BIHAR : राज्य के बस अड्डों पर सुविधाओं का टोटा
Author Prabhat khabar digital desk
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मीठापुर बस स्टैंड में सुविधा के नाम पर कुछ नहीं, कीचड़ में ही लगी रहती हैं बसें कीचड़ से भरे रास्ते, भीषण जलजमाव, लगातार मच रही चिल्लपौं, पूरे बस अड्डे में यात्रियों के बैठने के लिए कहीं जगह नहीं, पेयजल का टर्मिनल ऐसा कि वहां आपको थूकने में भी संकोच हो, शौचालय ढूंढ़ते रह जायें, […]
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मीठापुर बस स्टैंड में सुविधा के नाम पर कुछ नहीं, कीचड़ में ही लगी रहती हैं बसें
कीचड़ से भरे रास्ते, भीषण जलजमाव, लगातार मच रही चिल्लपौं, पूरे बस अड्डे में यात्रियों के बैठने के लिए कहीं जगह नहीं, पेयजल का टर्मिनल ऐसा कि वहां आपको थूकने में भी संकोच हो, शौचालय ढूंढ़ते रह जायें, किस जगह जाने वाली कौन सी बस कहां मिलेगी यह सिर्फ बस वाले ही बता सकते हैं, उद्घोषणा की कोई व्यवस्था नहीं, एक भी सुरक्षाकर्मी नहीं, न एटीएम, न टेलीफोन बूथ और न ही मे आइ हेल्प यू के काउंटर.
यह तसवीर है बिहार की राजधानी पटना के सबसे बड़े बस टर्मिनल मीठापुर बस अड्डे की. 2004 में बने इस बस अड्डे से सालाना सवा करोड़ से अधिक की कमाई करने के बावजूद नगर निगम ने यहां के रखरखाव पर आज तक एक पैसा खर्च नहीं किया है. कहने को यहां 38 दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी कार्यरत हैं, मगर वे चुंगी वसूलने के अलावा कोई काम नहीं करते. उस दौर में जब दूसरे राज्यों में हवाई अड्डों की तरह चमचमाते बस अड्डे बन रहे हैं, क्या हमारी राजधानी के इस बस टर्मिनल की ऐसी ही तसवीर होनी चाहिए.
सालाना 1.32 करोड़ की आय के बावजूद रखरखाव पर एक पैसे का खर्च नहीं : वे बताते हैं कि उनके अलावा 37 और कर्मचारी इसी दैनिक वेतन पर यहां कार्यरत हैं. इनमें टोल कलेक्टर, गेट मैन, अनुसेवी और कुल मिलाकर तीन सफाई कर्मी हैं. इन तीन सफाई कर्मी के जिम्मे पूरे बस स्टैंड की साफ-सफाई का काम है. इनमें एक महिला है और एक बुजुर्ग. यहां से बसों से 45, 60, 75 रुपये की तीन अलग-अलग दरों से अलग-अलग बसों से टोल वसूला जाता है, एक दिन की दर से.
हालांकि यहां से खुलने वाली अधिकतर बसें रोजाना औसतन पांच हजार रुपये जरूरी कमाती होंगी. इसके बावजूद यहां से हर साल औसतन 1.32 करोड़ रुपये के टोल की वसूली होती है, जिनमें से नगर निगम बमुश्किल 32 लाख रुपये ही खर्च करता है, वह भी इन 38 कर्मियों के वेतन पर. इसके अलावा 2004 से लेकर आज तक यहां एक पाई खर्च नहीं हुई है.
उमेश चंद्र शर्मा बताते हैं कि पिछले माह नगर निगम के आयुक्त अभिषेक सिंह ने आकर उनसे यहां की समस्याओं के बारे में बातचीत की और ठोस समाधान का आश्वासन दिया था. मगर कहीं-कहीं मिट्टी भराने के अलावा कोई काम नहीं हुआ.
पटना नगर निगम के आयुक्त नहीं दे रहे जवाब : पटना के नगर निगम के आयुक्त अभिषेक सिंह से कई दफा इस बारे में पूछने पर भी उन्होंने व्यस्तता का हवाला देकर इस सवाल को टाल दिया . इस संबंध में उन्हें एक व्हाट्सएप मैसेज देकर भी सवाल पूछे गये, मगर उन्होंने अपने कनीय अधिकारी से बात करने का हवाला दिया. कनीय अधिकारी ने भी बात करने से यह कह कर इनकार कर दिया कि वे अभी बीमार हैं, कब बात करने की स्थिति में होंगे कह नहीं सकते.
