Columns

  • Jan 16 2020 12:41AM
Advertisement

असली चुनौती तेज क्रियान्वयन की

अजीत रानाडे 
सीनियर फेलो, तक्षशिला इंस्टीट्यूशन
editor@thebillionpress.org

पिछले साल के स्वतंत्रता दिवस भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र नोदी ने अगले पांच वर्षों के दौरान बुनियादी ढांचे में सौ लाख करोड़ रुपये का निवेश करने का इरादा जताया. वर्तमान कीमतों पर यह भारत के सांकेतिक (नॉमिनल) जीडीपी की लगभग आधी रकम है. इस तरह, इस महत्वाकांक्षा को साकार करने हेतु बुनियादी ढांचे पर प्रति वर्ष जीडीपी का दस प्रतिशत खर्च करना होगा. 
 
भारत में पिछले एक दशक से इस बड़े लक्ष्य को हासिल करने की कोशिशें जारी हैं, क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी इस पर लगभग इतनी ही रकम खर्च करने की बात कही थी. पिछले हफ्ते वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने राष्ट्रीय बुनियादी ढांचा पाइपलाइन (एनआइपी) रिपोर्ट जारी की, जिसमें भी 102 लाख करोड़ रुपये के निवेश से चलायी जानेवाली परियोजनाओं का विस्तृत ब्योरा है. 
 
मगर इसमें यह नहीं बताया गया है कि यह वित्तपोषण कैसे काम करेगा और यह वृहत अर्थव्यवस्था के बाकी हिस्से के साथ क्या करेगा. प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद् के पूर्व सदस्य रथिन राय ने लिखा है कि यह एनआइपी एक एकाकी अवधारणा है, जो किसी वृहत अर्थव्यवस्था अथवा राजकोषीय ढांचे में जुड़ी नहीं है.
 
हम जीडीपी के एक उल्लेखनीय हिस्से को बुनियादी ढांचे के लिए सुरक्षित करने की चर्चा कर रहे हैं, इसलिए एनआइपी अर्थव्यवस्था पर क्या असर डालेगी और खुद भी उससे कितना प्रभावित होगी, इस पर विचार जरूरी है.
 
 वित्तमंत्री ने बताया कि एनआइपी का 78 प्रतिशत वित्त सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा वहन किया जायेगा. रथिन राय इसे पहली तीन पंचवर्षीय योजना और उनके संचालन में अब खत्म कर दिये गये योजना आयोग की सत्ता का संदर्भ लेते हुए ‘नेहरूवादी महत्वाकांक्षा’ का नाम देते हैं. 
 
तब नेहरू के मुख्य विश्वासपात्रों में एक महालनोबिस होते थे, जो एक महान वैज्ञानिक व सांख्यिकीविद् होने के साथ ही योजना आयोग के सदस्य भी थे. वे द्वितीय पंचवर्षीय योजना के एक मुख्य सिरजनहार थे, जो देश के तीव्र औद्योगीकरण का लक्ष्य लेकर चली थी. 
 
यदि 10 प्रतिशत विकास के लक्ष्य को लेकर चला जाये, तो उसके लिए वर्तमान उपभोग दर में बड़ी कटौती करते हुए बहुत बड़ी बचत करने की भी जरूरत होगी. पर नेहरू के वक्त देश के सामने न केवल घरेलू बचत, बल्कि विदेशी बचत के भी सीमित होने का संकट था, क्योंकि तब विदेशी मुद्रा का घोर संकट रहा करता था. देश खाद्यान्नों के मामले में भी आत्मनिर्भर नहीं था. 
 
इस तरह, हमें अपने सीमित साधनों के अंतर्गत ही सबसे अधिक प्रभावोत्पादक कामयाबी हासिल करने की चुनौती से दो-चार होना था. इससे नेहरू अत्यंत असंतुष्ट थे, क्योंकि उन्हें सीमित होकर सोचने से नफरत थी. भारत क्यों नहीं ऊंची बचत, ऊंचे निवेश एवं ऊंचे खाद्यान्न उत्पादन का देश बन सकता है? मोटे तौर पर यही ‘नेहरूवादी महत्वाकांक्षा’ थी. 
 
बाकी अर्थव्यवस्था तथा यहां तक कि राजकोषीय स्थिति द्वारा पेश सीमाओं की अनदेखी करते हुए बुनियादी ढांचे में अगले पांच वर्षों तक प्रतिवर्ष 10 प्रतिशत निवेश करना नेहरू का वही तरीका है. आप उस पर अवास्तविक होने की तोहमत तो लगा सकते हैं, पर महत्वाकांक्षा के अभाव की नहीं. मेरी समझ से रथिन राय की टिप्पणी इस लक्ष्य की वास्तविकता से नहीं, वित्तपोषण के तौर-तरीके से संबद्ध थी. 
 
