक वार्षिक घटना है.
हर चार-पांच साल में इससे बड़े पैमाने पर नुकसान होता है, खास कर उन गर्म मौसम में जब हवा में नमी बहुत ही कम हो जाती है. लेकिन, इस वर्ष इसकी भयावहता असाधारण है और इससे कई जिले प्रभावित हुए हैं. अमूमन ऐसी तबाही मानव-जनित आग से बढ़ती है.
प्रभावित इलाकों से आ रही रिपोर्टों पर भरोसा करें, तो इस त्रासदी के पीछे जंगल और जमीन पर कब्जे की फिराक में लगे संगठित गिरोहों का भी हाथ हो सकता है. तबाह इलाकों में औद्योगिक या व्यावसायिक गतिविधियों के लिए पर्यावरण-संबंधी मंजूरी मिलने में आसानी होती है, क्योंकि आग से वन क्षेत्र तबाह हो चुका होता है. वन-संरक्षण से जुड़े कार्यकर्ताओं ने गिरोहों द्वारा भेजे गये बच्चों के द्वारा आग लगाने के वीडियो भी जारी किये हैं.
ऐसे में सरकार को राहत और बचाव कार्यों के साथ-साथ इस घटना की तह में जाकर सच का पता लगाने की कोशिश भी करनी चाहिए. असंख्य पेड़ों के साथ-साथ अनगिनत पशु-पक्षी भी इस त्रासदी का शिकार बने हैं. इस आग से हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई बहुत मुश्किल है, लेकिन ऐसी विनाशक दुर्घटनाओं को रोकने के उपाय तो निश्चित रूप से किये जा सकते हैं. कई सप्ताह से लगी आग पर काबू पाने को लेकर शुरू में जो शिथिलता सरकार और प्रशासन द्वारा प्रदर्शित की गयी है, उसकी पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए.
वैश्विक तापमान में वृद्धि, जलवायु परिवर्तन, कमजोर मॉनसून जैसे प्रकृतिजन्य कारकों के कारण पैदा हो रही चुनौतियों तथा विकास और आर्थिक लाभ के लिए दिशाहीन भटकाव की समस्याओं के प्रति न तो सरकार और न ही समाज को कोई चिंता है. बाढ़, सूखा और अब आग; इन त्रासदियों के बरक्स दीर्घकालिक पहलों की जरूरत है.
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