सावन आया बादल छाये

Updated at : 01 Aug 2017 5:56 AM (IST)
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सावन आया बादल छाये

मिथिलेश राय स्वतंत्र टिप्पणीकार कक्का ने कहा कि मेढकों की टर्रम-टर्र मेघ को बरसने के लिए संदेश भेज रहा है. उनका कहना था कि बारिश का यह मौसम पानी के साथ हमारा उत्सव मनाने के दिन हैं. देखो तो, मिट्टी को मथ कर पानी कीचड़ फैला रहा है कि किसी अन्न का आधार तैयार कर […]

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मिथिलेश राय

स्वतंत्र टिप्पणीकार

कक्का ने कहा कि मेढकों की टर्रम-टर्र मेघ को बरसने के लिए संदेश भेज रहा है. उनका कहना था कि बारिश का यह मौसम पानी के साथ हमारा उत्सव मनाने के दिन हैं. देखो तो, मिट्टी को मथ कर पानी कीचड़ फैला रहा है कि किसी अन्न का आधार तैयार कर रहा है!

सावन-भादो धान रोपने के मौसम होता है. लेकिन धान बिन पानी के कैसे रोपा जायेगा. सो मेढक मेघ से रिमझिम बरसने का प्रार्थना कर रहा है. अब सावन-भादो आ गया है और बारिश गिरने लगी है, तो गांव-घर का नजारा तेजी से बदलने लगा है. इस मौसम में जीवन कीचड़ में लथपथ हो जाता है, फिर भी चेहरे पर खुशी और होठों पर हंसी पसरी रहती है.

अभी कोई यह भी कह रहा था कि भारी परेशानी का सीजन आ गया है. कुछ ऐसी ही बातें मैंने धूप के बारे में भी सुन रखी थी. निश्चय ही वे यही लोग होंगे, जो पसीने के डर से धूप को कोसते होंगे. उन्हें इसका जरा भी भान नहीं होता होगा कि इसी धूप के कारण खेतों में दाल बन रही होगी और जूट को लंबाई मिल रही होगी.

जब माॅनसून के भरोसे धान की खेती होती थी और माॅनसून कमजोर निकलता था, हमारे पूर्वज इसे इंद्रदेव का कोप समझते थे. हमारे पूर्वज अशिक्षित थे. लगभग सारी चीजों को देवताओं की राजी-खुशी से जोड़ कर देखते थे. क्या करते. उनके पास सुविधाओं का टोटा हुआ करता था. गांव पहुंचने से पहले ही सारी सुविधाएं खत्म हो जाया करती थीं. तब दुआ में हाथ उठाने के सिवा उन्हें कुछ नहीं सूझता था.

जब सावन बीतने लगता था और बादल का कोई टुकड़ा कहीं नजर नहीं आता था, तब हाहाकार मच जाता था. उपजेगा नहीं तो लोग खायेंगे क्या. तब गांव की कुंआरी लड़कियां एक टोटका करती थीं. वे पूर्णिमा की किसी रात को सूखे खेतों में रंभा, मेनका आदि अप्सरा बन कर नाचती थीं, गाती थीं.

कहते हैं कि यह इंद्रदेव को रिझाने के लिए होता था. तब खूब झमाझम बारिश होने लगती थी. किसान पानी में भीगते हुए खेत जोतते थे और औरतें गाती हुई धान रोपती थीं. उनकी देह पर बारिश की बूंदें फूलों की तरह गिरती थीं और मन प्रफुल्लित होते जाता था.

वे दिन अभी पूरी तरह से गये नहीं हैं. आज भी खेती माॅनसून आधारित है. न तो सारे गांव में नहर की सुविधा है और न ही बिजली की व्यवस्था. डीजल के भरोसे धान की खेती करना इतना महंगा होता है कि छोटे किसानों के लिए मुसीबत खड़ी हो जाती है. आज भी बादलों की ओर हम देखते रहते हैं और बारिश के आसार नजर आते ही खेतों की और दौड़ पड़ते हैं.हां, यह सच है कि अधिकतर शहरों की नालियों की व्यवस्था इतनी दयनीय है कि थोड़ी सी बारिश होते ही स्थिति नारकीय हो जाती है.

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