तब जाकर कहीं तेरी होगी ईद

Updated at : 07 Jun 2018 6:24 AM (IST)
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तब जाकर कहीं तेरी होगी ईद

शफक महजबीन टिप्पणीकार रमजान महीने में दस-दस दिन के तीन अशरे होते हैं- रहमत, मगफिरत और निजात. तीसरा अशरा निजात चल रहा है और कुछ ही दिन में ईद आनेवाली है. ईद का त्योहार मुसलमानों द्वारा पूरे महीने के रोजे पूरे कर लेने के बाद मनाया जाता है. ईद का अर्थ है- खुशी. एक महीना […]

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शफक महजबीन

टिप्पणीकार

रमजान महीने में दस-दस दिन के तीन अशरे होते हैं- रहमत, मगफिरत और निजात. तीसरा अशरा निजात चल रहा है और कुछ ही दिन में ईद आनेवाली है. ईद का त्योहार मुसलमानों द्वारा पूरे महीने के रोजे पूरे कर लेने के बाद मनाया जाता है.

ईद का अर्थ है- खुशी. एक महीना रोजे रखने और तमाम बुराईयों से खुद को बचाये रखने के लिए अल्लाह की तरफ से ईनाम है ईद का त्योहार. अल्लाह के बंदे भी रमजान का पाक महीना खैर-ओ-बरकत से गुजर जाने के लिए इस दिन अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं और दो रकात शुक्राने की नमाज पढ़ते हैं.

ईद हिंदुस्तानी संस्कृति का प्रतीक पर्व है. मुसलमानों के साथ जब इसमें गैर-मुस्लिम भी शामिल होते हैं, तो ईद की रौनक कई गुनी हो जाती है. इस तरह देखें, तो यह प्रेम, सद्भाव, सौहार्द और भाईचारे का त्योहार है.

ईद की नमाज के बाद लोग एक-दूसरे से गले मिलते हैं, सेवइयां खाते-खिलाते हैं और सबको बधाइयां देते हैं. किसी से दुश्मन भी हो, तो उसे गले लगाकर माफ करते हैं. कमर बदायूनी ने इसी दिन के लिए लिखा है- ईद का दिन है गले आज तो मिल ले जालिम. रस्म-ए-दुनिया भी है, मौका भी है, दस्तूर भी है…

दो ईद होती है- पहली ईद रमजान के बाद आती है, जिसमें फितरा यानी जरूरतमंदाें के लिए जकात िनकाला जाता है, इसलिए इसे ईद-उल-फितर कहते हैं. इसे मीठी ईद भी कहते हैं, जिसमें सेवइयों के साथ खूब मीठे पकवान बनाये जाते हैं. दूसरी ईद वह है, जो रमजान महीने के सत्तर दिन बाद आती है, जिसे ईद-उल-अजहा कहते हैं. इसे कुर्बानी की ईद भी कहते हैं.

ईद का चांद नजर आने से पहले ही जकात निकाल लेना चाहिए. जकात हर बालिग मर्द और औरत (जो देने के काबिल हों) पर फर्ज है. रोजा और नमाज की ही तरह जकात भी इस्लाम के पांच फर्ज में से एक है. सभी मुसलमानों को अपनी साल भर की कमाई में से ढाई प्रतिशत हिस्सा जकात के रूप में जरूरतमंदों को देने के लिए निकालना जरूरी है. जरूरतमंदों की मदद करके मुसलमान अल्लाह की सच्ची इबादत करता है.

जकात देने पर लोगों की मदद तो होती ही है, साथ ही देनेवाले को भी दिली-सुकून मिलता है कि वे अल्लाह के बताये रास्ते पर हैं. ऐसे जरूरतमंद लोग, जो आर्थिक तंगी की वजह से ईद की खुशी से महरूम होते हैं, उनकी मदद हो जाने से वे भी सबके साथ खुशियां मना सकते हैं. मशहूर शायर सैफी सरौंजी ने कहा है- अपनी खुशियां भूल जा सबका दर्द खरीद. सैफी तब जाकर कहीं तेरी होगी ईद…

ईद का त्योहार खुशी मनाने के साथ ही संकल्प लेने का भी दिन है. सभी गैर-मुस्लिम और गैर-धर्मों के साथ मुहब्बत का व्यवहार करने का संकल्प.

एक ऐसा संकल्प, जिसमें पूरी कोशिश होनी चाहिए कि हम पूरे साल ईमानदारी, आपसी प्रेम, भाईचारा और दीन की राह पर रहें, ताकि अगली ईद हम सबके लिए और भी ज्यादा खुशियां लेकर आये. जकात से जरूरतमंदों की इतनी मदद हो सके कि फिर उन्हें इसकी जरूरत ही न पड़े. ऐसा करने पर ही हमारी इबादतें कुबूल होंगी. ईद मुबारक!

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