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  • May 15 2019 6:53AM
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भारत-फ्रांस सैन्याभ्यास और चीन

डॉ सतीश कुमार

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार

singhsatis@gmail.com

आम चुनाव की सरगर्मी अपने अंतिम पड़ाव पर है. इस चुनाव के परिणाम के बाद नयी सरकार का गठन होगा. अगर पिछले दो महीने का जायजा लिया जाये, तो सबसे ज्यादा चर्चित शब्द इस लोकसभा चुनाव में फ्रांस का राफेल युद्धपोत, चीन और पाकिस्तान रहे हैं. तीनों का संबंध भारत की सुरक्षा व्यवस्था से है. 

इन तमाम विवादों को नजरअंदाज करते हुए भारत ने फ्रांस के साथ मिलकर अरब सागर पर अभी तक का सबसे बड़ा नौसैनिक अभ्यास किया है. अभ्यास के दौरान चीन का बिना नाम लिये एक सशक्त मैसेज भी दिया गया है. यह समझना जरूरी है कि सामरिक नजरिये से भारत-फ्रांस सयुक्त अभ्यास का मतलब क्या है?  

भारत और फ्रांस की नौसेना ने विमानवाहक पोत ‘चार्ल्स डे गॉले’ के साथ हिंद महासागर में बीते शुक्रवार सबसे बड़ा युद्धाभ्यास किया. रणनीतिक रूप से अहम हिंद महासागर के समुद्री मार्गों पर दुनिया की निगाहें टिकी हैं. 

चीन के बढ़ते आर्थिक प्रभाव और दक्षिण चीन सागर में दबदबे से भारत और फ्रांस चिंतित हैं. ऐसे में इतने व्यापक युद्धाभ्यास को चीन को संदेश के तौर पर देखा जा रहा है. फ्रांसीसी पोत की कमान संभाल रहे रियर एडमिरल ओलिवर लेबास ने कहा, ‘यह युद्धाभ्यास 2001 में शुरू हुए अभियान का अब तक का सबसे बड़ा अभ्यास है.

हम इस क्षेत्र में स्थिरता ला सकते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए काफी मायने रखता है. एशिया, यूरोप और खाड़ी देशों के बीच ज्यादातर व्यापार समुद्र के जरिये ही होता है. हिंद महासागर में भारत का पारंपरिक दबदबा चीन के बढ़ते प्रभाव का सामना कर रहा है. चीन ने समुद्री मार्गों के करीब युद्धपोतों और पनडुब्बियों की तैनाती की है. 

फ्रांसीसी नौसेना के हेड रियर एडमिरल दिदिर मालटरे ने कहा कि हिंद महासागर में चीन आक्रामक नहीं है, लेकिन दक्षिण चीन सागर में स्थिति अलग है.

दरअसल फ्रेंच अधिकारी का इशारा दक्षिण चीन सागर में चीन के दावों को लेकर पड़ोसी देशों के साथ उपजे विवाद पर था. चीन द्वारा नये सिल्क रोड व्यापार गलियारे का निर्माण, जिसमें हिंद महासागर भी शामिल है, एक रणनीति है जो मुख्य तौर पर आर्थिक से ज्यादा किसी और उद्देश्य को लेकर है. अगले 10 से 15 साल में ऐसे हालात बन सकते हैं, जिससे तनाव पैदा हो सकता है. 

पिछले महीने फ्रांस ने ताइवान जलडमरूमध्य में अपना एक युद्धपोत भेजकर चीन को नाराज कर दिया था. चीन की नेवी ने शिप को इंटरसेप्ट किया और पेइचिंग ने इस पर एक आधिकारिक विरोध भी जताया था, जबकि फ्रांस ने कहा कि वह अपने नौवहन की स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर रहा था और उसका हिंद महासागर में अभ्यास से कोई कनेक्शन नहीं है. 

फ्रांस शीत युद्ध के बाद भारत का सबसे मुखर सैनिक सहयोगी देश रहा है. यहां तक कि 1980 के दशक में जब भारत का सैनिक व्यापार केवल रूस के साथ था, तब भी फ्रांस दूसरा सबसे बड़ा देश था, जो भारत को सैनिक सहायता प्रदान करता था. भारत के आण्विक प्रयोग के बाद जब दुनिया कि नजरें भारत के विरुद्ध हो गयी थीं, तब फ्रांस ने ही मुख्य भूमिका निभायी और अमेरिका को मनाने में सफल हुआ कि भारत का शक्ति संवर्धन पश्चिमी दुनिया के लिए भी जरूरी है. उसके बाद भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा बदल गयी. 

पुनः 2001 के बाद भारत ने दीर्घकालीन नौसैनिक सयुंक्त व्यवस्था शुरू की. यह नवीनतम अभ्यास उसी का हिस्सा है. चीन दुनिया के नौसैनिक नियमों को नहीं मानता. वहीं फ्रांस इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के महत्वपूर्ण देशों में से है. वर्षों तक वियतनाम और साउथ चीन सी में फ्रांस की हुकूमत चलती थी. शुरू से ही फ्रांस नौसैनिक मानकों पर कई देशों से आगे था. 

भारत और फ्रांस के बीच बन रहे समीकरण का तत्कालीन कारण तो चीन है, लेकिन यह महज चीन तक सीमित नहीं है. नयी विश्व व्यवस्था में भारत और फ्रांस एक मिडिल किंगडम की भूमिका में हैं. फ्रांस यूरोप के लिए मिडिल पावर है, तो भारत एशिया के लिए. दोनों के आपसी मिलन से यह वैश्विक शक्ति के रूप में बदल जाता है. 

चीन की पर्ल ऑफ स्ट्रिंग नीति की सोच भारत विरोध पर टिकी हुई है. वर्तमान चीन के राष्ट्रपति की सबसे महत्वपूर्ण योजना वन बेल्ट रोड ही है. 

सिल्क रूट को पुनः जीवित करने की योजना भी चीन की बेहद खतरनाक और भारत विरोधी है. चीन कहता है कि यह केवल दुनिया को आर्थिक रूप से जोड़ने की योजना है, लेकिन अगर पांच वर्षों के ड्रैगन की चाल को नापा जाये, तो बातें स्पष्ट हो जाती हैं. भारत के इर्द-गिर्द चीन का जाल पूरी तरह से फैलता गया है. 

डोकलाम विवाद के बाद चीन ने पाकिस्तान की भारत विरोधी ताकतों को मदद देने की गति को और तेज कर दी. लेकिन, पिछले कुछ दिनों में जो कुछ भी हुआ, उससे चीन के दांत कुछ खट्टे जरूर हुए होंगे. 

आतंकवाद के मसले पर मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी की सूची में शामिल होना एक तरह से चीन की कूटनीतिक हार ही है. और ठीक उसके बाद ही फ्रांस के साथ भारत का यह नौसैनिक अभ्यास, जिसमें आण्विक पनडुब्बी की शक्ति का परीक्षण किया गया है, भारत की मजबूती दर्शाता है. 

यह सब कुछ भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. यह सब भारतीय प्रधानमंत्री की ठोस कूटनीति की वजह से ही संभव हो पाया है. यह अलग बात है कि कुछ घटनाएं चुनाव के दौरान ही हुई हैं, जिससे देश संभलकर चलने की काेशिश कर रहा है.

 

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