बचत पर आघात नयी कर प्रणाली

By Prabhat Khabar Digital Desk
Updated Date
डॉ अश्विनी महाजन
एसोसिएट प्रोफेसर,
दिल्ली विश्वविद्यालय
ashwanimahajan@rediffmail.com
बजट में प्रस्तावित नयी वैकल्पिक वैयक्तिक आयकर व्यवस्था में कर की दरों को घटाया गया है, लेकिन शर्त यह है कि करदाताओं को पहले मिलनेवाली कटौतियों और छूट का त्याग करना होगा. करों के साथ अतिरिक्त उपकर (सेस) भी लागू होंगे. वैकल्पिक व्यवस्था में दरों को इस प्रकार से रखा गया है कि वेतनभोगी करदाता पूर्व के मुकाबले कम कर का भुगतान करेंगे और उन्हें कोई बचत भी नहीं करनी पड़ेगी. उदाहरण के लिए, 20 लाख रुपये की आयवाले वेतनभोगी करदाताओं को नयी व्यवस्था के तहत केवल 3,37,500 रुपये का आयकर देना होगा, जबकि इससे पूर्व वे छूट का लाभ उठाने के बाद भी 3,45,000 रुपये का भुगतान करते थे.
सरकार का दावा है कि 80 प्रतिशत करदाता नये विकल्प को चुनेंगे. शायद सही भी है, क्योंकि ऐसा करना अधिकतर करदाताओं के लिए फायदेमंद होगा. लेकिन हमें समझना होगा कि नये प्रस्तावों में जहां आयकर से राहत दी जा रही है, लेकिन यह प्रस्ताव बचत संस्कृति, अर्थव्यवस्था में समग्र बचत और अर्थव्यवस्था में सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) की वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव डालनेवाला है.
यह सर्वविदित है कि भारतीयों में बचत की प्रवृत्ति काफी प्रबल है. लोग अपने भविष्य को सुरक्षित करने तथा परिवार की जरूरतों के लिए निवेश व बचत करते हैं. कई दशकों से सरकार द्वारा विभिन्न प्रकार की रियायतें देकर विशिष्ट प्रकार की बचतों को प्रोत्साहित किया जाता रहा है, जैसे- जीवन बीमा, भविष्य निधि एवं सार्वजनिक भविष्य निधि (पीपीएफ) आदि. पिछले कुछ सालों से सरकार राष्ट्रीय पेंशन योजना में 50 हजार रुपये तक के सालाना के अंशदान पर भी आयकर में छूट दे रही है. इन उपायों से देश में बचत की बढ़ोतरी हुई है.
इस बचत से सरकार राजकोषीय घाटे के वित्तपोषण हेतु उधार तो लेती ही है, इन संसाधनों से हमारे इंफ्रास्ट्रक्चर और पूंजी निवेश में भी काफी मदद मिलती है. सरकार की यह कार्यवाही देश में बचत को हतोत्साहित कर सकती है. हालांकि, आदतों के अनुरूप कुछ लोग यह रियायतें वापस होने पर भी बचत करना जारी रख सकते हैं, लेकिन रियायतें वापस होने से सामान्य तौर पर बचत संस्कृति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.
देश में पूंजी निर्माण की दर समय के साथ बढ़ रही है. वर्ष 2011-12 तक सकल घरेलू पूंजी निर्माण की दर जीडीपी के 39.6 प्रतिशत तक पहुंच गयी थी. इस पूंजी निर्माण को काफी हद तक घरेलू बचत द्वारा ही वित्त पोषित किया गया. वर्ष 2007-08 तक घरेलू पूंजी निर्माण में विदेशी संसाधनों का योगदान कभी भी जीडीपी के दो प्रतिशत से ज्यादा नहीं रहा. हाल के कुछ सालों में यह 4-5 प्रतिशत तक रहा. लेकिन औसतन यह दो प्रतिशत से कम ही रहा. वर्ष 2011-12 के बाद सकल घरेलू पूंजी निर्माण की दर घटती गयी और 2017-18 में यह मात्र 30.9 प्रतिशत रह गयी.
इस दर के घटने का प्रमुख कारण यह रहा कि देश में गृहस्थ बचत 2011-12 में जीडीपी के 23.6% से घटती हुई 2017-18 में मात्र 17.2% रह गयी. इस कारण पूंजी निर्माण की दर भी घटती जा रही है. आर्थिक वृद्धि बेहतर करने के लिए पूंजी निर्माण बढ़ाना जरूरी है और इसके लिए घरेलू बचत को बढ़ाना जरूरी है. इस कारण गृहस्थों में बचत की घटती प्रवृत्ति चिंता का विषय होनी चाहिए.
यह बदलाव निर्दिष्ट स्कीमों में निवेश की बचत के लिए हतोत्साहित करता है. यही नहीं, राष्ट्रीय पेंशन योजना के तहत भी बचत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, और इन सब के कारण हमारे पूंजी निर्माण और जीडीपी ग्रोथ पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.
घरेलू बचत के घटने से पूंजी निर्माण के लिये विदेशी संसाधनों पर निर्भरता बढ़ सकती है. हालांकि पूर्व में विदेशी संसाधनों का योगदान पूंजी निर्माण में काफी कम रहा है, लेकिन यदि घरेलू बचत कम होने से विदेशी संसाधनों पर निर्भरता बढ़ती है, तो इसके कारण ब्याज, डिविडेंट, राॅयल्टी भुगतान इत्यादि के कारण हमारे विदेशी मुद्रा भुगतान बढ़ सकते हैं, जिससे भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ सकता है और उसका मूल्य घट सकता है.
यह नहीं भूलना चाहिए कि देश में घरेलू बचत के आधार पर पूंजी निर्माण के कारण ही भारत दुनिया का सबसे तेजी से विकास करनेवाला देश बन पाया है. यदि करदाता वैकल्पिक प्रणाली अपनाते हैं, तो उसका सीधा असर सरकारी खजाने पर भी पड़ सकता है और राजस्व कम हो सकता है. याद रहे, राजकोषीय घाटे की भरपाई वित्तीय संस्थानों और कोष से उधार लेकर की जाती रही है. लेकिन इनमें घरेलू बचत कम होने से वित्त पोषण के स्रोत सिकुड़ जायेंगे और सरकार को घाटा कम करने के लिए अतिरिक्त नोट छापने होंगे, जो मुद्रास्फीति का कारक होगा.
लगता है कि वित्त मंत्री कर व्यवस्था सरल बनाना चाहती हैं और मंदी का ध्यान रखते हुए मांग बढ़ाने के लिए आयकर कम करने के अलावा बचत भी घटाना चाहती हैं.
लेकिन भूलना नहीं चाहिए कि मौजूदा धीमापन एक अल्पकालिक स्थिति है, जिससे अन्य तरीकों से निबटना चाहिए. नयी कर प्रणाली न केवल हमारी बचत संस्कृति पर हमला करती है, बल्कि सरकार के राजस्व और उधारी पर भी प्रतिकूल असर डालती है. इससे विदेशी पूंजी का प्रभुत्व भी बढ़ सकता है. यह सब विकास की हमारी आकांक्षाओं के विपरीत होगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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