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जयंती पर विशेष : राष्ट्र प्रेमी अब्दुल कय्यूम अंसारी और अब्दुल हमीद

अली अनवर अंसारी इसे एक सुखद संयोग ही कहा जायेगा कि दो अक्तूबर (गांधी-शास्त्री) की तरह एक जुलाई को भारत की बगिया में दो ऐसे फूल खिले थे, जिनकी खुशबू सदियों तक कायम रहेगी. ये फूल थे-महान स्वतंत्रता सेनानी अब्दुल कय्यूम अंसारी और शहीद परमवीर अब्दुल हमीद. भारत की जंगे आजादी में भाग लेने के […]

अली अनवर अंसारी

इसे एक सुखद संयोग ही कहा जायेगा कि दो अक्तूबर (गांधी-शास्त्री) की तरह एक जुलाई को भारत की बगिया में दो ऐसे फूल खिले थे, जिनकी खुशबू सदियों तक कायम रहेगी. ये फूल थे-महान स्वतंत्रता सेनानी अब्दुल कय्यूम अंसारी और शहीद परमवीर अब्दुल हमीद.

भारत की जंगे आजादी में भाग लेने के साथ ही मुसलमानों में सामाजिक बराबरी की लड़ाई लड़ने वाले अब्दुल कय्यूम अंसारी का जन्म एक जुलाई, 1904 को बिहार के पुराने शाहाबाद जिला के डिहरी ऑन सोन में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. परमवीर चक्र प्राप्त (मरणोपरांत) अब्दुल हमीद का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिला के धमपुर गांव में एक जुलाई 1933 में हुआ था. हालांकि दोनों ही शख्सीयत के कार्यकाल व कार्य क्षेत्र अलग-अलग थे, लेकिन दोनों में राष्ट्र-प्रेम कूट-कूट कर भरा था.

अब्दुल कय्यूम अंसारी ने मिस्टर जिन्ना के दो कौमी नजरिया (द्विराष्ट्रवाद) सिद्धांत की खुल कर मुखालफत की थी तथा मजहब की बुनियाद पर मुल्क के बंटवारे का विरोध किया था. आज पाकिस्तान की क्या हालत है? बलूच, सिंधी, पठान, पंजाबी सभी अपने को अलग-अलग कौम कहते हैं.

सिया-सुन्नी की मार-काट अलग है. बिहार-उत्तर प्रदेश से जो मुसलमान वहां गये हैं उन्हें ‘मुहाजिर’ कहा जाता है तथा दोयम दर्जे का शहरी समझा जाता है. खुद मिस्टर जिन्ना ने अपने जीवन के आखिरी दिनों में एक अमेरिकी पत्रकार को इंटरव्यू देते हुए कहा था कि ‘मजहब की बुनियाद पर मुल्क तो बनाया जा सकता है लेकिन चलाया नहीं जा सकता.’

कय्यूम अंसारी साहब कहते थे कि हमारा मजहब जुदा-जुदा (अलग-अलग) हो सकता है लेकिन कौम (राष्ट्र) एक है. हम हिंदू हों या मुसलमान, सिख हों या ईसाई सभी एक कौम (भारत) के हैं. कय्यूम अंसारी ने पहले ही इस बात को न सिर्फ समझ लिया था बल्कि अपने पसमांदा जमातों के साथ मिल कर रह महाज (मोरचा) पर इसके लिए जद्दोजहद भी किया. वह महात्मा गांधी से लेकर राजेंद्र बाबू और जवाहर लाल नेहरू तक को जिन्ना को मुसलमानों का नेता नहीं तसलीम करने की लड़ाई लड़ते रहे. जब उनकी बात नहीं सुनी गयी तो उन्होंने ‘मोमिन कांफ्रेंस’ नाम से अलग सियासी पार्टी बना कर बिहार में 1946 का चुनाव लड़ा.

अब्दुल कय्यूम अंसारी सहित छह मोमिन कांफ्रेंस के उम्मीदवार चुनाव जीत गये. श्री बाबू के नेतृत्व में सरकार बनी और कय्यूम अंसारी साहब उसमें काबीना मंत्री बने. हालांकि मुसलिम ‘एलीट’ द्वारा इसका विरोध हुआ, लेकिन कांग्रेस ने उनको नजरंदाज कर दिया. कय्यूम अंसारी अपने मिशन मुल्क की एकता के लिए अंतिम दम तक लड़ते रहे.

भारत अभी तक एकजुट है तो इसलिए कि हमने एक धर्मनिरपेक्ष संविधान राष्ट्र का निर्माण किया. लेकिन कई ताकतें ऐसी हैं जो हमारे धर्मनिरपेक्ष और जनतांत्रिक ताने-बाने को तहस-नहस कर भारत को खुलेआम एक धर्म आधारित राज्य बनाने की साजिशें कर रही हैं. भारत के सभी लोगों को पाकिस्तान से कुछ सबक लेना है तो यही कि अगर इस तरह की साजिशें कामयाब हुईं तो भारत की एकता-अखंडता खतरे में पड़ जायेगी.

सांप्रदायिकता और धर्माधता कोई एकतरफा मामला नहीं है. एक तरह की सांप्रदायिकता दूसरे तरह की सांप्रदायिकता को ताकत देती है. कय्यूम अंसारी अपनी जिंदगी के आखिरी लमहे तक हर तरह की सांप्रदायिकता से लड़ते रहे. वह न सिर्फ पसमांदा मुसलमानों के रहनुमा थे, बल्कि दूसरे धर्म के पिछड़े-दलित तबकों के भी सम्मानित नेता होने का फा उन्हें हासिल हुआ. पुराने शाहाबाद जिला में ‘त्रिवेणी संघ’ की गतिविधियों में उन्होंने जम कर हिस्सा लिया. बिहार में ‘बैकवर्ड क्लासेज फेडरेशन’ की स्थापना करने वाले नेताओं में अंसारी साहब अव्वल थे.

भारतीय सेना के हवलदार अब्दुल हमीद तो 32 साल की उम्र में ही शहीद हो गये. 1965 में भारत-पाक युद्ध के समय अमेरिका के पेटेंट टैंक को जिस कदर इस जवान ने उड़ा दिया, उसकी गाथा सुन कर सारी दुनिया ने दांतों तले अपनी उंगलियां दबा ली. दर्जी का यह बेटा सीना जानता था तो फाड़ना भी उसे खूब आता था.

(लेखक राज्यसभा सांसद हैं)

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