संकटग्रस्त मेडिकल शिक्षा

Updated at : 16 May 2019 2:03 AM (IST)
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संकटग्रस्त मेडिकल शिक्षा

हमारे देश में हर साल करीब 50 हजार डॉक्टर मेडिकल कॉलेजों से निकलते हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय डॉक्टरों की अच्छी प्रतिष्ठा है और दुनिया की सबसे बड़ी मेडिकल शिक्षा प्रणालियों में भारत का नाम शामिल है. लेकिन इन उपलब्धियों के बावजूद हमारे मेडिकल कॉलेज गंभीर कमियों से ग्रस्त हैं. डॉक्टरों की एक अहम संस्था […]

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हमारे देश में हर साल करीब 50 हजार डॉक्टर मेडिकल कॉलेजों से निकलते हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय डॉक्टरों की अच्छी प्रतिष्ठा है और दुनिया की सबसे बड़ी मेडिकल शिक्षा प्रणालियों में भारत का नाम शामिल है. लेकिन इन उपलब्धियों के बावजूद हमारे मेडिकल कॉलेज गंभीर कमियों से ग्रस्त हैं.
डॉक्टरों की एक अहम संस्था एसोसिएशन ऑफ डिप्लोमैट नेशनल बोर्ड के मुताबिक, पिछले 10 सालों में 576 मेडिकल संस्थानों में से 332 ने एक भी शोध पत्र प्रकाशित नहीं किया है. अनुसंधान चिकित्सा अध्ययन और प्रशिक्षण के आधार होते हैं. यदि हमारे आधे से अधिक कॉलेजों में ऐसा नहीं हो रहा है, तो यह डॉक्टर बन रहे छात्रों की क्षमता तथा शिक्षण प्रबंधन पर बड़ा सवालिया निशान है.
सरकारी संस्थानों की लचर व्यवस्था पर अक्सर चर्चा होती है, पर यह भी ख्याल रखा जाना चाहिए कि लगभग 60 फीसदी मेडिकल कॉलेज निजी क्षेत्र में हैं. ये संस्थान अपने छात्रों से भारी शुल्क वसूलते हैं. शोध नहीं हो पाना इस लिहाज से भी चिंताजनक है कि हर स्नातकोत्तर छात्र को अंतिम परीक्षा के लिए एक थिसिस लिखनी होती है. तो, क्या यह मान लिया जाये कि ज्यादातर थिसिस प्रकाशित होने लायक नहीं होते हैं
और उन्हें सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए लिखा जाता है? गंभीर अध्ययनों की इस कमी का नुकसान भारत समेत अन्य देशों को भी हो सकता है. विश्व बैंक के मुताबिक, एक-तिहाई भारतीय डॉक्टर पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रशिक्षण या काम करने के लिए विदेश चले जाते हैं. तकरीबन 15 सौ ऐसे डॉक्टर तो अकेले अमेरिका का रुख करते हैं.
रिसर्च की कमी का एक बड़ा कारण डॉक्टरों पर बड़ा बोझ है. हर मेडिकल कॉलेज के साथ एक अस्पताल भी होता है. भारतीय चिकित्सा परिषद के आंकड़ों के अनुसार दिसंबर, 2017 में 1,596 लोगों पर एक एलोपैथिक डॉक्टर का अनुपात था. करीब 8.33 लाख डॉक्टर देशभर में कार्यरत हैं. सस्ते और बेहतर इलाज के लिए बड़ी संख्या में लोग मेडिकल कॉलेज के अस्पतालों में जाते हैं. वहां जांच और उपचार का मुख्य जिम्मा कनिष्ठ डॉक्टरों और अंतिम वर्ष के छात्रों का होता है.
स्वाभाविक तौर पर उनके लिए शोध पर ध्यान देना मुश्किल होता है. ऊपर से परीक्षा पास करने का दबाव भी होता है. इस माहौल में कॉलेज प्रबंधन भी उन्हें शोध के लिए उत्साहित नहीं करता है. कुछ मेडिकल कॉलेज सरकारी मंजूरी की शर्त पूरी करने के लिए डॉक्टरों को कागजों पर अपने यहां शिक्षक के रूप में दिखा देते हैं.
बीते सालों में मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश में धांधली और भ्रष्टाचार के अनेक मामले आते रहे हैं. कई छात्रों के लिए मेडिकल सिर्फ एक करियर है और उनका लक्ष्य डिग्री लेकर पैसा कमाना होता है, न कि रिसर्च करना. सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की बदहाली ने निजी अस्पतालों और डॉक्टरों के लिए अकूत कमाई का रास्ता खोल दिया है. इन समस्याओं के समाधान के बिना कारगर स्वास्थ्य सेवा तंत्र स्थापित करने का सपना पूरा नहीं हो सकता है.
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