अंगरेजी का यह मोह कैसे छूटे!

डॉ सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार भगवान बुद्ध ने पहली बार मिले किसी जिज्ञासु से कहा था कि कुछ बोलो, ताकि मैं तुम्हारे बारे में जान सकूं. भाषा के प्रति हम पहले कितने सजग रहते थे, यह राजा भोज के एक किस्से से पता चलता है. एक बार राजा भोज पालकी में बैठे कहीं जा रहे […]
डॉ सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
भगवान बुद्ध ने पहली बार मिले किसी जिज्ञासु से कहा था कि कुछ बोलो, ताकि मैं तुम्हारे बारे में जान सकूं. भाषा के प्रति हम पहले कितने सजग रहते थे, यह राजा भोज के एक किस्से से पता चलता है.
एक बार राजा भोज पालकी में बैठे कहीं जा रहे थे. अचानक पालकी ढो रहे कहारों में से एक कहार ठोकर लग जाने के कारण गिर पड़ा. वह उठ नहीं पाया. अब एक पालकी की जरूरत पड़ी. निर्जन स्थान था, दूर-दूर तक कहीं कोई आदमी नजर नहीं आता था.
काफी खोजबीन (यहां बीन बजा-बजा कर खोजने से तात्पर्य नहीं है) के बाद उन्हें एक दुबला-पतला-सा आदमी नजर आया. वह एक वैयाकरण था यानी वह व्याकरण का ज्ञाता था.
कहार उसे पकड़ कर राजा भोज के पास ले गये. वैयाकरण ने काफी हाथ-पैर मारे, समझाया-बुझाया कि भाई, मैं तो शब्दों का विशेषज्ञ हूं. मैंने शब्द तो बहुत ढोये हैं, पर पालकी ढोना मेरे बस की बात नहीं. लेकिन राजा ने उसकी एक न सुनी. बेचारा वैयाकरण विवश होकर बाकी कहारों के साथ पालकी ढोने लगा.
जो पेशेवर कहार होते हैं, वे पालकी को कभी इस कंधे पर, तो कभी उस कंधे पर लेकर ढोते हैं, ताकि एक ही कंधे पर जोर न पड़े और कंधे दुखने से भी बचा जाये. लेकिन इस बात से अनजान वैयाकरण एक ही कंधे पर पालकी ढोता रहा. शीघ्र ही उसका कंधा दुखने लगा.
काफी देर से यह वाकया देख रहे राजा भोज से कहे बिना नहीं रहा गया- भारं वहसि दुर्बुद्धे, तव स्कंधं न बाधति? अर्थात्, ओ मूर्ख, तुम जो (एक ही कंधे पर) भार ढोये चले जा रहे हो, क्या इससे तुम्हारा कंधा नहीं दुखता? इस पर वैयाकरण ने तपाक से कहा- न तथा बाधते राजन यथा बाधति बाधते. अर्थात्, हे राजन, इससे मुझे उतना कष्ट नहीं हो रहा, जितना तुम्हारे ‘बाधति’ कहने से हो रहा है.
दरअसल, संस्कृत में धातुएं दो प्रकार की होती हैं- परस्मैपदी और आत्मनेपदी. दोनों के रूप अलग-अलग प्रकार से चलते हैं. गच्छ धातु के लट् लकार यानी वर्तमान काल में रूप इस तरह चलते हैं- गच्छति, गच्छत:, गच्छंति… आदि, तो बाध् धातु के इस तरह-बाधते, बाधेते, बाधंते… अंत: राजा को ‘बाधति’ के बजाय ‘बाधते’ कहना चाहिए था- तव स्कंधं न बाधते?
वैयाकरण को राजा द्वारा गलत शब्द का प्रयोग करते देख पालकी ढोने से भी ज्यादा कष्ट हुआ. जबकि हम न केवल भाषा की गलतियों पर ध्यान नहीं देते, बल्कि उस पर गर्व का अनुभव भी करते हैं. हमारा अज्ञान भी हमसे भाषा की गलतियां करवाता रहता है.
एक बैंक के अधिकारी से एक बार अपनी गुफ्तगू चल रही थी, जिसमें से गुफ्त मैं कर रहा था, बाकी का काम उन्होंने संभाला हुआ था. बाल-बच्चों का जिक्र छिड़ने पर उस बैंक अधिकारी ने बताया- माय फर्स्ट सन इज ए डॉटर… वह कहना यह चाहता था कि उसकी पहली संतान लड़की है. मखौल उड़ने पर भी, अंगरेजी का मोह कहो अलि कैसे छूटे!
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