Gandhi Jayanti 2021: जब बापू के सवाल पर रोने लगी थीं कस्तूरबा, जानिए ये दिलचस्प वाक्या
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 02 Oct 2021 1:28 PM
कस्तूरबा गांधी ने छोटे से टिन के डब्बे में बाखरी देवदास को देने के लिए मुझे दिया. मैं जाने लगा, तो गांधी जी ने पूछा-तुम्हें रास्ते में खाने के लिए बा ने कुछ दिया? मैंने कहा- नहीं. उन्होंने बा से पूछा. बा बोलीं- भूल गयी. गांधी बोले- यदि देवदास जा रहा होता तो? बा की आंखों से झर-झर आंसू गिर रहे थे.
Gandhi Jayanti 2021: आज महात्मा गांधी की जयंती है. बापू को लेकर कई जानकारी आपको होगी. इसी कड़ी में आज हम आपको महात्मा गांधी बद्री अहीर औैर रामनंदन मिश्र जैसे आम लोगों के प्रति कैसा अनुराग था बता रहे हैं.
बद्री अहीर के प्रति महात्मा गांधी का ऐसा अनुराग था कि उन्होंने उनके लिए अपने हाथों से एक जैकेट (बंडी) तैयार किया था. उसे उन्होंने बद्री को देने के लिए बहुत सहेज कर अपने पास रखा था. 25 सितंबर, 1913 को उन्होंने अपने पुत्र छगनलाल को एक पत्र भेजा. इसमें इस बात का जिक्र किया. इस पत्र के अंत में गांधी ने लिखा था, ‘एक बंडी मैंने तैयार की है. इसे तुम पोलक को दे देना. यह बद्री के लिए है.’ पोलक महात्मा गांधी के सहायक थे.
ब द्री अहीर शाहाबाद (आरा) के हेतमपुर गांव के रहने वाले थे. जुलाई 1882 में बद्री गिरमिटिया मजदूर के रूप में नेटाल (दक्षिण अफ्रीका) पहुंच गये. वे 1882 में ‘मर्चेन्टमैन’ नामक जहाज से कलकत्ता से नेटाल के लिए रवाना हुए थे. बद्री के पिताजी का नाम शिव नारायण था. 1882 में बद्री की उम्र 22 साल थी. नेटाल क्वाजुलु-नेटाल आर्काइव्स में बद्री के कलकत्ता से जाने संबंधी पूरा ब्योरा उपलब्ध है. उनकी पत्नी का नाम फुलमनिया था. दक्षिण अफ्रीका में जब महात्मा गांधी ने आंदोलन शुरू किया, तो बद्री उनके साथ आये.
गांधी बद्री के एटॉर्नी (वकील) थे. बद्री का महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका पहुंचने के साथ ही संपर्क हो गया. गांधी ने लिखा, ‘यह मुवक्किल विशाल हृदय का विश्वासी था. वह पहले गिरमिट में आया था. उसका नाम बद्री था. उसने सत्याग्रह में बड़ा हिस्सा लिया था. वह जेल भी भुगत आया था.’ दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह आंदोलन में 1913 में गिरफ्तार किये जाने वाले नेटाल के रहने वाले सबसे पुराने गिरमिटिया बद्री थे. उन्हें 25 सितम्बर, 1913 को तीन महीने की कारावास हुई थी. गिरफ्तारी के समय बद्री गांधी के साथ थे.
महात्मा गांधी को जोहांसबर्ग में निरामिषाहारी भोजनालय के लिए पैसे की जरूरत पड़ी. उस समय उनके पास मुवक्किलों के पैसे जमा थे. एक दिन उन्होंने बद्री को यह बात बतायी.बद्री ने कहा- भाई आपका दिल चाहे तो पैसा दे दो. मैं कुछ न जानूं. मैं तो आपको ही जानता हूं. बद्री के पैसे में से गांधी ने हजार पौंड दे दिये.
बिहार के बड़े समाजवादी रामनंदन मिश्र के साथ हुआ एक वाकया गांधी जी के बारे में बेहद दिलचस्प है. मिश्र जी लंबे समय तक गांधी के साथ थे. ‘गांधी और मैं’ पुस्तिका में रामनंदन मिश्र लिखते हैं , एक बार मुझे गांधी जी ने दिल्ली भेजा. उनके पुत्र देवदास जी वहीं रहते थे. कस्तूरबा को खबर मिल गयी. उन्होंने छोटे से टिन के डब्बे में बाखरी देवदास को देने के लिए मुझे दिया. मैं जाने लगा, तो गांधी जी ने पूछा-तुम्हें रास्ते में खाने के लिए बा ने कुछ दिया? मैंने कहा- नहीं. उन्होंने बा से पूछा. बा बोलीं- भूल गयी. गांधी बोले- यदि देवदास जा रहा होता तो? बा की आंखों से झर-झर आंसू गिर रहे थे. (इनपुट : श्रीकांत)
Posted by: Pritish Sahay
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