दूरगामी होंगे बिहार चुनाव के नतीजे
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :28 Sep 2015 7:54 AM (IST)
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बिहार विधानसभा चुनाव में टिकट पाने के लिए जिस तरह का दृश्य सामने है, उसने यह साबित कर दिया है कि चुनाव किसी बड़े मकसद से नहीं लड़ा जाता. लेकिन, बिहार विधानसभा चुनाव बड़े मकसदों को सामने रखेगा. गोपाल कृष्ण गांधी ने अभी अपने एक लेख में इस वर्ष को ‘बिहार वर्ष’ कहा है. उन्होंने […]
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बिहार विधानसभा चुनाव में टिकट पाने के लिए जिस तरह का दृश्य सामने है, उसने यह साबित कर दिया है कि चुनाव किसी बड़े मकसद से नहीं लड़ा जाता. लेकिन, बिहार विधानसभा चुनाव बड़े मकसदों को सामने रखेगा.
गोपाल कृष्ण गांधी ने अभी अपने एक लेख में इस वर्ष को ‘बिहार वर्ष’ कहा है. उन्होंने 1935, 1950, 1975 और 1990 का स्मरण करते हुए बिहार के भविष्य (भारत का भविष्य भी) को बिहार विधानसभा चुनाव से जोड़ा है. 1935 में बिहार स्वतंत्र राज्य बना, 1950 में डॉ राजेंद्र प्रसाद देश के प्रथम राष्ट्रपति बने, 1975 में जयप्रकाश नारायण को गिरफ्तार किया गया और 1990 में लालू प्रसाद यादव ने लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा रोक दी. बिहार के लिए बीसवीं सदी के ये महत्वपूर्ण ऐतिहासिक वर्ष हैं. बिहार विधानसभा चुनाव से बिहार की ही नहीं, देश की भी भावी दिशा निर्धारित होगी. यह चुनाव भारतीय लोकतंत्र के स्वास्थ्य से भी जुड़ा है.
11.41 करोड़ की आबादी वाले राज्य बिहार का भविष्य 6.68 करोड़ मतदाताओं पर निर्भर है, जिनमें पुरुष मतदाता 3.56 करोड़ और महिला मतदाता 3.11 करोड़ से कुछ अधिक हैं. इस वर्ष पहली बार मतदान करनेवालों की संख्या 1.17 करोड़ है. 62 प्रतिशत साक्षर और 38 प्रतिशत निरक्षर मतदाताओं से कम अपेक्षाएं नहीं की जा रही हैं. 243 सीटों में से 203 सीटें सामान्य हैं, 38 विधानसभा सीटें अनुसूचित जाति के लिए और 2 अनुसूचित जनजातियों के लिए सुरक्षित हैं. बिहार में क्षेत्रीय दलों की उपेक्षा नहीं की जा सकती. भाजपा अकेले चुनाव नहीं जीत सकती. इक्कीसवीं सदी में ही यहां भाजपा की हैसियत प्रमुख राजनीतिक दल की बनी. उसके विधायकों की संख्या 2005 में 55 और 2010 में 91 थी.
पिछले लोकसभा चुनाव (2014) के बाद देश और बिहार का राजनीतिक परिदृश्य बदल चुका है. भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी की जीत में बिहार और उत्तर प्रदेश की अहम भूमिका रही है. इन दोनों राज्यों से भाजपा के सांसदों की संख्या सौ है. शुरू से ही बिहार समाजवादियों का गढ़ रहा है. कम्युनिस्टों और समाजवादियों ने इन दोनों राज्यों में अपनी कमजोर स्थिति के बारे में गंभीर आत्मचिंतन-आत्ममंथन नहीं किया है. बिहार में छह वाम दलों (भाकपा, माकपा, माले, एसयूसीआइ, फॉरवर्ड ब्लॉक और आरएसपी) का वाम मोर्चा चुनाव लड़ रहा है और सधमो (समाजवादी धर्मनिरपेक्ष मोर्चा) में भी शामिल दल छह हैं- सपा, राकांपा, जन अधिकार पार्टी (पप्पू यादव), समरस पार्टी (नागमणि), समाजवादी जनता पार्टी (देवेंद्र यादव), और नेशनल पीपुल्स पार्टी (पीए संगमा). इनसे अलग बिहार चुनाव में शिवसेना (उद्धव ठाकरे) और एआइएमआइएम (असदुद्दीन ओवैसी) ने भी अपने प्रत्याशी खड़े किये हैं.
