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टाटा स्टील : 900 साल पहले विलुप्त हो चुकी 'इन सीतू रॉक कार्विंग' आर्ट को पुनर्जीवित कर रहे चित्तो डे

Updated at : 06 Feb 2023 12:31 PM (IST)
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टाटा स्टील : 900 साल पहले विलुप्त हो चुकी 'इन सीतू रॉक कार्विंग' आर्ट को पुनर्जीवित कर रहे चित्तो डे

इन सीतू कार्विंग आर्ट को जीवित करने में लगे चित्तो डे का दावा है कि यह आर्ट पूरी दुनिया में विलुप्त हो चुकी है. 900 वर्ष पूर्व तक इस कलाकृति के प्रमाण मिलते हैं, लेकिन उसके बाद इसे करने वाले लोग कम होते गये और यह कला विलुप्त हो गयी. चित्तो डे ने बताया कि वे मूल रूप से कोलकाता के रहने वाले हैं.

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जमशेदपुर, विकास श्रीवास्तव. 900 वर्ष पूर्व विलुप्त हो चुकी इन सीतू रॉक कार्विंग आर्ट टेल्को के चट्टानों पर जीवित होती दिख रही है. इस कला के माध्यम से जंगल व झाड़ियों में विलुप्त पड़े हजारों वर्ष पुराने चट्टानों को एक नयी पहचान मिलेगी. चट्टानों के ऊपर उसी अवस्था में उसके ऊपर कलाकृति उभारने का यह नायाब काम टेल्को सी वन तालाब के बगल के पार्क के चट्टान पर किया जा रहा है. इस कला को उकेरने में पश्चिम बंगाल पुरुलिया के कलाकार चित्तो डे अपने 10 विद्यार्थियों के साथ पिछले दो माह से लगे हैं. चट्टानों को काटकर उसे तराशने का काम वे तेजी से कर रहे हैं. चित्तो डे ने बताया कि चट्टानों पर बन रही यह कलाकृति जंगल व जंतुओं के जीवन चक्र (भोजन चक्र) पर आधारित है. चट्टानों व पत्थरों को देखकर दिमाग में कलाकृति उकेर लेने वाले चित्तो डे ने बताया कि जिस 22 फीट ऊंचे और 60 फीट चौड़े चट्टान पर वे यह काम कर रहे हैं. वह 25 से 30 हजार वर्ष पुराना है. उन्होंने दावा नहीं किया, लेकिन यह जरूर कहा कि चट्टान उससे भी पुरानी हो सकती है. यह काम टाटा स्टील करवा रही है.

दुनिया में बंद हो चुकी थी इन सीतू कार्विंग आर्ट

इन सीतू कार्विंग आर्ट को जीवित करने में लगे चित्तो डे का दावा है कि यह आर्ट पूरी दुनिया में विलुप्त हो चुकी है. 900 वर्ष पूर्व तक इस कलाकृति के प्रमाण मिलते हैं, लेकिन उसके बाद इसे करने वाले लोग कम होते गये और यह कला विलुप्त हो गयी. कॉलेज ऑफ आर्ट एंड क्राफ्ट कोलकाता से 1984 में डिग्री की पढ़ाई किये 64 वर्षीय चित्तो डे का दावा है कि 1994 में उन्होंने फिर से इस कला को जीवित करने का काम शुरू किया है.

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पुरुलिया से शुरू किया काम

चित्तो डे ने बताया कि वे मूल रूप से कोलकाता के रहने वाले हैं, लेकिन 30 वर्ष पहले वह पुरुलिया जिले में आकर बस गये थे. उन्होंने बताया कि कला से पढ़ाई करने के बाद केवल पेंटिंग करना उनकी इच्छा नहीं थी, उन्हें कुछ अलग करना था, जिसके बाद उन्होंने इन सीतू कार्विंग पर काम करना शुरू किया. पुरुलिया में काफी ज्यादा क्षेत्र में चट्टानों को उन्होंने देखा था, उसके बाद उन्होंने वहां अपना बसेरा बना लिया था. आज पुरुलिया व उसके आसपास के चट्टानों में उनके द्वारा बनायी गयी कलाकृति देखने को मिल सकती है.

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पत्थरों व चट्टानों को संरक्षित करने की पहल

चित्तो डे ने बताया कि यह ऐसी कला है जिसमें चट्टानों को तोड़ कर दूसरे स्थान पर लाने की जरूरत नहीं होती है, बल्कि वह जहां है वहीं उसी अवस्था में उसमें कलाकृति बनाने काम होता है. उन्होंने कहा कि इस पहल से पत्थर खनन जैसे अपराध पर रोक लगाया जा सकता है. चट्टानों को संरक्षित करने से भी इस आर्ट को जोड़ कर देखा जाता है. चित्तो डे ने बताया कि झारखंड में इस कला के प्रसार, शिक्षा व रोजगार की अपार संभावनाएं हैं.

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