संविधान, आंबेडकर और सियासत

Updated at : 28 Nov 2015 1:14 AM (IST)
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संविधान, आंबेडकर और सियासत

संविधान की व्याख्या करते-करते कांग्रेस और बीजेपी ने अपने इतिहास को इस तरीके से सहेजना शुरू किया कि सामनेवाला कटघरे में खड़ा हो जाये. लेकिन, जनता की बदहाली का कोई जिक्र नहीं हुआ. इतिहास के पन्नों के आसरे जिस तरह की बहस संसद के भीतर हुई, उसने झटके में यह एहसास तो करा ही दिया […]

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संविधान की व्याख्या करते-करते कांग्रेस और बीजेपी ने अपने इतिहास को इस तरीके से सहेजना शुरू किया कि सामनेवाला कटघरे में खड़ा हो जाये. लेकिन, जनता की बदहाली का कोई जिक्र नहीं हुआ.

इतिहास के पन्नों के आसरे जिस तरह की बहस संसद के भीतर हुई, उसने झटके में यह एहसास तो करा ही दिया कि राजनीतिक दलों की समूची विचारधारा अब सत्ता ही है. सत्ता में बने रहने के लिए आंबेडकर का सहारा और संविधान की प्रस्तावना में लिखे शब्द ‘हम भारत के लोग’ को जबाव न दे पाने की हालात में भी आंबेडकर और इतिहास का सहारा. दो दिन में संसद की बहस ने कई सवालों को जन्म दे दिया. कभी लगा संघ परिवार हो या बीजेपी, दोनों के भीतर आंबेडकर को लेकर जो प्रेम और श्रद्धा उभरी है, वह सिर्फ संविधान निर्माता के तौर पर नहीं, बल्कि सियासी तौर पर कहीं ज्यादा है. तो कभी लगा कांग्रेस आजादी के वक्त की कांग्रेस को भी मौजूदा कांग्रेस की ही तर्ज पर देखना चाह रही है.
मौजूदा सियासत की महीन लकीर को समझें, तो सवाल सिर्फ दलितों के मसीहा आंबेडकर को नयी पहचान देकर अपने भीतर समाहित करने भर का नहीं है. सवाल नेहरू पर हावी किये जाते सरदार पटेल का भी है. सवाल गांधी जयंती को स्वच्छता दिवस के तौर पर मनाने का भी है. सवाल शिक्षक दिवस को पीएम का बच्चों से संवाद दिवस बनाने का भी है. सवाल नेहरू और इंदिरा गांधी की जयंती को सरकारी कार्यक्रमों में भुला दिये जाने का भी है. यानी कांग्रेस जिन प्रतीकों के माध्यमों से राष्ट्र की कल्पना को मूर्त करती आयी है, उसे मोदी सरकार के दौर में अगर डिगाया जा रहा है, तो राजनीतिक तौर पर यह सवाल हो सकता है कि क्या बीजेपी नये प्रतीक गढ़ना चाह रही है? जब लड़ाई सीधी है, तो क्या सड़क क्या संसद!
सोनिया गांधी आंबेडकर का आसरा लेकर यह कहने से नहीं चूकीं कि जिन्हें संविधान से कोई मतलब नहीं रहा, वे संविधान पर चर्चा करा रहे हैं. यानी उन पन्नों को सोनिया गांधी ने खोल दिया, जब महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर लगे प्रतिबंध को हटाने के लिए सरदार पटेल ने संघ से संविधान पर भरोसा जताने की बात कही थी. अन्यथा आरएसएस के ख्याल में तो उस वक्त भी मनुस्मृति से बेहतर कोई संविधान था ही नहीं. सोनिया गांधी ने वही किया, जो हर दौर की राजनीति कर सकती है यानी अतीत के जो शब्द मौजूदा वक्त में अनुकूल हैं, उन्हें चुन कर इतिहास का जिक्र कर खुश हुआ जाये. बीजेपी और जनसंघ संविधान बनाते वक्त बना नहीं था, लेकिन कांग्रेस ने 1935 के कानून का पहले विरोध किया और फिर इसी के तहत चुनाव भी लड़े और कानून को भी यह कह कर अमल में लाया कि हम इसे भीतर जाकर तोड़ेंगे, लेकिन नेता खुद टूटे और संघर्ष के मार्ग से हटा कर संविधान को सुधारवादी मार्ग पर धकेल दिया गया.
