करो या मरो’ से ‘करेंगे और करके रहेंगे’ तक

-प्रेम कुमार- ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की हीरक जयंती वर्ष है. प्रेरणा उत्सव की शुरुआत हो चुकी है. संसद भवन में राजनीतिक चिंतन से आगाज़ हुआ है. स्पीकर सुमित्रा महाजन ने ‘भारत छोड़ो’ से तुकबंदी करते हुए ‘भारत जोड़ो’ आंदोलन का ऐलान किया है. वहीं प्रधान सेवक ने ‘करो या मरो’ से तुकबंदी जोड़ते हुए ‘करेंगे […]
-प्रेम कुमार-
‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की हीरक जयंती वर्ष है. प्रेरणा उत्सव की शुरुआत हो चुकी है. संसद भवन में राजनीतिक चिंतन से आगाज़ हुआ है. स्पीकर सुमित्रा महाजन ने ‘भारत छोड़ो’ से तुकबंदी करते हुए ‘भारत जोड़ो’ आंदोलन का ऐलान किया है. वहीं प्रधान सेवक ने ‘करो या मरो’ से तुकबंदी जोड़ते हुए ‘करेंगे और करके रहेंगे’ का नारा दिया है. ‘नारा’ शब्द से परहेज करना यहां जरूरी है क्योंकि नारों से जनता जुड़ी रहती है. ‘संकल्प’ बोल लेते हैं. प्रधानसेवक ने भी इस संदर्भ में इस शब्द का इस्तेमाल किया है. उन्होंने ‘सिद्धि’ शब्द का भी इस्तेमाल किया है. 9 अगस्त 1942 को ‘संकल्प’ और 15 अगस्त 1947 को ‘सिद्धि’. इसी तर्ज पर ये 5 साल का खुद को कष्ट में रखने का कार्यक्रम प्रधानसेवक ने देश के सामने रखा है.
सिद्धि का लाभ उनको ज्यादा मिले, मौका ज्यादा मिले- ये जरूरी है. तब जिन लोगों ने ‘संकल्प’ और ‘सिद्धि’ का खेल खेला था, उन्होंने साजिश की थी. गांधीजी तो बहुत अच्छे थे. जेल चले गये. लेकिन, जो लोग बाहर स्वत: स्फूर्त तरीके से गांधीजी के अहिंसात्माक आंदोलन को हिंसा का रूप दे रहे थे, उन लोगों ने ऐसे बहुत सारे लोगों को इस सिद्धि से दूर कर दिया, जो राष्ट्रीय संपत्ति का नुकसान नहीं होने देना चाहते थे, सरकार के साथ थे, देशभक्त थे, बगावत नहीं करना चाहते थे और न घर-परिवार पर कोई सितम आने देना चाहते थे.
ऐसे लोगों की चिंता जेल जाने की स्थिति में अपने घर-परिवार का पेट चलाने की भी थी. उन लाचार और मजबूर देशभक्तों की पीढ़ियां आज भी अवसर की तलाश कर रही हैं कि किस तरह राष्ट्र की मुख्य धारा में अपने कर्त्तव्य का निर्वहन कर सकें. ऐसे लोगों को आगे आने दीजिए. अगले पांच साल तक वे आगे बढ़कर संकल्प लेते रहेंगे- ‘कष्ट करेंगे और करके रहेंगे.‘ ये संकल्प सवा सौ करोड़ लोगों को प्रेरणा देगी कष्ट करने की, कष्ट सहने की. जिन लोगों ने सन् 1942 में ‘करो या मरो’ का संकल्प नहीं लिया था, वे लोग इस नये संकल्प से खुद को शुद्ध कर लेंगे.
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