बारहों महीने यहां रहता है कीचड़ यात्री हो जाते हैं असहज
एक तो इन दिनों बस अड्डे के पास बन रहे फ्लाइ ओवर की वजह से मीठापुर बस अड्डे के रास्ते में भीषण जाम लग रहा है, इस पर से अगर पहुंच भी गये तो वहां की हालात देख कम मन भन्ना उठता है. दुखद है कि यह स्थिति कई सालों से इस बस अड्डे की है. गेट नंबर एक से लेकर तीन तक किसी गेट से अंदर जायें, कीचड़ और जलजमाव से मुठभेड़ तय है. यह स्थिति सिर्फ बरसात में नहीं बल्कि बारहों महीने रहती है. अंदर जाने के बाद आप सिर्फ बस पर बैठ सकते हैं और भीषण चिल्लपौं के बीच बस के जल्द खुलने की मन्नतें मांगते हैं.
यात्रियों के बैठने के लिए जगह नहीं कर्मचारी घर से लाते हैं अपनी कुर्सी
गेट नंबर एक के अंदर में एक यात्री पड़ाव है, जो 2004 में ही बना था, मगर वहां आप बैठ नहीं पायेंगे. जर्जर भवन कुछ दुकानों और बसों पर लादे जाने वाले सामान से अटा पड़ा है. उस पूरी बिल्डिंग में आपको एक भी कुर्सी नहीं मिलेगी, जहां यात्री कुछ देर बैठ कर सुस्ता सके. यहां नगर निगम के कार्यालय में भी एक भी सरकारी कुरसी नहीं है, वहां के स्टाफ ने अपने बैठने के लिए प्लास्टिक की कुछ कुरसियों का इंतजाम कर रखा है. केयर टेकर उमेश चंद्र शर्मा के जिम्मे प्रबंधन की जिम्मेदारी है. निगम इस महती भूमिका के बदले 250 रुपये प्रति दिन के हिसाब से उन्हें मेहनताना देता है.
दिल्ली के आईएसबीटी टर्मिनल में उपलब्ध सुविधाएं
एक तरह मीठापुर बस अड्डे की हालत ऐसी है, वहीं दिल्ली के अंतरराज्यीय बस टर्मिनल की सुविधाओं पर एक नजर डालें. यह जानकारी उनकी वेबसाइट से ली गयी है.
ठंडा और सामान्य पेयजल
पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग शौचालय
चौबीसो घंटे प्राथमिक उपचार की सुविधा
पुलिस चौकी
बैंक और पोस्ट ऑफिस
यात्रियों के बैठने की जगह
हर प्लेटफार्म पर रोशनी और पंखे, ऑटोमेटिक जेनरेटर सुविधा के साथ
यात्रियों का सामान रखने के लिए क्लॉक रूम
पोर्टर, एसटीडी बूथ
पार्किंग और टैक्सी स्टैंड
टिकट वितरण के लिए केबिन
ट्रांसपोर्टरों के ऑफिस की जगह
लोक उद्घोषणा
विभिन्न खाद्य सामग्री की बिक्री की जगह
पूछताछ काउंटर, टेलीफोन से पूछताछ की सुविधा
रखरखाव के अभाव में बेकार हो रही हैं यात्री सुविधाएं
चाहे परिवहन निगम के बस स्टैंड की बात हो या बैरिया बस स्टैंड की मुजफ्फरपुर के बस स्टैंड सुविधाओं के मामले में राज्य के दूसरे बड़े शहरों के मुकाबले बेहतर स्थिति में हैं. यहां बस स्टैंड में कीचड़ कम दिखता है, यात्रियों के बैठने के ठीक-ठाक इंतजाम हैं, शौचालय हैं और पेयजल का इंतजाम करने की भी कोशिश की गयी हैं. मगर रखरखाव के अभाव में ये सुविधाएं बेकार साबित हो रही हैं. व्यवस्था रहने के बावजूद यात्रियों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.
दो बस पड़ाव हैं मुजफ्फरपुर शहर में : लीचियों का शहर के नाम से जाने जाने वाले उत्तर बिहार के सबसे बड़े शहर मुजफ्फरपुर में दो बस टर्मिनल हैं.
