vishesh aalekh

  • Feb 14 2020 6:46AM
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पारंपरिक नागपुरी गीतों को सहेजने में जुटे ‘भिनसरिया के राजा’ महावीर नायक

पारंपरिक नागपुरी गीतों को सहेजने में जुटे ‘भिनसरिया के राजा’ महावीर नायक
कोरनेलियुस मिंज
 
लगभग 30 वर्ष पहले जब आधुनिक नागपुरी गीत-संगीत की धमाकेदार एंट्री हुई, तब लग रहा था कि ठेठ नागपुरी उखड़ जायेगा. ठेठ नागपुरी गायकों में भी खलबली मच गयी थी. खासकर युवाओं में यह पहली पसंद गयी. उनमेेंं इसका जबरदस्त क्रेज था लेकिन इस विकट परिस्थितियों में भी ठेठ नागपुरी गायकों में उत्साह जरा भी कम नहीं हुआ है. 
 
ये ठेठ नागपुरी गीतों की महक को बिना विचलित हुए लोगों तक पहुंचाते रहे. इस बीच मुकुंद नायक को पद्मश्री मिलने और मधु मंसूरी 'हंसमुख' को पद्मश्री देने की घोषणा होने से ठेठ गायकों में एक नयी ऊर्जा का संचार हुआ है. तमाम चुनौतियों और परेशानियों के बावजूद धैर्यपूर्वक ठेठ गायकों ने पारंपरिक नागपुरी गीतों की महक को बिखरते रहे. आधुनिकता के समक्ष ये बरगद वृक्ष की तरह डटे रहे. ऐसे ही ठेठ नागपुरी गायकों में महावीर नायक शुमार हैं. 
 
वे वर्ष 1962 से ठेठ नागपुरी गीत गा रहे हैं. महावीर नायक मूलत: कांके क्षेत्र के पिठोरिया अंतर्गत उरुगुटू गांव के रहनेवाले हैं. हालांकि वर्तमान में वे हटिया नायकटोली में रह रहे हैं. उन्होंने नागपुरी गीत-संगीत में 48 वर्षों का लंबा सफर तय किया है. उनकी इस उपलब्धि के लिए आठ फरवरी 2020 को रांची में प्रफुल्ल सम्मान दिया गया.
 
महावीर नायक को उनकी अलग गायिकी के लिए जाना जाता है. नान्ह राग में उनके जैसे अन्य कोई नहीं गा सकता. वहीं सभी रागों में गाने में पारंगत हैं. अपनी गायकी से उन्होंने राज्य में सांस्कृतिक नवजागरण लाने का काम किया. उन्हें प्रगतिशील गायन शैली के लिए विशेष रूप जाना जाता है. इसी गायन शैली के कारण वे जनता के बीच छाये रहे. महावीर नायक ज्यादातर शिष्ट गीत गाते हैं. उच्च स्तर के शिष्ट गीत और लोक गीत गाने के लिए उनकी मांग होती रही है.
 
हालांकि पुराने नागपुरी गीतकार-कवियों की रचनाओं और गीतों से उन्हें प्रेरणा मिलती रही. महावीर नायक की नागपुरी गायिकी में मजबूत पकड़ है. उन्हें हर तरह के रागों की जानकारी है, मगर उन्हें यह सब बचपन में विरासत के रूप में उनके पिता खुदु नायक से मिली. उनके पिता अच्छे मरदाना झूमराहा कलाकार थे. उनके बिना झूमर नाच नहीं होता था. जब वे झूमर खेलने जाते थे तब वे महावीर नायक को भी ले जाते थे. फिर धीरे-धीरे महावीर के अंदर गायिकी रुचि जागृत होने लगी. धीरे-धीरे उन्हें राग-रागिनी की समझ आने लगी. 
 
पिता के साथ रहने के कारण महावीर नायक बचपन से ही रीझवार प्रवृत्ति हो गये. उन्होंने धूल, गोबर-गड्ढे में खेलते हुए गीत गुनगुनाते राग-रागिनियों को पकड़ना सीखा. बच्चों के साथ राजा-रानी का खेल खेलते हुए रात में सुने गीतों को सुनाते थे. गाय-बैल, बकरियां चराते समय भी गीत सुनाया करते थे. इस बीच वे स्कूल में हर शनिवार को ठेठ नागपुरी गीत सुनाने का अवसर मिला. जिससे उनकी आवाज निखरती गयी. 
उन्होंने इसके लिए अलग से शिक्षा नहीं ली है. जब वे अपने दोस्तों को गीत सुनाते थे, तब उनके दोस्त खूब तारीफ करते थे. गीत सुनाने के क्रम उनके मन में एक बड़ा गायक बनने इच्छा प्रबल होती गयी. वे सोचते- काश! इतना बड़ा गायक बनता कि सब वाह-वाह करते. उनका यह सपना सच हुआ और मंचीय कार्यक्रमों में उनकी गायकी की हर ओर तारीफ होने लगी. उन्होंने मंचीय कार्यक्रम में वर्ष 1976 से भाग लेना प्रारंभ किया. उनके बिना बहुत सा मंच नहीं सजता था. लोग दूर से ही पता लगाते थे कि महावीर नायक आ रहे हैं या नहीं.
 
