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दक्षिण और पूर्व एशिया में मां दुर्गा की प्राचीन मूर्तियां व मंदिर

Updated at : 07 Oct 2019 1:21 AM (IST)
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दक्षिण और पूर्व एशिया में मां दुर्गा की प्राचीन मूर्तियां व मंदिर

प्रम्बनन मंदिर परिसर की दुर्गा इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर स्थित प्रम्बनन हिंदू मंदिर परिसर का निर्माण नौवीं सदी में हुआ था. यह इंडोनेशिया का सबसे बड़ा मंदिर है और इसकी गणना दक्षिणपूर्व एशिया के बड़े मंदिरों में होती है. हिंदू धर्म के शीर्षस्थ देवताओं की त्रिमूर्ति- ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव- को समर्पित यह परिसर […]

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प्रम्बनन मंदिर परिसर की दुर्गा

इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर स्थित प्रम्बनन हिंदू मंदिर परिसर का निर्माण नौवीं सदी में हुआ था. यह इंडोनेशिया का सबसे बड़ा मंदिर है और इसकी गणना दक्षिणपूर्व एशिया के बड़े मंदिरों में होती है. हिंदू धर्म के शीर्षस्थ देवताओं की त्रिमूर्ति- ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव- को समर्पित यह परिसर वास्तु शास्त्र की अवधारणाओं पर निर्मित है.निर्माण के सौ वर्षों के भीतर ही जावा के निवासियों ने इस परिसर का त्याग कर दिया था. 20वीं सदी के प्रारंभ में इसका जीर्णोद्धार का कार्य शुरू हुआ और 1991 में यूनेस्को ने इस परिसर को विश्व की ऐतिहासिक धरोहरों में सम्मिलित किया.
प्राचीन खमेर स्रोतों के अनुसार, खमेर राजवंश के संस्थापक सम्राट जयवर्मन द्वितीय ने जावा में बहुत समय बिताया था. उन्होंने बोरोबिदूर के अलावा प्रम्बनन के मंदिर परिसर की यात्रा की थी. इसी से उन्हें अंकोरवाट शहर और विशाल मंदिर परिसर बनाने की प्रेरणा मिली थी.
प्रंबनन मंदिर के परित्याग के बाद इस परिसर को समय के साथ घने जंगलों ने अपनी आगोश में लिया था, पर जावा की लोककथाओं में इसकी हमेशा चर्चा बनी रही. वर्ष 1733 में नीदरलैंड के औपनिवेशिक अधिकारियों ने इसे फिर से खोजा.
आज भी मंदिर परिसर के पुनर्निर्माण और पुरातात्विक खुदाई का कार्य जारी है. इस परिसर में स्थित शिव मंदिर के उत्तरी हिस्से में देवी दुर्गा की भव्य मूर्ति बनी हुई है. इस मूर्ति के बारे में मान्यता है कि एक राजकुमारी को उसके क्रूर पति ने पत्थर में बदल दिया था. वही कालांतर में दुर्गा की छवि में परिवर्तित हो गया.
(एंसिएंट हिस्ट्री इंसाइक्लोपीडिया के सह-संस्थापक प्रोफेसर जेम्स ब्लैक वाइनर के लेख का संपादित हिस्सा)
खुदाई में मिलीं मां दुर्गा की मूर्तियां
प्रम्बनन मंदिर परिसर के अलावा इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर हुई खुदाई में दुर्गा की अनेक मूर्तियां मिली है, जो छठी सदी के बाद की हैं. इंडोनेशाई द्वीपों पर मिलीं मूर्तियों में कम-से-कम 135 मूर्तियां दुर्गा की हैं. जावा के कुछ हिस्सों में देवी को ‘लोरो जोंगग्रांग’ के नाम से भी जाना जाता है. कंबोडिया में हिंदू शासकों के दौर में दुर्गा की पूजा का बहुत प्रचलन था.यह बात उत्खनन में मिलीं कई मूर्तियों से सिद्ध होती है. कंबोडियाई मूर्तियां दुर्गा की भारतीय छवि से अलग हैं. उनमें दुर्गा महिषासुर के कटे हुए सिर पर खड़ी दिखायी गयी हैं. वियतनाम के मंदिरों और खनन की दुर्गा मूर्तियां चंपा वंश के काल में बनीं मानी जाती हैं.
काबुल का आशामाई मंदिर
अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के मध्य क्षेत्र में असमाई पहाड़ में आशामाई मंदिर स्थित है. इस पहाड़ को स्थानीय भाषा में कोहे-असमाई कहा जाता है.इस पहाड़ी का यह नाम देवी आशा के नाम पर पड़ा है, जिन्हें आशा की देवी माना जाता है. इस मंदिर में एक दीया है. जोत या दीया के बारे में मान्यता है कि चार हजार वर्षों से भी अधिक समय से निरंतर जल रहा है. यह अपने-आप में आश्चर्य की बात है कि अफगानिस्तान में गृहयुद्धों और युद्धों के बाद भी मंदिर में पूजा होती रही है तथा दीया भी जलता रहा है.
वर्ष 2006 के प्रारंभ में स्थानीय नागरिक संगठनों के सहयोग से हिंदू समुदाय द्वारा मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया था. अमेरिका के न्यूयॉर्क, ब्रिटेन के लंदन, जर्मनी के फ्रैंकफर्ट, नीदरलैंड के एम्सटर्डम और भारत के फरीदाबाद में बने आशामाई मंदिरों का नाम काबुल के मंदिर पर रखा गया है. काबुल के मंदिर के आसपास के इलाकों को ‘दरगा’ के नाम से जाना जाता है और यह पुराने काबुल का हिस्सा है.
इसके अलावा भी काबुल में चार ऐतिहासिक मंदिर है. अफगानिस्तान के चश्मा साहिब, कांधार, गजनी, जलालाबाद, सुल्तानपुर जैसे शहरों में भी मंदिर और गुरुद्वारे हैं.
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