भारतीय जनता पार्टी की जीत और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद जिस तरह से हिंदुत्वादी शक्तियां आगे बढ़ रही हैं और संघ नेतृत्वकारी भूमिका में है, इसने लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील शक्तियों के समक्ष अनेक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. संघ के समक्ष सांसद और मंत्रिमंडल उपस्थित हो चुके हैं. जो संघ, संघ परिवार और भारतीय जनता पार्टी का विरोधी है, वह सत्ता विरोधी है, और यहां तक कि उसे हिंदू विरोधी और राष्ट्र विरोधी भी बताया जा रहा है. सुब्रह्मण्यम स्वामी खुलेआम जेएनयू को ‘नक्सलियों का गढ़’ कह रहे हैं. लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर की जा रही हैं. शिक्षा और संस्कृति का अर्थ बदला जा रहा है. यह सब राजनीतिक ताकत प्राप्त करने के बाद ही संभव हो रहा है, जिसे रोकनेवाली शक्तियां एक साथ नहीं हैं. बिहार के चुनाव में विकास और जाति का मुद्दा अहम है. वास्तविक, वैचारिक मुद्दा लालू यादव गरज-गरज कर उठा रहे हैं, पर यह मुद्दा वोट को कम प्रभावित करेगा. जीतन राम मांझी चुनाव तक अमीरदास आयोग की रिपोर्ट पर बात करने से परहेज कर रहे हैं.
बिहार में चुनाव लड़ कौन रहा है? दल, व्यक्ति या विचारधारा? जाति, ‘विकास’ या ‘परिवर्तन’, बहस का यह स्तर साधारण है. सभी पार्टियों के दरवाजे खुले हुए हैं. उनमें आना-जाना लगा हुआ है. कार्यकर्ताओं में उमंग और उत्साह का पूर्व रूप नहीं दिख रहा है. यह चुनाव नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के बीच है. भारतीय जनता पार्टी ने हरियाणा, झारखंड आदि के चुनावों में कहीं भी मुख्यमंत्री की घोषणा नहीं की थी. बिहार में दलितों का नेता कौन है? रामविलास पासवान या जीतन राम मांझी?
मोदी और नीतीश में से बिहार के मतदाता किसे पसंद करेंगे? मोदी के गुजरात मॉडल का परिणाम है हार्दिक पटेल. गुजरात मॉडल भारत का विकास मॉडल नहीं बन सकता. मोदी को केजरीवाल की तरह लालू-नीतीश नहीं रोक सकेंगे, लेकिन उसे रोकने के लिए बिहार में केवल यही दो नेता बचे हैं. जीतन राम मांझी ने दुश्मन (नीतीश) के दुश्मन (भाजपा) को अपना दोस्त बनाया है. टिकट के लिए जिस तरह का दृश्य सामने है, उसने यह साबित कर दिया है कि चुनाव किसी बड़े मकसद से नहीं लड़ा जाता. लेकिन, बिहार विधानसभा चुनाव बड़े मकसदों को सामने रखेगा.
बिहार के मतदाताओं को मुख्य फैसला राजग (भाजपा, लोजपा, रालोसपा और हम) और महागंठबंधन (जदयू, राजद, कांग्रेस) के बीच करना है. पिछड़ों को लालू ने निश्चित रूप से स्वाभिमान दिया है. नीतीश की छवि किसी मुख्यमंत्री से कम नहीं है. बिहार चुनाव में जाति प्रमुख है. भाजपा ने सभी जातियों में सेंधमारी की है. भारतीय गांवों का लगभग हर तीसरा परिवार भूमिहीन है. मोदी का विकास-मॉडल इसके लिए नहीं है.
बिहार के इस चुनाव पर देश-विदेश की आंखें इसलिए टिकी हुई हैं कि इससे हिंदुत्ववादी शक्तियां या तो रुकेंगी या आगे बढ़ेंगी, संघ को ब्रेक लगेगा या उसकी गति बढ़ेगी, भारतीय लोकतंत्र में असहमति और विरोध का सम्मान होगा या उसे दबाया जायेगा, शिक्षा और संस्कृति का भगवाकरण होगा या उस पर अल्पविराम-अर्धविराम लगेगा, भारतीय संविधान को सबल किया जायेगा या दुर्बल किया जायेगा. इस बार बिहार चुनाव सामान्य विधानसभा चुनाव नहीं है. मतदाताओं के ऊपर बिहार में इतनी बड़ी जिम्मेवारी पहले नहीं आयी थी- संभवत: 1977 को छोड़ कर.
रविभूषण
वरिष्ठ साहित्यकार
delhi@prabhatkhabar.in
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