चेतने का वक्त

आजकल पर विश्व के किसी न किसी भू-भाग पर भूकंप के झटके महसूस किये जा रहे हैं. पिछले दस साल के आंकड़ों आंकड़ों पर गौर फरमाया जाये, तो प्रतीत होता है कि हम किसी विभीषिका की ओर आहिस्ता-आहिस्ता कदम बढ़ा रहे हैं. वर्ष 2006 से 2015 तक के आंकड़े देखें, तो इस बीच पृथ्वी को […]
आजकल पर विश्व के किसी न किसी भू-भाग पर भूकंप के झटके महसूस किये जा रहे हैं. पिछले दस साल के आंकड़ों आंकड़ों पर गौर फरमाया जाये, तो प्रतीत होता है कि हम किसी विभीषिका की ओर आहिस्ता-आहिस्ता कदम बढ़ा रहे हैं. वर्ष 2006 से 2015 तक के आंकड़े देखें, तो इस बीच पृथ्वी को 392 बार ऐसे भूकंप का दंश झेलना पड़ा, जिनकी तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 6.5 से 9.0 के बीच मापी गयी. वर्ष 2016 में भी अब तक 16 बार धरती डोल चुकी है.
प्रश्न उठता है कि क्या हम उस दिन के लिए तैयार है, जब नेपाल जैसा प्रलय हमें फिर से देखने को मिलेगा? क्या हमारे आपदा प्रबंधन की तकनीक इतनी मजबूत और विकसित है कि इन भूकंपों से कम से कम वक्त में निबटा जा सके. हमें चेतने की जरूरत है. हमें वैज्ञानिकों के साथ मिल कर जतन करने होंगे.
– विवेकानंद विमल, पाथरौल, मधुपुर
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