कबीरा मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :23 Sep 2015 5:53 AM (IST)
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गिरींद्र नाथ झा किसान एवं ब्लॉगर धान में बाली आ गयी है. खेतों को देख कर ऐसा लगता है मानो बेटी की डोली सज गयी हो. मेरे लिए हमेशा ही धान बेटी की तरह रहा है. साल भर भूखे रहने की नौबत न आये, धान इसकी व्यवस्था कर देता है. आलू लगाने की तैयारी भी […]
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गिरींद्र नाथ झा
किसान एवं ब्लॉगर
धान में बाली आ गयी है. खेतों को देख कर ऐसा लगता है मानो बेटी की डोली सज गयी हो. मेरे लिए हमेशा ही धान बेटी की तरह रहा है. साल भर भूखे रहने की नौबत न आये, धान इसकी व्यवस्था कर देता है. आलू लगाने की तैयारी भी शुरू हो चुकी है. किसान इन दिनों बहुत कुछ दांव पर लगा रहे हैं. नकदी फसल के रूप में पूर्णिया में मकई-आलू का कोई जोड़ नहीं है. ट्रैक्टर की फट-फट आवाज देर रात सुनाई दे रही है. किसानों के लिए यह महीना सबसे थकाऊ होता है. मेरे लिए ये सब ग्राम्य गीतों की तरह है.
अंचल में दिन और रात का अंतर अभी पता नहीं चल पा रहा है. धूल-धूसरित शरीर और माटी में डूबा मन इन दिनों माटी की कविता-कहानी में डुबकी लगा रहा है. खेत की तैयारी होने के बाद किसानों के हाथों में जो कुछ पूंजी बची है, उससे कोई भगैत करवा रहा है, तो कोई ग्राम्य देवता की पूजा-अर्चना.
गाम के रामठाकुर स्थान से देर रात तक ढोलक की थाप सुनाई देती है. पलटन ऋषि की आवाज और हारमोनियम की धुन कान तक जब पहुंचती है, तो मन साधो-साधो करने लगता है. वहीं कबीर मठ से भी आवाज आ रही है. मैं कबीर की पाती बुदबुदाने लगता हूं- ‘कबीरा मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर…’
खैर, पटवन और खाद-बीज के कर्ज में डूबे किसान मिर्च की उपज से संतुष्ट हैं. कर्ज अदायगी के बाद उनका मन हरा-भरा दिख रहा है. और नयी फसल से उन्हें काफी उम्मीदें हैं. किसानी करते हुए मैं भी उम्मीदें बांधने लगा हूं.
अंचल की रात और यह लैपटॉप, फसल की तरह शब्दों की भी खेती करते रहने की सोचने लगा हूं. नहर पार से कुछ आवाजें आ रही हैं. सुबह के तीन बज रहे हैं. पस्सर खोलने का समय है, भैंसवार गीत गा रहा है. आवाज में विरह है. बिना शास्त्रीय ज्ञान के ही भैंसवार हमें शास्त्रीय संगीत सुना रहा है. मैं किसानी के संग फणीश्वर नाथ रेणु की लिखी बातों में डूबने लगता हूं.
अपनी जमीन पर कदंब के संग धान, मक्का और गेहूं की खेती मुझे इन दिनों पेंटिंग ही लगती है. खेत मेरे लिए कैनवास बन जाता है और किसानी कर रहे लोग मशहूर पेंटर की तरह नजर आने लगते हैं. मन शांत हो जाता है. दुनियादारी कुछ पल के लिए थम सी जाती है. खिड़की से बाहर झांकता हूं, तो आसमान में अंतिम तारा सुबह के लिए व्याकुल हुआ जा रहा है. चिड़ियों की हल्की चहचहाहट सुनाई देने लगी है. किसान अब नये दिन की तैयारी में जुटने लगे हैं. आज खाद-बीज से खेत की दुनिया बदलनी है. सब कुछ जमीन पर.
सच कहूं तो रेणु का ‘मैला आंचल’ अब आंखों में बस सा गया है. मुझे भी चनका के अपने कमरे से विशाल मैदान नजर आने लगा है. मैं भी अब कहना चाहता हूं- यही है वह मशहूर मैदान- नेपाल से शुरू होकर गंगा किनारे तक-वीरान, धूमिल अंचल.
मैदान की सूखी हुई दूबों में चरवाहों ने आग लगा दी है- पंक्तिबद्ध दीपों जैसी लगती है दूर से. तड़बन्ना के ताड़ों की फुगनी पर डूबते सूरज की लाली क्रमश: मटमैली हो रही है… वगैरह-वगैरह…
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