एक तो रेलवे स्टेशन के पास स्थित परिवहन निगम का बस अड्डा है जहां से निगम की बसें परिचालित होती हैं. दूसरा बैरिया स्थित बस पड़ाव जहां से बड़ी संख्या में निजी बसें खुलती हैं. साफ-सफाई के मानकों में दूसरी वजहों से पिछड़े इस शहर के बस अड्डे सुविधाओं के मामले में राज्य के अन्य शहरों से बेहतर हैं. जहां राजधानी पटना समेत राज्य के दूसरे बड़े शहरों के बस अड्डों पर आपको कीचड़ का साम्राज्य मिलेगा, बैठने की जगह, शौचालय और पेयजल की लचर व्यवस्था दिखेगी, आपको मुजफ्फरपुर के बस अड्डों में पहली नजर में ये सुविधाएं दिख जायेंगी.
लगभग हर तरह की सुविधाएं उपलब्ध हैं यहां : जहां निगम के बस अड्डे पर आपको साफ-सफाई के दर्शन होंगे, यात्रियों के बैठने के लिए दो-दो यात्री पड़ाव दिखेंगे, जिनकी सीमेंटेड कुरसियों पर आप आराम से बैठ सकते हैं. वहां आपको दो-दो सार्वजनिक शौचालय भी दिखेंगे. टिकट काउंटर भी है और कर्मचारियों की जगह भी. परिसर इतना बड़ा है कि वहां आपको बसों की चिल्लपौं बिल्कुल सुनायी नहीं देगी. वहीं बैरिया स्थित बस पड़ाव पर मौजूद सुविधाएं भी ठीक-ठाक हैं. कीचड़ कम है.
यात्रियों के बैठने के लिए दो-दो पड़ाव हैं, जहां सीमेंटेड कुरसियां बनी हैं. बस पड़ाव का दफ्तर भी अच्छी स्थिति में हैं. जहां पूछताछ काउंटर भी है. किराये की तालिका भी लगी है. पास में ही आपको एक वाटर प्यूरिफायर भी लगा दिखेगा. शौचालय तो है ही. बसों के खड़े रहने की जगह पर भी प्लास्टिक का शेड है.
रखरखाव का अभाव, पेयजल और साफ- सफाई की दिक्कतें : स्थानीय लोगों और यात्रियों का मानना है कि यहां नियमित साफ-सफाई नहीं होती और रखरखाव भी बेहतर तरीके से नहीं होता. एक स्थानीय दुकानदार कहते हैं, यहां पेयजल की समस्या सबसे बड़ी है. तमाम संसाधनों के बावजूद लोगों को पानी के लिए तरसना पड़ता है.
यहां 12 हैंडपंप हैं, जिनमें दो ही चालू हालत में हैं. वाटर प्यूरीफायर बस दिखावे का है. एक पानी टंकी की स्थापना दो साल पूर्व हुई थी, योजना थी कि पाइप के जरिये जलापूर्ति की जायेगी, मगर यह योजना आज तक लागू नहीं हुई.
एक भी बस टर्मिनल पर उपलब्ध नहीं हैं पर्याप्त व मानक सुविधाएं
गया शहर, देशी विदेशी पर्यटकों और तीर्थयात्रियों का शहर है. यह सही मायने में बिहार राज्य का इकलौता अंतरराष्ट्रीय शहर है. मगर इस शहर में एक भी ऐसा बस टर्मिनल नहीं है, जहां यात्री अपनी बस के इंतजार में घड़ी भर सुस्ता सकें. जहां यात्रियों के लिए पीने का पानी, जरूरत पड़ने पर साफ-सुथरे शौचालय की सुविधा उपलब्ध हो. जहां पर्यटकों को सूचनाएं मिल सके कि वह बोधगया या विष्णुपद मंदिर जाना चाहता हो तो किन साधनों का इस्तेमाल करे, कितनी दूरी पर यह जगह है?
कहने को तो राज्य का इकलौता अंतरराष्ट्रीय गया शहर में चार-चार बस अड्डे हैं. एक को मॉडल बनाने की भी कोशिश की गयी है. मगर इन चारों बस अड्डों के हालात बताते हैं कि यहां के व्यवस्थापकों ने इन्हें कभी अंतरराष्ट्रीय क्या औसत स्तर का भी बनाने की कोशिश नहीं की. शहर के सभी बस अड्डों का बुरा हाल है. बिहार राज्य पथ परिवहन निगम की बसें खुलने वाली सरकारी बस स्टैंड तो बस अब खंडहरनुमा हवेली जैसी बच गयी है. आइये, एक-एक कर जानते हैं, इन बस अड्डों के हालात.