यह तथ्य कि सौ लाख करोड़ रुपये के खर्च के प्रत्येक पांच में चार हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र से आना है, हैरान नहीं करता. चाहे वह सड़कें हों या बिजली, आवासन, पेयजल या स्वास्थ्य एवं शिक्षा सरीखे सामाजिक बुनियादी ढांचा, उनमें सार्वजनिक भलाई का तत्व रहता है. दूसरे, परियोजनाओं के क्रियान्वयन में इतना वक्त लग जाता है, जिसके लिए राजी होना किसी निजी निवेशक के लिए कठिन है. इसलिए निजी क्षेत्र से यह उम्मीद करना कि वह इस भारी निवेश का वित्तपोषण करे, समस्यामूलक ही होगा.
 
यह सही है कि बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं में से एक ऐसे हिस्से को निजी क्षेत्र के लिए अलग किया जा सकता है, जिसमें निवेश कर वह लाभ भी कमा सके. मिसाल के लिए टेलिकॉम क्षेत्र के विकास का एक बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र के वित्तपोषण से ही साकार हो सका. 
 
मगर विनियमन में अचानक आये बदलावों एवं कीमतों की गलाकाट स्पर्धा ने इस पूरे क्षेत्र को भारी संकट में डाल दिया. निजी निवेश का लाभ यातायात शुल्क युक्त सड़कों की परियोजनाओं की ओर आकृष्ट किया जा सकता है, जहां निवेश की वापसी होती रहती है. लेकिन हाल ही बुनियादी ढांचे की कुछ कंपनियों तथा संबद्ध परियोजनाओं की स्थिति ने निजी निवेशकों को फिर आशंकित कर दिया है. 
 
जिन सोलर परियोजनाओं से उत्पादित बिजली की खरीद के लिए लंबे अरसे के समझौते किये गये, उनकी ओर निजी निवेशक तेजी से आकृष्ट हुए, पर आंध्र प्रदेश की घटनाओं की वजह से जहां लंबी अवधि के निजी-सार्वजनिक निवेश समझौतों के साथ वादाखिलाफी की संभावनाएं सामने आ रही हैं, एक बार पुनः असीम चिंताएं व्याप्त हैं. इन्हीं सब कारणों से निजी निवेशकों द्वारा छोटी अवधि के निवेश ही पसंद किये जा रहे हैं और लंबी अवधि के अनुबंधों को लेकर व्याप्त अनिश्चितता ने उनकी भूमिकाएं सीमित कर दी हैं.
 
 इनके बावजूद, पूर्व सरकारों ने विश्व बैंक के समर्थन के बल पर निजी-सार्वजनिक साझीदारी को लागू करने की कोशिशें कीं, पर उसकी सफलता दर सीमित रही. विवादों तथा विलंबों के चलते निजी क्षेत्र को इनमें बुरे अनुभव हुए. इसी वजह से उन्हें बैंकों द्वारा इस हेतु प्रदत्त बहुत-से ऋण बुरे ऋणों में तब्दील हो गये, जिसकी कीमत बैंकों को चुकानी पड़ी.
 
सच्ची नेहरूवादी भावना के ही मुताबिक, हमें न तो एनआइपी की विशाल महत्वाकांक्षा से, न ही सार्वजनिक क्षेत्र से उसके अधिकतर वित्तपोषण से मुंह चुराना चाहिए. इस तरह सृजित बुनियादी परिसंपत्तियां कई पीढ़ियों तक टिकेंगी. 
 
आज के बुनियादी ढांचे के लिए उधार लेने या राजकोषीय घाटे का स्तर बढ़ाने का अर्थ उसका भार भविष्य के अजन्मे कर दाताओं पर डालना होगा, जो उसके भावी उपयोगकर्ता होंगे. इस तरह भारत का कर जाल आच्छादन बढ़ेगा, जो राजकोषीय रूप से एक हासिल कर लेने योग्य लक्ष्य ही होगा. यहां मुख्य चुनौती वित्तपोषण की नहीं, बल्कि तेज क्रियान्वयन की है, जिसमें भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय मंजूरी और ऊंची गुणवत्ता के डिजाइन जैसे तत्व शामिल हैं.
 
Advertisement

Comments

Advertisement
Advertisement