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Hindi Diwas 2020: जब यूएन में पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी ने दिया था हिंदी में भाषण, तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर गूंज उठी थी भारत की राजभाषा

By Prabhat khabar Digital
Updated Date

पटना. हर वर्ष की तरह इस साल भी 14 सितंबर को देशभर में हिंदी दिवस (hindi diwas) मनाया जाना है. कई देशों में बोली जाने वाली यह भाषा सबसे प्राचीन भाषाओं में से एक है. जिसे भारत की 'राष्ट्रभाषा' (National language) के तौर पर भी जाना जाता है. पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी सबसे पहले यूएन में हिंदी में भाषण देकर एक अलग ही पहचान दिलाया था. अटल बिहार वाजपेयी को दुनिया एक बेहतरीन राजनेता के तौर पर जानती है.

जिन्होंने भारत में अपने राजनीतिक कार्यकाल के दौरान कई अहम फैसले लिए और विश्व पटल पर भारत की एक अलग पहचान बनाई. अटल बिहारी वाजपेयी ने बतौर पीएम देश का काफी मान बढ़ाया था. पीएम बनने से पहले अटल बिहारी वाजपेयी संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा की बैठक में हिंदी में भाषण दिया था. इस भाषण ने विश्वपटल पर हिंदी को एक अलग स्थान दिलाया. अटल जी ने कई ऐसे ऐतिहासिक भाषण दिए जिन्हें भारतीय राजनीति में आज भी एक मिसाल के तौर पर पेश किया जाता है

अटल बिहारी बाजपेयी का हिंदी भाषा से काफी लगाव था. इस लगाव और भारतीय होने की पहचान के चलते उन्होंने 1977 में बतौर जनता सरकार के विदेश मंत्री संयुक्त राष्ट्रसंघ में अपना पहला भाषण हिंदी में देकर सबके हृदय पर प्रभाव छोड़ा था. अटल बिहारी वाजपेयी का हिंदी में दिया भाषण उस वक्त काफी लोकप्रिया हुआ था. भारत के लिए यह बेहद गौरवशाली क्षण था. यह पहला मौका था जब यूएन जैसे अतंराष्ट्रीय मंच पर भारत और हिंदी भाषा का मान बढ़ा था. हिंदी में दिए गए इस भाषण से यूएन में आए प्रतिनिधि बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने खड़े होकर भारतीय विदेश मनत्रियों के लिए तालियां बजाई.

यह है अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण

"मैं भारत की जनता की ओर से राष्ट्रसंघ के लिए शुभकामनाओं का संदेश लाया हूं. महासभा के इस 32 वें अधिवेशन के अवसर पर मैं राष्ट्रसंघ में भारत की दृढ़ आस्था को पुन: व्यक्त करना चाहता हूं. जनता सरकार को शासन की बागडोर संभाले केवल 6 मास हुए हैं फिर भी इतने अल्प समय में हमारी उपलब्धियां उल्लेखनीय हैं. भारत में मूलभूत मानव अधिकार पुन: प्रतिष्ठित हो गए हैं जिस भय और आतंक के वातावरण ने हमारे लोगों को घेर लिया था वह अब दूर हो गया है ऐसे संवैधानिक कदम उठाए जा रहे हैं जिनसे ये सुनिश्चित हो जाए कि लोकतंत्र और बुनियादी आजादी का अब फिर कभी हनन नहीं होगा."

अध्यक्ष महोदय वसुधैव कुटुंबकम की परिकल्पना बहुत पुरानी है भारत में सदा से हमारा इस धारणा में विश्वास रहा है कि सारा संसार एक परिवार है अनेकानेक प्रयत्नों और कष्टों के बाद संयुक्त राष्ट्र के रूप में इस स्वप्न के साकार होने की संभावना है यहां मैं राष्ट्रों की सत्ता और महत्ता के बारे में नहीं सोच रहा हूं. आम आदमी की प्रतिष्ठा और प्रगति के लिए कहीं अधिक महत्व रखती है अंतत: हमारी सफलताएं और असफलताएं केवल एक ही मापदंड से नापी जानी चाहिए कि क्या हम पूरे मानव समाज वस्तुत: हर नर-नारी और बालक के लिए न्याय और गरिमा की आश्वसति देने में प्रयत्नशील हैं.

"अफ्रीका में चुनौती स्पष्ट हैं प्रश्न ये है कि किसी जनता को स्वतंत्रता और सम्मान के साथ रहने का अनपरणीय अधिकार है या रंग भेद में विश्वास रखने वाला अल्पमत किसी विशाल बहुमत पर हमेशा अन्याय और दमन करता रहेगा. नि:संदेह रंगभेद के सभी रुपों का जड़ से उन्मूलन होना चाहिए हाल में इजरायल ने वेस्ट बैंक को गाजा में नई बस्तियां बसा कर अधिकृत क्षेत्रों में जनसंख्या परिवर्तन करने का जो प्रयत्न किया है संयुक्त राष्ट्र को उसे पूरी तरह अस्वीकार और रद्द कर देना चाहिए. यदि इन समस्याओं का संतोषजनक और शीघ्र ही समाधान नहीं होता तो इसके दुष्परिणाम इस क्षेत्र के बाहर भी फैल सकते हैं यह अति आवश्यक है कि जेनेवा सम्मेलन का पुन: आयोजन किया जाए और उसमें पीएलओ का प्रतिनिधित्व किया जाए."

"अध्यक्ष महोदय भारत सब देशों से मित्रता चाहता है और किसी पर प्रभुत्व स्थापित करना नहीं चाहता. भारत न तो आण्विक शस्त्र शक्ति है और न बनना ही चाहता है. नई सरकार ने अपने असंदिग्ध शब्दों में इस बात की पुनघोर्षणा की है हमारी कार्यसूची का एक सर्वस्पर्थी विषय जो आगामी अनेक वर्षों और दशकों में बना रहेगा वह है मानव का भविष्य. मैं भारत की ओर से इस महासभा को आश्वासन देना चाहता हूं कि हम एक विश्व के आदर्शों की प्राप्ति और मानव कल्याण तथा उसके गौरव के लिए त्याग और बलिदान की बेला में कभी पीछे नहीं रहेंगे."

News Posted by: Radheshyam Kushwaha

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