सिकरिया मोड़ बस अड्डा : शहर के बाहरी छोड़ पर स्थित यह बस अड्डा शहर का सबसे बड़ा बस पड़ाव है. छह-सात साल पहले नगर निगम द्वारा इसे मॉडल बस अड्डे के रूप में विकसित करने की कोशिश की गयी थी. मगर नीति नियंताओं ने यहां जो यात्री शेड बनवाया उसमें यात्रियों के बैठने के लिए कुरसियां नहीं थीं. पेयजल और शौचालय की व्यवस्था की बात उनके दिमाग में ही नहीं आयी. एक सुलभ शौचालय है, मगर वहां नाक बंद करके ही जाया जा सकता है.
लिहाजा लोग बाहर ही खुले में मूत्र त्याग करते हैं. एक दफ्तरनुमा संरचना बनी थी, जहां नगर निगम के कर्मी बैठने वाले थे, मगर वह भवन कर्मियों का इंतजार करते-करते खंडहर में बदल गया. अब वह लोगों के जुआ खेलने के लिए मुफीद जगह का रूप ले चुका है. 38-39 दुकानें भी बनीं, उनका अलाउमेंट भी हुआ, मगर ज्यादातर दुकानें खुल नहीं पायीं. अभी 70-80 बसें खुलती हैं. उनसे चुंगी वसूलने का ठेका एक स्थानीय व्यक्ति को दिया गया है, मगर सुविधाओं के नाम पर यहां कुछ भी नहीं है.
सरकारी बस स्टैंड : गया शहर में सरकारी बस स्टैंड से आशय उस बस स्टैंड से है जहां से बिहार राज्य परिवहन निगम की बसें खुलती हैं. यह पूरा परिसर किसी खंडहरनुमा हवेली जैसा है. यात्रियों के बैठने की जगह कभी बनी थी, मगर अब वहां बैठा नहीं जा सकता है. शौचालय और पेयजल व्यवस्था की तो कल्पना भी नहीं की गयी. झारखंड की तरफ जाने वाली ज्यादातर बसें यहीं से मिलती हैं.
डेल्हा बस स्टैंड : यह अपनी तरह का अजूबा बस स्टैंड है. क्योंकि यहां से बसें खुलती हैं और नगर निगम का ठेकेदार चुंगी की वसूली भी करता है. मगर बस स्टैंड है ही नहीं. तमाम बसें सड़कों पर खड़ी होती हैं.
ऐसे में नगर निगम के पास यह बहाना भी है कि यात्रियों को बैठने की, पेयजल की, शौचालय की सुविधा दें भी तो कैसे दें. एक चलंत शौचालय जरूर खड़ा किया गया है, मगर उसका उपयोग नहीं होता, उस पर ताला लगा रहता है. यहां से गोह और टेकारी की तरफ जाने वाली 40-50 बसें रोज खुलती हैं.
मानपुर बस अड्डा : फल्गू नदी पार करके शहर के दूसरी तरफ मानपुर बस अड्डा है. इस बस अड्डे पर बारहो महीने कीचड़ का साम्राज्य रहता है. यहां से बिहारशरीफ, नवादा और सिल्लीगुड़ी तक की बसें खुलती हैं. मगर यात्रियों को कीचड़ पार करके ही अंदर जाना पड़ता है.
बैठने की जगह यहां भी नहीं है, शौचालय कोने में है, बहुत बुरा हाल है. पेयजल की व्यवस्था ऐसी है कि आप पानी मुंह में डाल नहीं सकते. बांकी कुछ भी नहीं है. न दफ्तर, न टिकट काउंटर, न अनाउंसमेंट, न मे आइ हेल्प यू. यहां भी नगर निगम का एक्सक्यूज है. जमीन विवादित है, पड़ोस में एक गोशाला है, गोशाला वाले कहते हैं, हमारी जमीन है.
