इस सजा के सबक

Published at :31 Jul 2015 3:00 AM (IST)
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इस सजा के सबक

तीस जुलाई की सुबह याकूब मेमन को फांसी दिये जाने से कुछ ही समय पहले सुप्रीम कोर्ट की आखिरी सुनवाई के बाद जब महाधिवक्ता मुकुल रोहतगी से पूछा गया कि क्या वे याचिका खारिज किये जाने को विजय के रूप में देखते हैं, तो उनका जवाब था कि यह विजय का मामला नहीं है, इस […]

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तीस जुलाई की सुबह याकूब मेमन को फांसी दिये जाने से कुछ ही समय पहले सुप्रीम कोर्ट की आखिरी सुनवाई के बाद जब महाधिवक्ता मुकुल रोहतगी से पूछा गया कि क्या वे याचिका खारिज किये जाने को विजय के रूप में देखते हैं, तो उनका जवाब था कि यह विजय का मामला नहीं है, इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया पूरी हुई है.
मुंबई बम धमाकों के लिए दोषी पाये गये मेमन की फांसी को इसी गंभीरता के साथ देखा जाना चाहिए. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि मेमन समेत सभी आरोपियों को विशेष टाडा अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक अपना पक्ष रखने और बचाव का हरसंभव अवसर मिला. फांसी के लिए तय वक्त से चंद घंटे पहले देर रात सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खुलना और मेमन की याचिका पर सुनवाई करना इस बात का ठोस उदाहरण है.भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है, जो वर्षो से अलगाववादी और आतंकी हिंसा से जूझते रहे हैं.
पाकिस्तानी शासन और सेना द्वारा भारत-विरोधी गतिविधियों को संरक्षण और समर्थन देने की बात भारत ने विभिन्न मंचों पर कई बार उठायी है, लेकिन इन प्रयासों के सकारात्मक परिणाम नहीं निकल सके हैं. मुंबई धमाकों के प्रमुख अभियुक्त दाऊद इब्राहिम और टाइगर मेमन पाकिस्तान में ही हैं. कुछ दिन पहले जब मेमन की सजा न्यायालय से लेकर नुक्कड़ तक चर्चा में थी, पंजाब के गुरदासपुर जिले में आतंकी हमला हुआ.
ऐसे में मेमन की फांसी आतंक के विरुद्ध कठोर संदेश है. भारतीय राज्य ने अपने घटकों- अदालत और सरकार- के जरिये फांसी पर निर्णय लेकर अपना रुख स्पष्ट कर दिया है कि आतंकियों के प्रति किसी तरह की नरमी नहीं बरती जा सकती है.
हालांकि इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के साथ कुछ जरूरी सवाल और सबक भी देश के सामने हैं, जिन पर गौर करने की जरूरत है. सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इस फांसी को राजनीतिक या सांप्रदायिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए. बीते कुछ दिनों से ऐसे कई बयान सार्वजनिक मंचों पर दिये गये हैं, जो निहित उद्देश्यों से प्रेरित जान पड़ते हैं. सोशल मीडिया पर भी ऐसी ही चिंताजनक तस्वीर है. ऐसा व्यवहार प्रदर्शित करनेवालों में फांसी के समर्थक और विरोधी दोनों ही शामिल हैं.
उनकी अतिवादी और गैरजिम्मेवाराना टिप्पणियां आतंक के विरुद्ध देश के संघर्ष को कमजोर बना सकती हैं. दूसरी बात, इस तरह के मामलों की तहकीकात और सुनवाई में होनेवाली अत्यधिक देरी की समस्या के समाधान के लिए सरकार, जांच एजेंसियों और न्यायिक व्यवस्था को मिल कर कोशिश करनी चाहिए. गिरफ्तारी से फांसी के फंदे तक पहुंचने में याकूब मेमन को करीब 22 साल का लंबा वक्त लग गया.
यह कानूनी प्रक्रिया में कमियों और आतंकी हिंसा जैसे मामले में भी राजनीतिक दखल का ही नतीजा है कि खालिस्तानी और लिट्टे समर्थक तमिल आतंकियों की फांसी का मामला अधर में लटका हुआ है. कुछ संगठनों ने इसी आधार पर मेमन के मामले में सरकार पर सांप्रदायिक रुख अपनाने का आरोप भी लगाया है.
देश में अस्थिरता फैलाने की कोशिश में लगी ताकतें मेमन की फांसी के बहाने अपना समर्थन बढ़ाने की कोशिश कर सकती हैं.
ऐसे में पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को अतिरिक्त चौकस रहना होगा. सुरक्षा एजेंसियों की कार्यप्रणाली को आधुनिक और बेहतर बनाने के लिए बने कार्यक्रमों पर अमल में विलंब नहीं किया जा सकता. आतंकवाद पर कारगर नियंत्रण के लिए निगरानी का चुस्त होना जरूरी शर्त है. साथ ही, आतंकी हमलों और मेमन की फांसी जैसी स्थितियों में पुलिस और सशस्त्र बलों की सक्रियता तथा मीडिया द्वारा उनकी रिपोर्टिग को लेकर भी सहमति पर आधारित कुछ सकारात्मक दिशा-निर्देश तय करने की जरूरत है.
पूरी दुनिया में फांसी की सजा को लेकर बहसें चल रही हैं. हमारे देश में भी इस सजा को हटाये जाने की मांग की जाती रही है. बहुत से लोगों का तर्क है कि फांसी की सजा अपराध निरोध का सही उपाय नहीं है. दुनिया के 140 से अधिक देशों में इस सजा का निषेध है.
भारत में भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने विभिन्न निर्णयों के द्वारा फांसी की सजा देने की प्रक्रिया को जटिल बना दिया है और निचली अदालतों के ऐसे अनेक फैसलों को बदला भी है. लेकिन, जघन्यतम अपराध के किसी दोषी को सजा होने के दौरान इस तरह की बहस को उठाना बेमानी है. इस कारण बहस उस एक मामले के इर्द-गिर्द सिमट जाती है और मूल मुद्दा हाशिये पर चला जाता है.
फांसी के विरोध में खड़े दलों, संगठनों और लोगों को ऐसी बहस को संसद के सामने रखना चाहिए, जहां इससे जुड़े पहलुओं पर विस्तार से बात हो सकती है. अंतत: कानूनी पहलुओं में संशोधन का अधिकार संसद के पास ही है. आतंक और न्याय पर चर्चा करने से पहले आरोप-प्रत्यारोपों और निहित स्वार्थो से ऊपर उठना जरूरी है.
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