आंबेडकर ने संविधान के उद्देश्यों का जो जिक्र किया, वह आज भी अधूरा है. आंबेडकर ने तीन बातें रखी. पहली, देश में सामाजिक आर्थिक न्याय हो. दूसरी, उद्योग-धंधों और भूमि का राष्ट्रीयकरण हो. तीसरी, समाजवादी अर्थतंत्र अपनाया जाये. जाहिर है, वोट देने की बराबरी के अलावा असमानता का भाव समाज में बना रहेगा, उसका अंदेशा आंबेडकर को तब भी था. इसलिए वह सवाल भी खड़ा करते थे कि अंगरेजों के बनाये संवैधानिक मार्ग से हट कर क्या कोई दूसरा रास्ता है, जिस पर चलने से देश अपना आर्थिक और राजनीतिक विकास कर सकता था? आंबेडकर के बारे में इसीलिए कहा गया कि वह काम संविधानवादी की तरह करते थे, लेकिन सोचते क्रांतिकारी की तरह, जो नेहरू नहीं थे. तो क्या इसीलिए संविधान की मूल धारणा से ही हर सत्ता भटक गयी, क्योंकि संविधान के प्रस्तावना में तो, ‘वी द पीपल… फाॅर द पीपल… बाय द पीपल’ का जिक्र है.
संविधान की व्याख्या करते-करते कांग्रेस और बीजेपी ने अपने इतिहास को इस तरीके से सहेजना शुरू किया कि सामनेवाला कटघरे में खड़ा हो जाये. लेकिन, जनता का कोई जिक्र कहीं नहीं हुआ. किसी ने नहीं कहा कि देश की मौजूदा हालात में तो करीब बीस करोड़ लोगों को दो जून की रोटी तक मुहैया नहीं है. सरकार की तरफ से जब यह आंकड़ा जारी किया गया कि देश में 90 लाख लोगों के पास एक अदद छत तक नहीं है, तो सुप्रीम कोर्ट ने 12 दिसंबर, 2014 को सरकार से कहा कि आप दोबारा आंकड़े दीजिये. यानी देश के हालात ऐसे हैं कि सरकारी आंकड़ों पर संवैधानिक संस्थाओं का भरोसा डिगा हुआ है. महात्मा गांधी ने तो आजादी का मतलब ही रोटी-कपड़ा-मकान से जोड़ा और सविधान सभा में अपनी बात भी पहुंचायी कि शिक्षा और पीने का साफ पानी तो सभी को मिलना ही चाहिए. लेकिन, खुद सरकार के आंकड़े कहते हैं कि देश में 30 करोड़ लोग कभी स्कूल नहीं गये और आज भी 6 से 11 साल तक की उम्र के 14 लाख से ज्यादा बच्चे स्कूल से बाहर हैं. 62 फीसदी गांवों तक पीने का साफ पानी आज तक नहीं पहुंचा है. फिर दिलचस्प यह भी है कि लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी होनी चाहिए, इसका जिक्र संविधान में है, लेकिन राजनीतिक दलों ने आज तक सिर्फ इतना ही किया कि अपने चुनावी मैनिफेस्टो में इन्हीं बुनियादी जरूरतों को जोड़ कर जनता को बेवकूफ बनाना जारी रखा और अब तो इसे विकास का नाम दिया जा रहा है.
संविधान की प्रस्तावना में जिस भारत का ख्वाब देखा गया, उसके आधार स्तंभ न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व हैं. इसके मायने सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक विचार से जुड़े हैं. विचार-अभिव्यक्ति-विश्वास-धर्म से जुड़े हैं. पद एवं बराबर के अवसर से जुड़े हैं. इंसान की गरिमा और राष्ट्र की एकता के लिए जीने मरने से भी जुड़े हैं. लेकिन, देश का सच है कि इस साल 19 सितंबर तक 2,02,86,233 मामले न्यायालयों में लंबित पड़े थे, जिसके दायरे में एक करोड़ से ज्यादा परिवार त्रासदी झेल रहे हैं, क्योंकि उनका पैसा, वक्त और जहालत तीनों न्याय की आस में जी रहा है. फिर जेलों में इस वक्त 2,82,879 कैदी तो ऐसे हैं, जो अंडरट्रायल हैं. 13,540 कैदी सिर्फ इसलिए बंद हैं, क्योंकि उनकी जमानत देनेवाला कोई नहीं और इन सबके बीच अब बोलने की आजादी का मामला कुछ यूं हो चला है कि एक बड़े तबके को आपकी बात नागवार गुजरे, तो राष्ट्रद्रोही करार देने में वक्त नहीं लगता और जब तक आप हालात को समझें, तब तक आप समाज के लिए खलनायक करार दिये जा चुके होते हैं.
पुण्य प्रसून वाजपेयी
वरिष्ठ पत्रकार
punyaprasun@gmail.com
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