बस अड्डे का संचालन रेलवे के हाथ में, बाकी खुदा मालिक
जयप्रकाश नारायण राजकीय बस अड्डा, डिक्शन रोड, भागलपुर. यह नाम है भागलपुर शहर के सबसे बड़े बस टर्मिनल का. शहर के ज्यादातर लोग इस नाम से शायद ही अवगत होंगे. शहर से आप बस के जरिये पटना जायें, रांची जायें, पूर्णिया जायें, दरभंगा जायें कहीं भी जायें. आपको यहीं आना पड़ेगा. मगर यहां पहुंचना और कुछ वक्त बिताना किसी नर्क की पीड़ा से कम नहीं है.
यहां तक पहुंचने वाली पतली सी सड़क पर हमेशा जाम लगा रहता है. लोग फोर व्हीलर लेकर आने की सोचते भी नहीं हैं. अंदर आ गये और खुदा न खास्ता आधे-एक घंटे इंतजार करना पड़ा तो एक अलग मुसीबत.
मजबूरी का सबब बन जाता है, आधा घंटा काटना : न बैठने की जगह, न शौचालय, न पेयजल की व्यवस्था, न खान-पान की उपलब्धता और कीचड़ का साम्राज्य तो बारहो महीने बरकरार रहता ही है. यह आपकी च्वाइस है, आप वहां न जायें. मगर जो लोग पूर्णिया-कटिहार जैसी जगहों से भागलपुर होकर धनबाद-रांची जा रहे होते हैं, उनके लिए इस बस अड्डे पर आधे घंटे ठहरना मजबूरी होती है. भीषण ऊमस के बीच आप लाचार होते हैं कि बस में ही बैठे रहें.
इस बस अड्डे से हो रही सालाना 50-52 लाख की कमाई : जिस बस अड्डे से रोजाना 70-80 बड़ी बसें खुलती हों और हर बस से औसतन 80 से 120 रुपये की चुंगी ली जाती हो, जिस बस अड्डे की चुंगी वसूली का सालाना टेंडर 50-52 लाख का हो, वहां जनसुविधाओं के नाम पर इस तरह का सन्नाटा हैरत में डाल देता है. आप मजबूर हैं, कुछ नहीं कर सकते. क्योंकि इस बस अड्डे का प्रबंधन रेलवे के हाथ में है. क्योंकि जमीन उसकी है. और इससे संबंधित फैसले लेने वाला अधिकारी मालदा जोन का सीनियर डीआरएम पश्चिम बंगाल में बैठा हुआ है.
एक शौचालय था, उसे भी तुड़वा दिया गया : यहां के स्थानीय बस ऑपरेटर बताते हैं कि उन लोगों ने मिल कर एक टेंपररी किस्म का शौचालय बनवाया है ताकि उनके स्टाफ उपयोग कर सकें. कोई महिला सवारी मुश्किल में हो तो उसे मना भी नहीं करते. सात-आठ साल पहले तक इस बस अड्डे का परिचालन भागलपुर का नगर निगम करता था
हालांकि तब भी व्यवस्था ऐसी ही थी. हां, एक शौचालय जरूर था, जिसे बाद में रेलवे ने तुड़वा दिया. चाहे नगर निगम हो या रेलवे इनका एकमात्र मकसद चुंगी वसूलना और आमदनी हासिल करना है. कुछ साल पहले बागवाड़ी नामक जगह पर बस अड्डे को ट्रांसफर करने की कोशिश की गयी, मगर दूरी होने की वजह से वह प्रयोग सफल नहीं रहा.
दूसरे बस अड्डे भी खस्ताहाल :शहर में दो और बस टर्मिनल हैं. एक तिलकामांझी स्थित परिवहन निगम का बस अड्डा है. जहां से निगम की बसें खुलती हैं. वहां जगह पर्याप्त है. मगर सुविधाएं तकरीबन ऐसी ही हैं. खंडहरनुमा भवन हैं. न ढंग के शौचालय, न ढंग की बैठने की जगह. न पेयजल की सुविधा. एक बस अड्डा जीरो माइल के पास है.
वहां कुछ लोकल बसें खुलती हैं और वहां कुछ भी नहीं है. खाली जमीन है, जहां बसें खड़ी रहती हैं. भागलपुर को स्मार्ट सिटी बनाने की घोषणा होने के बाद जरूर अधिकारियों का ध्यान इस मसले पर गया है. यही भी कहा गया कि परिवहन निगम के बस अड्डे को ही विकसित किया जायेगा. मगर इस दिशा में अब तक कोई सार्थक प्रयास शुरू नहीं हुआ है.
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