पेंशन कोई दयादान नहीं होता!

Published at :21 Aug 2015 3:26 AM (IST)
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पेंशन कोई दयादान नहीं होता!

चंदन श्रीवास्तव एसोसिएट फेलो, सीएसडीएस बीते पंद्रह दिनों में दिल्ली पुलिस दो दफे माफी मांगने की मुद्रा में दिखी. एक दफे उसने जीभ दाब कर अफसोस जताया, दूसरी बार मुंह खोल कर माफी मांगी.संसद के मॉनसून सत्र और स्वतंत्रता दिवस के मौके के बीच हल को प्रतीक चिह्न् बना कर किसान दिल्ली के जंतर-मंतर पर […]

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चंदन श्रीवास्तव
एसोसिएट फेलो, सीएसडीएस
बीते पंद्रह दिनों में दिल्ली पुलिस दो दफे माफी मांगने की मुद्रा में दिखी. एक दफे उसने जीभ दाब कर अफसोस जताया, दूसरी बार मुंह खोल कर माफी मांगी.संसद के मॉनसून सत्र और स्वतंत्रता दिवस के मौके के बीच हल को प्रतीक चिह्न् बना कर किसान दिल्ली के जंतर-मंतर पर देश को अपना दुखड़ा सुनाने जुटे. पुलिस को लगा कि किसान दुखियारे नहीं, बल्कि दिल्ली की अमन के लिए खतरा हैं.
उसने किसानों के संघर्ष का प्रतीक हल छीना, लाठियां भांजी, ‘जय किसान यात्र’ के नेताओं को गिरफ्तार किया. कोर्ट ने डांटा, तो दिल्ली पुलिस को अक्ल आयी. उसके संयुक्त आयुक्त एमके मीणा ने टीवी पर जय किसान आंदोलन के नेता से कहा कि आप लोगों के साथ ज्यादती हुई है तो हमें इसका अफसोस है.
15 अगस्त की पूर्व संध्या पर दिल्ली पुलिस की लाठी फिर गरजी. इस बार लाठी के निशाने पर सेना के रिटायर्ड जवान थे. रिटायर्ड सैनिक वर्षो से मांग कर रहे हैं कि पेंशन में मौजूद विसंगति दूर करो, वादा निभाओ और ‘समान रैंक-समान पेंशन’ के नियम से हमारी शेष जिंदगी का हिसाब करो. दिल्ली पुलिस को लगा, हक की मांग करते सैनिकों से दिल्ली के अमन को खतरा है, उसने लाठी भांज दी. लेकिन सैनिक मरते दम तक सैनिक होते हैं.
वे अपनी मांग को लेकर तन गये. आमरण अनशन शुरू हुआ. इसका ही नतीजा है कि दिल्ली पुलिस की तरफ से एमके मीणा माफी मांगते हुए फौजियों को भरोसा दिलाना चाहते हैं कि ‘आगे से यह गलती नहीं होगी’. प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) भी हरकत में आया. अनशन करते जवानों को मनाने की कोशिश हुई. फिलहाल दस दिनों तक अनशन रोकने की सहमति बनी है. दस दिनों के भीतर रक्षामंत्री और प्रधानमंत्री वन रैंक-वन पेंशन के मुद्दे पर किसी ठोस निर्णय पर नहीं पहुंचे, तो रिटायर्ड सैनिकों का अनशन फिर शुरू होगा.
पुलिस शायद ही कभी माफी मांगती है, लेकिन इस बार उसे मांगनी पड़ी. जंतर-मंतर पर आये दिन अनशन चलते हैं, लेकिन पीएमओ की नींद जल्दी नहीं टूटती. फौजियों के मामले में उसकी तंद्रा ऐसे टूटी, मानो डंक लगा हो.
पुलिस और पीएमओ इस बार विनयी बने दिख रहे हैं, तो इसलिए कि अपनी हेठी में दोनों ने भारत नाम के राष्ट्र के बुनियादी विचार को आघात पहुंचाया है. यह हल लेकर खेत जाते किसान और सीमा पर बंदूक लिए पहरेदारी करते जवान का विचार है. एक को उसके जीवित रहते यह देश ‘अन्नदाता’ कहता है, तो दूसरे को प्राण गंवाते ही ‘शहीद’.
राष्ट्र के विचार के भीतर ‘अन्नदाता’ और ‘शहीद’ बीजाक्षर मंत्र का काम करते हैं. राष्ट्र के भीतर रहते हुए आप इस पवित्रता का उल्लंघन किसी भी कीमत पर नहीं कर सकते. इस देश ने ‘किसान’ और ‘जवान’ को पवित्र मान कर ही जिया है. याद करें, 1965-1966 का वक्त. भारी सूखा, भारत-पाक युद्ध और इसके आपद् स्थिति में अमेरिका ने अनाज भेजना बंद कर दिया.
उस वक्त लाल बहादुर शास्त्री ने सपरिवार हफ्ते में एक दिन का उपवास रखना शुरू किया. देशवासियों से भी ऐसा ही करने को कहा. किसी जोर-जुलुम के आगे ना झुकनेवाले स्वाभिमानी भारत ने शत्रु के भय और जनता की भूख पर स्वावलंबन से विजय पाने का संकल्प किया. नारा बना- ‘जय जवान-जय किसान’. तब से लेकर आज के बीच भारत बहुत बदला है, लेकिन अपना बुनियादी विचार नहीं बदल पाया है.
बदलने की सारी कोशिशें अपनी वैधता हासिल करने के लिए इसी नारे का सहारा लेती हैं. पोखरण-परीक्षण हुआ, तो कांग्रेसी शास्त्रीजी के ‘जय जवान-जय किसान’ के नारे में भाजपाई वाजपेयी जी बस ‘जय विज्ञान’ जोड़ पाये. किसान और जवान का नाम लिये बगैर विज्ञान कहना परंपरा ने उनके लिए असंभव बना दिया था.
समान रैंक-समान पेंशन की मांग को ‘भारत’ नाम के विचार के भीतर पैठी पवित्रता का सहारा हासिल है. आप इस मांग को पूरा करने से इनकार नहीं कर सकते. और वैसे भी, सैनिकों की मांग में नाजायज क्या है? 80 फीसदी फौजी 40 की उम्र से पहले रिटायर्ड हो जाते हैं. दूसरे, सेवा के स्वभाव के अनुकूल सिविल सर्विस के विपरीत सैनिकों को किसी भी वक्त ड्यूटी के लिए अक्षम मान कर सेवामुक्त किया जा सकता है.
शेष उम्र के सहारे के रूप में उनके पेंशन में ऐसा ठहराव क्यों हो कि पांचवें पे कमीशन के वक्त कर्नल के ओहदे पर पहुंचे सैनिक को छठे पे कमीशन के वक्त इसी ओहदे पर पहुंचे सैनिक की तुलना में कम राशि मिले? यह ना तो उनकी सेवा और ओहदे का सम्मान है, ना ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश का. सुप्रीम कोर्ट ने 2009 में ही समान रैंक-समान पेंशन का फैसला सुना दिया था.
अच्छा होता, 25 लाख रिटायर्ड सैनिकों के लिए सालाना 8,300 करोड़ रुपये खर्च करने का फैसला लेते समय सरकार को सुप्रीम कोर्ट का यह वाक्य याद होता कि पेंशन कोई दयादान नहीं है और न ही यह नौकरी देनेवाले की मनमर्जी का मामला है.
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