चुनाव से परे कुछ अपने गांव की बात

Published at :16 Sep 2015 5:35 AM (IST)
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चुनाव से परे कुछ अपने गांव की बात

गिरींद्र नाथ झा किसान एवं ब्लॉगर देश जब बिहार में होनेवाले चुनाव की बातें करने में मशगूल है, मुझे देहाती बात करने में आनंद मिल रहा है. अपनी माटी की बात, अपने गांव की बात, क्योंकि हर एक के भीतर में एक गांव बसा होता है. राजनीतिक उठापटक तो होते ही रहेंगे, लेकिन इन सबके […]

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गिरींद्र नाथ झा

किसान एवं ब्लॉगर

देश जब बिहार में होनेवाले चुनाव की बातें करने में मशगूल है, मुझे देहाती बात करने में आनंद मिल रहा है. अपनी माटी की बात, अपने गांव की बात, क्योंकि हर एक के भीतर में एक गांव बसा होता है. राजनीतिक उठापटक तो होते ही रहेंगे, लेकिन इन सबके बीच हर एक के भीतर गाम-घर बचा रहे, यह जरूरी है. आज मुझे देहाती शब्दों पर, बोली-बानी पर लंबी बातचीत करने की इच्छा है. बैलगाड़ी, संपनी, पटुआ-संठी, टप्पर, कचिया-खुरपी, बखारी या फिर भैंसवार के मुख से भोर में गानेवाली ‘प्रातकी’ को शहर तक पहुंचाने की इच्छा है. अखबारों के पन्नों पर देहाती बातें पढ़ने का अपना अलग ही सुख है.

अंचल की अपनी भाषाई डाइरेक्टरी होती है. किसानी करते हुए ऐसे शब्दों से अपनापा बढ़ जाता है. लेकिन दुख इस बात का है कि कई चीजें गाम-घर से गायब होती जा रही हैं, मसलन बैलगाड़ी या फिर बखारी. लेकिन यह भी सच है कि गांव से जुड़ी कोई भी बात बिन बैलगाड़ी के सूनी है. मुझे याद आता है रंगीन टप्पर. उसे बांस से बनाया जाता था और खूबसूरत रंगों से रंगा जाता था.

उसमें पेंटिंग से कलाकृतियां उकेरी जाती थीं. मुझे आज भी बैलगाड़ी का टप्पर लिखने भर से मन 90 के दशक में डुबकी लगाने लगता है. हाल ही में फणीश्वर नाथ रेणु के घर जाना हुआ था. वहां रेणु स्मृति पर्व का आयोजन हुआ था. हम उनके बैठक-खाने में बातचीत कर रहे थे. तभी हमारी नजर अचानक बैठक-खाने के सीलिंग पर गयी. वह फूस का बना हुआ था, लेकिन बांस की बत्तियों को रंग-रौनक कर जिस तरह सजाया गया था, मुझे टप्पर की याद आने लगी.

कोसी क्षेत्र में 80-90 के दशक तक इन टप्परों का बोलबाला था. लोगबाग कुशल कारीगरों से टप्पर बनवाया करते थे. बाद में ये टप्पर ट्रैक्टरों के ट्रेलर पर भी लगाया जाने लगा. खराब सड़कों पर महिलाएं ट्रेलर से शहर जाती थीं, उनके लिए टप्पर लगाया जाता था. टप्पर के पीछे पर्दे भी लगाये जाते थे. ये पर्दे सुंदर साड़ियों से बनाये जाते थे. मेला आदि में लोगबाग सपरिवार इन्हीं गाड़ियों से आया-जाया करते थे.

मुझे बैलगाड़ी से पीछे की एक और सवारी संपनी गाड़ी की याद आ रही है. संपनी गाड़ी को एक भैंसा के कंधे के सहारे चलाया जाता था. संपनी सखुआ की लकड़ी से बनता था. इसमें बैठने और आराम से लेटने की व्यवस्था के साथ-साथ छोटा टेबल भी रखा होता था, ताकि उसमें सवार लोग कुछ लिखाई-पढ़ाई कर सकें. ऐसी यादें अब केवल जुबानी ही रह गयी हैं. हमारी कोशिश है कि इसे वैसे लोगों तक पहुंचाया जाए, जो इससे अनजान हैं, लेकिन उनके पुरखों का इससे नाता रहा है. देहात की बातों में रसों का भंडार है, बस उसे समझने की जरूरत है.

बैलगाडी पर लिखते वक्त फणीश्वर नाथ रेणु की कृति ‘मारे गये गुलफाम ऊर्फ तीसरी कसम’ पर आधारित राजकपूर की फिल्म याद आने लगती है. फिल्म का नायक हीरामन बैलगाड़ी हांकता है. गांव की ऐसी सादगी हमने आज तक रुपहले पर्दे पर नहीं देखी है. दरअसल, यही सबसे बड़ी सच्चाई है. चुनावी वक्त में इस तरह की देहाती बातें कर सच में ‘देहातीत सुख’ का आनंद मिल रहा है.

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