उन्होंने 1000 से अधिक ठेठ नागपुरी गीतों के मंचों को साझा किया है. नागपुरी ठेठ गायकों में महावीर महावीर नायक पहचान 'भिनसरिया कर राजा' के रूप में है. लोग इसी नाम से उन्हें जानते हैं. हालांकि उन्हें सभी रागों की पकड़ है और गाने में अभ्यस्त हैं लेकिन मंचीय कार्यक्रमों में भोर होने के समय स्टेज की कमान दी जाती थी, जिसे वे भलीभांति संभालते और रंग जमा देते थे. इस कारण उन्हें 'भिनसरिया कर राजा' कहा गया. सिमडेगा क्षेत्र में आयोजित मंचीय कार्यक्रमों में सिमडेगावासियों ने महावीर नायक को यह उपाधि दी.
 
ठेठ नागपुरी गीत में महावीर नायक की पहचान हटिया आने के बाद हुई. 1963 में उन्होंने एचईसी में योगदान दिया. यहीं से उन्होंने शिष्ट नागपुरी गीतों की रचना प्रारंभ की और गायकी को एक नयी दिशा दी.
 
एचईसी में काम करते हुए वह 1992 में नागपुरी गीत-संगीत एवं नृत्य की प्रस्तुति के लिए ताइपे भी गये थे. जहां उन्होंने लगभग 20 देशों के कलाकारों एवं दर्शकों के समक्ष नागपुरी गीतों की शानदार प्रस्तुति दी थी. हटिया में नागपुरी कवि सम्मेलन और गीत स्टेज प्रोग्राम की शुरुआत करने का श्रेय महावीर नायक को जाता है. 
 
उन्होंने 1977 से नागपुरी गीतों का स्टेज लगाना प्रारंभ किया. इस स्टेज कार्यक्रम ने सांस्कृतिक आंदोलन में चिनगारी भरने का काम किया. इसके बाद पूरे राज्य में जगह-जगह नागपुरी गीतों के स्टेज कार्यक्रम होने लगे. इससे प्रभावित होकर बोड़ेया निवासी सत्यदेव नारायण तिवारी ने 'कला संगम' और पद्मश्री मुकुंद नायक ने 'कुंजवन' संस्था बनायी. फिर कई संस्थाओं और निर्माण हुआ. 
 
31 मार्च 2001 को सेवानिवृत्त होने के बाद महावीर नायक नागपुरी गीत संगीत को संरक्षित-सवंर्द्धित करने में पूरी तरह से समर्पित हो गये हैं. इस उम्र में भी वे गायक, कलाकारों को संगठित करने और भाषा, गीत को ऊंचाइयों तक पहुंचाने में प्रयासरत हैं. उन्होंने अब तक 300 शिष्ट नागपुरी गीतों की रचना की है. साथ ही पुराने कवियों और गीतकारों के 5000 गीतों को संकलित किया है, जिसे वे गाने के अभ्यस्त हैं. 
 
महावीर नायक छोटानागपुर सांस्कृतिक संघ से 1971 में जुड़े. उसमें दस बार सचिव रहे. इस दरम्यान 'डहर' पत्रिका निकालने में सहयोग करते थे. उन्होंने कई गायकों के गीतों ओर पुराने गीतकारों की रचनाओं को प्रकाशित कराया. 1993 में 'दर्पण' पत्रिका प्रकाशित की. इसमें दिवंगत कवियों के गीतों का संकलन है. इसमें 48 शिष्ट गीत शामिल हैं. वे आकाशवाणी रांची से वर्ष 1979-80 में जुड़े और दर्जनों गीत-कविताओं की प्रस्तुति दी.
 
महावीर नायक सभी नौ रसों में गाने में माहिर हैं. पावस, उदासी, फगुवा राग में उनका कोई सानी नहीं है. अब तक उन्हें 30 से अधिक सम्मान मिल चुके हैं, लेकिन प्रफुल्ल सम्मान मिलने से बेहद खुश हैं. उनका सपना है कि वे दिवंगत कवियों और गायकों को श्रद्धांजलि स्वरूप ऑडियो सीडी निकालें. साथ ही, मुफ्त में वर्तमान पीढ़ी को नागपुरी राग-रागिनी से अवगत कराना चाहते हैं. 
 
वह मानते हैं कि आधुनिक गीतों में प्रदूषण आ गया है. ठेठ की महक जब तक नहीं रहेगी, वह अपने को ज्यादा दिन तक कायम नहीं रख सकता है. ठेठ नागपुरी गीत शास्त्रीय का ही रूप है. इसमें पर्व-त्योहार, ऋतु, मौसम के हिसाब से गायन, वादन और नृत्य होता है. ठेठ में सामाजिकता, नैतिकता, सांस्कृतिक सुंदरता, साहित्यिक रूप, गौरव,गरिमा, भाव सब कुछ है. अखरा संस्कृति लुप्त हो रही है, जिससे ठेठ के अच्छे नये कलाकार सामने नहीं आ पा रहे हैं.
 
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